आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुणगुणिभेदभङ्गवादः ३२३
प्राप्तेरर्थक्रियास्थितेश्च न द्वितीयोऽपि । ते द्वे रूपादीना-
मिति चेत्, न तेषाम्, किन्तु तस्यैवेति किं न स्यात् ? बाध-
कादिति चेत्, न तावत् क्रमयौगपद्यविरोधो रक्तारक्तविरोधो
वा बाधकम्, निषिद्धत्वात्, क्षणिकपरमाणुरूपद्रव्येणाक्रा-
न्तेश्च । सम्बन्धाभाव इति चेत्, असम्बन्धस्तावदस्तु । कथं
तद्वत् प्रतीयत इति चेत्, तेषां तथोत्पादादिति परिहारोऽस्तु,
तत्रैव यथा शरीरं चेतनावदिति ।
क्यों पक्षपात है ? अर्थात् जैसे गुणी कोई वस्तु नहीं है, वैसे रूपादि
गुण भी कोई वस्तु नहीं हैं । इस प्रकार गुणीके साथ-साथ गुणोंका भी
विलोप ही तुम्हें मानना पड़ेगा ।
वस्तुकी प्राप्ति और उससे अर्थक्रिया ( प्रयोजनसिद्धि ) के होनेके
कारण द्वितीय पक्ष भी नहीं हो सकता है । यदि कहो कि—प्राप्ति और
अर्थक्रिया रूपादिगुणोंकी ही होती है—तो यहाँ यही क्यों न माना
जाय कि प्राप्ति और अर्थक्रिया रूपादिगुणोंकी नहीं होती है, किन्तु गुणी
द्रव्यकी ही होती है । यदि कहो कि—बाधकके कारण प्राप्ति और अर्थक्रिया
द्रव्यकी नहीं हो सकती—तो वह बाधक क्रमयौगपद्यका विरोधरूप या
रक्त-अरक्तका विरोधरूप नहीं हो सकता । क्योंकि इन दोनों बाधकोंका
पहले ही खण्डन किया जा चुका है । साथ ही जो स्थिर है, उसमें
क्रमयौगपद्यका विरोध तथा जो अवयवी होगा, उसमें रक्त अरक्तका
विरोध भले ही सम्भव हो किन्तु क्षणिक और निरवयव रूपादिगुण
वान् परमाणुमें ये दोनों ही बाधक नहीं हो सकते हैं ।
यदि कहो कि—गुणी तभी होगा, जब कि उसमें रूपादिगुण सम-
वाय सम्बन्धसे रहे । किन्तु यहाँ समवाय सम्बन्धका अभाव है । अतः
यही गुणी-द्रव्य होनेमें बाधक है—तो यहाँ सम्बन्धाभाव भले ही रहे,
इससे कोई क्षति नहीं है । यदि कहो कि—सम्बन्धके अभावमे रूपादि-
विशिष्टकी प्रतीति कैसे होगी ?—तो इसका उत्तर यही होगा कि रूपादि
गुणोंकी वैसी ही उत्पत्ति होती है, जिसमें सम्बन्धके बिना ही रूपादि-
विशिष्ट बुद्धि हो जाती है । जैसे, तुम्हें ही शरीरमें चैतन्यका समवाय
नहीं रहनेपर भी "शरीर चेतनावत्" यह प्रतीति होती है ।