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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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पृष्ठ 371

१२२ आत्मतत्त्वविवेके
व्यतिरिक्तस्योदकस्यानभ्युपगमात्, एकैकस्यानेकाहार्यत्वे
प्रमाणाभावात्, समुदायस्य चासिद्धेः ।
अतएव नैककारणतयाऽपीति । निमित्तमन्तरेण तु समु-
दायव्यवहारेऽतिप्रसङ्गः । तृतीये न विवादः ।
नापि चतुर्थः, स हि विज्ञाननयमाश्रित्य वा स्यात् ?
द्विचन्द्रादिवद् विसंवादाद् वा ? आद्ये तु रूपादिषु कः
पक्षपातः ?
रूपाद्यात्मक घटके द्वारा लाया जाता है—तो यहाँ एक एक कर अर्थात्
केवलरूपात्मक जल या केवल रसात्मक, गन्धात्मक अथवा स्पर्शात्मक
जल रूप रस स्पर्शाद्यनेकात्मक घटका आहार्य ( आनेय ) नहीं हो सकता
है । क्योंकि जो रूपका कार्य है वह स्पर्शादिका कार्य कैसे हो सकता
है ? यदि कहो कि—एक एक कर नहीं किन्तु रूपादिसमुदायात्मक
जल रूपादिसमुदायात्मक घटका आहार्य होगा—तो यह भी नहीं हो
सकता । क्योंकि इसी समुदायकी सिद्धिके लिये तुम्हारा सारा प्रयास
चल रहा है और वह अभी सिद्ध ही नहीं हो सका है ।
इसीलिये एक कारणकी वजहसे भी रूपरसादिकोंका एक समुदाय
नहीं बन सकता है । क्योंकि रूप आदि चारोंका कोई एक कारण ही
नहीं है । उक्त परिस्थितियोंमें यदि बिना किसी निमित्तके ही रूपादिक।
समुदाय व्यवहार मानो तो अतिप्रसङ्गदोष हो जायगा । अर्थात् भिन्न-
कालीनों और भिन्नदेशीयोंमे भी समुदायव्यवहार होने लगेगा ।
यदि तृतीय पक्षका आश्रयण करते हुए दर्शन स्पर्शनके द्वारा रूपादि
गुणोंसे अतिरिक्त वस्तुका ग्रहण मानो तो उसमें मुझे कोई विवाद नहीं
है । क्योंकि वह वस्तु ही तो गुणातिरिक्त गुणी है ।
यदि चतुर्थ पक्षका आश्रयण करते हुए वस्तुरहित ज्ञानके आकार
विशेषको ही उक्त चाक्षुष एवं स्पार्शन प्रत्यक्षोंका विषय मानो तो वह
भी नहीं हो सकता है। क्योंकि वह भी क्या विज्ञानवादको लेकर होगा ?
या द्विचन्द्रादिके समान विसंवादी (अर्थशून्य) ज्ञान मानकर होगा ?
यदि प्रथम (विज्ञानवाद) को स्वीकार करो तो रूपादिगुणोंके प्रति