आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[गुणगुणिभेदभङ्गवाद ३२१]
स्यापि समुदायत्वं किङ्कृतमित्यनुयोगानिवृत्तेः ।
अत एव नैककालतयाऽपि, तयोरेककालतायां प्रमाणा-
भावात् । भावे वा रासभकरभयोरप्येककालतया समुदायत्व-
प्रसङ्गः, भेदाग्रहस्य प्रकृतेऽप्यसंभवात् ।
अतएव नैककार्यतयाऽपि, उपादेयरूपस्यैककार्यस्याभा-
वात् । एकोदकाहरणलक्षणार्थक्रियेत्याद्यपि न युक्तम्, रूपा
समुदायात्मक बनेगा ? यह प्रश्न रह ही जाता है । इसी प्रकार उस
आधारको भी रूप स्पर्शादिका एक समुदाय होनेके लिये पुनः किसी अन्य
आधारकी अपेक्षा होगी । इस प्रकार आधार-कल्पनाका कहीं अन्त न
होनेसे अनवस्थादोष हो जायगा ।
इसीलिये एककाल होनेके कारण भी रूप-स्पर्शका समुदाय नहीं बन
सकेगा, क्योंकि रूप स्पर्शादिके एककालिक होनेमे कोई प्रमाण नहीं है ।
यदि वे कदाचित् एककालिक हों भी तथापि एककालिक होनेके कारण
समुदाय माननेपर रासभ और करभको भी एककालिक होनेके कारण
समुदायात्मक मानना पडेगा । यदि कहो कि—समुदायात्मक होनेके
लिये भेदाग्रह अपेक्षित है, परन्तु रासभ और करभमे भेदग्रह रहनेसे वे
समुदायात्मक नहीं हो सकते—तो रूप-रसादिमें भी भेदका अग्रह नहीं
है, इसलिये उनका भी समुदाय नहीं सिद्ध हो सक्ता । अर्थात् वे समु-
दायात्मक नहीं हो सक्ते हैं ।
इसीलिये एक कार्यताके कारण भी रूप रसादिका समुदाय असंभव
है । क्योंकि रूप-रस स्पर्शादिका कोई एक कार्य ( उपादेय ) तुम्हारे
या मेरे मतमे नहीं होता । अर्थात् रूपादिको उपादान मानकर इनसे
कोई एक उपादेय ( कार्य ) नहीं उत्पन्न होता है । यदि कहो कि—
रूपाद्दिका कोई एक उपादेयरूप कार्य भले ही न हो किन्तु घटके रूपमे
समुदित जो रूपरसादिक हैं, उनको निमित्त मानकर उनसे पानीका
लानारूप एक कार्य तो होता ही है—तो यह भी युक्त नहीं है । क्योंकि
तुम्हारे मतमें उदक ( पानी ) भी रूपादिसे अतिरिक्त कोई एक वस्तु
नहीं है । यदि कहो कि—इसीलिये रूप रस-गन्ध-स्पर्शात्मक जल ही
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