आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 375, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें३६६ आत्मतत्त्व...
न धूम' इति, पावकवत्तानुपलब्धेरिति ।
तस्मान्न व्यापकानुपलब्धेर्व्याप्यनिवृत्तिः, किन्तु व्यापक-
निवृत्तेः। सा चात्रासिद्धेति वाच्यम् , तदेतत्तुल्यं प्रकृतेऽपि ।
उपलब्धेस्तु व्याप्तिरिहैव भग्ना, श्वैत्यानुपलम्भेऽपि शङ्खोप-
लम्भादित्युक्तम् ।
स्यादेतत्, पीत एव शङ्ख उत्पन्न इति चेन्न, पुरुषान्त-
रेण श्वेतस्यैवोपलब्धेः । नाप्यसम एव सहोपलम्भनियमो
धूम दिखाई पड़ता है, वह धूमजैसा है न कि वास्तविक धूम है।
क्योंकि वहां अग्निमत्ताकी उपलब्धि नहीं हो रही है।
इसलिये तुम्हें यही कहना होगा कि "व्यापककी अनुपलब्धि होनेसे
व्याप्यकी निवृत्ति नहीं हो जाती है, किन्तु व्यापककी निवृत्ति होनेसे ही
व्याप्यकी निवृत्ति हो सकती है। किन्तु यहां अग्निकी अनुपलब्धि भर
है, उसकी निवृत्ति (अभाव) तो असिद्ध है। अतः अग्निकी अनुप-
लब्धिमात्रसे धूमकी निवृत्ति नहीं होगी" तो यही बात शङ्खके सम्बन्धमें
भी समझो। अर्थात् श्वेतताकी अप्रतीतिमात्रसे शङ्खकी निवृत्ति नहीं हो
जायगी। यदि द्वितीय पक्षके अनुसार व्यापक और व्याप्यकी
उपलब्धियोंमें व्याप्ति सम्बन्ध कहो, तो यह व्याप्ति भी यहीं टूट गयी।
क्योंकि श्वेतताकी उपलब्धि नहीं होनेपर भी शङ्खकी उपलब्धि होती
है। यह बात पहले कही जा चुकी है।
यदि कहो कि—यही हो कि पाण्डुरोगकी दशामें श्वेत शङ्खकी
सचमुच ही निवृत्ति हो जाती है और वहीं नया ही पीला शङ्ख उत्पन्न
हो जाता है—तो यह नहीं हो सकता। क्योंकि दूसरे पुरुषको,
जिसे कि पाण्डुरोग नहीं हुआ है, वह उजला ही शङ्ख उपलब्ध
होता है।
यह भी नहीं हो सकता कि—गुण गुणीका समनियतरूपमें नहीं
किन्तु असमनियतरूपमें ही साथ साथ उपलब्धिका जो नियम है, वही
गुण गुणीमें अभेद-सिद्धिका हेतु है—क्योंकि यह नियम भी व्यभिचरित