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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 382, कुल 530 में से

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पृष्ठ 382

गुणगुणिभेदभङ्गवाद ३३३
तथापि चानुभवकल्पनायां सर्वः सर्वदा सर्वं जानाति न'
तु निश्चिनोतीति किं न स्यात् ? भ्रान्तिवशात् तद्विपरीत-
विशेषनिश्चयेऽनुभूतविशेषाऽनिश्चय इति चेन्न, अनुभववैपरीत्ये
निश्चयस्य सर्वत्रानाश्वासप्रसङ्गात् । यत्र च विपरीतस्याप्य-
निश्चयस्तत्र का वार्ता ? यथा पराचीनैर्भागैरर्वाचीनानां संयोग-
( साक्षात्कारी ज्ञान ) नहीं होता है । अतः वासनाका उद्भव निश्चयका
हेतु नहीं हो सकता ।
एव अनुभवानुरूप निश्चय नहीं होनेपर भी यदि अनुभवकी कल्पना
की जाय तो यह भी क्यों न हो जाय कि-सभी सर्वदा सबको जानते
हैं, किंतु उसका केवल निश्चय भर नहीं करते । अर्थात् सभी सर्वज्ञ
हो जायेंगे । यदि कहो कि-अनुभवके बाद निश्चय होता ही है, यह
नियम नहीं हो सकता, क्योंकि अनुभवके अनन्तर भ्रमवश जहाँ विपरीत
निश्चय हो जाता है, वहाँ अनुभूत विषयका निश्चय नहीं होता है । जैसे,
शुक्तिविषयक निर्विकल्पक अनुभवके बाद रजतका भ्रमात्मक निश्चय
हो जानेपर शुक्तिविषयक सविकल्पक निश्चय नहीं होता-तो यह भी
नहीं कह सकते । क्योंकि अनुभव कुछ और निश्चय कुछ, इस प्रकार
निर्विकल्पक अनुभवके विपरीत भी सविकल्पक निश्चय हुआ करे तो
सर्वत्र निर्विकल्पक अनुभवोंके प्रति अविश्वास हो जायगा । क्योंकि
निर्विकल्पकके स्वय अतीन्द्रिय होनेसे उसकी कल्पनाका एकमात्र सवि-
कल्पक ही आधार होता है । इसलिये ज्ञापक ही जब विपरीत हो
जायगा तब उसके आधारपर अतीन्द्रिय निर्विकल्पकका ज्ञान कैसे हो
सकेगा ? अपने पक्षमे जो शुक्ति-रजतका दृष्टान्त दिये हो, वह उपयुक्त
नहीं है । क्योंकि रजतभ्रमस्थलमें शुक्तिका निर्विकल्पक अनुभव
पहले हुआ ही नहीं रहता है, बल्कि धर्मी-इन्द्रियके सन्निकर्ष होते
ही स्मर्यमाण रजतका एक ध एक विपरीत निश्चय ही उत्पन्न हो
जाता है ।
एव, जहाँ अनुभवानन्तर विपरीतका भी निश्चय नहीं हुआ, वहाँपर
अनुभवानुरूप निश्चयके नहीं उत्पन्न होनेका क्या हेतु बताओगे ? जैसे,