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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 380, कुल 530 में से

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पृष्ठ 380

गुणगुणिभेदभङ्गवादः ३३१
न चाधिपतिप्रत्ययत्वात्तस्येति युक्तम्, अनुभवानां तद्-
देशोल्लेखानुरोधात् । उल्लेखे वा स एवालम्बनप्रत्ययः,
तावन्मात्रानुबन्धित्वादलम्बनव्यवहारस्य । न च देशोऽ-
स्त्वालम्बनं न तु वृक्षादिरिति साम्प्रतम्, अनुपलब्धविशेषतया
देशदेशिनोरविशेषात् ।
शशविषाणादि प्रतीतिमे तो पटुत्व अपटुत्वका कभी भान ही नहीं
होता है।
यदि कहो कि—वृक्षादिदेशके साथ नियतरूपसे होनेवाला पटुत्व-
अपटुत्वका उपलम्भ अनादिवासनारूप अधिपतिके कारण होता है।
सभी विकल्पोंका कारण होनेसे अनादिवासना ही अधिपति कही गयी
है। इसलिये वही प्रतिनियत देशमे पटुत्व-अपटुत्वके उपलम्भका प्रत्यय
अर्थात् कारण है—तो यह कथन भी युक्त नहीं है। क्योंकि अनुभवों
मे जब तुम प्रतिनियत देशका उल्लेख नहीं मानते हुए उन्हें निरालम्बन
कहते हो तो उससे होनेवाली वासनामे भी देशका उल्लेख नहीं हो
सकेगा। यदि अनुभवोंमें देशका उल्लेख मानो तो फिर वही आलम्बन-
प्रत्यय (विषय) सिद्ध हो गया। इसप्रकार वृक्षादि देश और उसमें
पटुत्व अपटुत्वका ग्रहण सिद्ध हो जाता है। अत पटुत्व-अपटुत्वज्ञान
को निरालम्बन (निर्विषयक) नहीं बता सकते हो। क्योंकि अनुभव-
का विषय होनेसे ही वस्तुमे आलम्बनत्व व्यवहार होता है।
यह भी कथन उचित नहीं है कि—पटु अपटु ग्रहणका विषय देश
ही है, वृक्षादि नहीं है—क्योंकि पटु अपटु ग्रहण वृक्षादिके समान ही
उस देशमे भी उसके विशेषधर्मोंकी उपलब्धि और अनुपलब्धिके कारण
ही होता है। अर्थात् देशमें भी दूरवर्ती व्यक्तिको विशेषधर्मोंकी
अनुपलब्धिके कारण अपटु (अस्पष्ट) तथा निकटवर्तीको विशेषधर्मोंकी
उपलब्धिके कारण पटु (स्पष्ट) ग्रहण होता है। यह बात भी तभी ही
हो सकती है, जब धर्म धर्मीमे भेद होगा। इस प्रकार देश
(भूतलादि) और देशी (वृक्षादि) दोनोंकी अविशेष (समान) ही
... है।