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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 381, कुल 530 में से

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पृष्ठ 381

३३२ आत्मतत्त्वविवेके

न च दवीयांसोऽपि विशेषाः स्फुरन्त्येव न तु निश्चीयन्त
इति युक्तम्, न हि योगविमलाञ्जनधौतदृष्टेरन्यस्य ताराव्यूह-
गतयः प्रतिभान्तीति शक्यं प्रतिपादयितुम्।
अनिश्चयानुपपत्तेश्च। अनुभूतो ह्यात्मा न निश्चीयत
इत्यत्र हेतुर्वाच्यः। वासनानुद्भव इति चेन्न, निःशेषविशेष-
वन्तं धर्मिणमुपलभ्य विदूरवर्तिनस्तदखिलस्मरणेऽपि अनुभव-
व्यापारानुसारिनिश्चयानुदयात्।


यह भी कथन युक्त नहीं है कि—अतिदूरस्थ भी विशेषधर्म स्फुरित
(निर्विकल्पकज्ञानके विषय) होते ही हैं किन्तु निश्चय (सविकल्पकज्ञान)
भर नहीं हो पाता। अर्थात् ग्रहणोंमे पटु अपटुका विरोध नहीं है।
क्योंकि अपटु ग्रहण होता ही नहीं है। किन्तु सभी ग्रहण पटु (स्पष्ट)
ही होते हैं। इसलिये पटु अपटु ग्रहणके विरोधके आधारपर धर्म
(गुण) और धर्मी (गुणी) में भेदका साधन नहीं हो सकता है—
क्योंकि ऐसा प्रतिपादन नहीं किया जा सकता है कि योगरूपी निर्मल
अञ्जनसे जिनकी दृष्टि पवित्र हो चुकी है, ऐसे योगियोंके अतिरिक्त
दूसरे व्यक्तिको भी तारासमूहकी गतियोंका ज्ञान होता हो, केवल
निश्चय भर न होता हो। अर्थात् दूरवर्तीको विशेषधर्मोंका अग्रहण
होता ही है और वह ज्ञान भी अस्पष्ट होता ही है, इसमें सन्देह
नहीं है।
यह जो कहा कि-निर्विकल्पक ज्ञान तो होता है, किन्तु उस विषयका
सविकल्पात्मक निश्चय नहीं होता—तो यह अनिश्चय कहना भी अनुप
पन्न है। क्योंकि सूक्ष्म आत्माका अनुभव तो तुम्हें हो रहा है, किन्तु
उसका निश्चय नहीं होता, इसका कारण तुम्हें कहना चाहिये। यदि
कहो कि—सरकारका उद्बुद्ध न होना ही अनिश्चयका कारण है—तो
यह नहीं कह सकते। क्योंकि सम्पूर्ण विशेषधर्मोंके साथ धर्मीको
जान लेनेके बाद जब कोई व्यक्ति विशेष दूर चला जाता है, उस
अवस्थामें उसके सम्पूर्ण विशेष धर्मोंका स्मरण करा देने वाली वासनाके
उद्बुद्ध रहने पर भी पूर्वोक्त अनुभव-व्यापारके अनुसार निश्चय