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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 384, कुल 530 में से

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पृष्ठ 384

अथानुपलम्भवादः
अस्तु तर्हि नैरात्म्यम्, अनुपलब्धेरिति चेन्न—
सर्वदृष्टेश्च सन्देहात् स्वादृष्टेर्व्यभिचारतः ।
दृश्यत्वविशेषणान्नैवमिति चेन्न तदसिद्धेः । परोपगम-
अनुपलम्भवादका खण्डन
आशङ्का—पूर्वोक्त तीनों हेतुओंसे आत्माका अभाव भले ही सिद्ध
न हो सके फिर भी अनुपलब्धि हेतुसे ही आत्माका अभाव सिद्ध हो
जायगा । अर्थात् आत्मा नहीं है, क्योंकि उसकी उपलब्धि नहीं होती
है, जैसे उपलब्धि नहीं होनेसे शशविषाणका अभाव होता है ।
समाधान—अनुपलब्धिसे भी आत्माका अभाव नहीं सिद्ध हो
सकता है । क्योंकि यहाँ अनुपलब्धिसे सब व्यक्तियोंकी अनुपलब्धि
विवक्षित है ? अथवा पुरुषविशेष (बौद्धादि) की ? यदि प्रथमकल्प
हो तो अनुपलब्धि हेतु सन्दिग्धासिद्ध हो जायगा । क्योंकि सभीको
आत्माकी अनुपलब्धि है—यह निश्चय कैसे हो सकेगा ? कारण, दूसरेके
ज्ञान अज्ञानको दूसरा नहीं समझ सकता है । यदि दूसरा कल्प हो
तो वह भी ठीक नहीं है । क्योंकि, पुरुषविशेषकी अनुपलब्धि व्यभिचारी
है । अर्थात् व्यक्तिविशेषको अनुपलब्ध होनेसे भी वस्तुका अभाव
नहीं हो जाता है । कारण, सम्भव है, इन्द्रिय दोषादिके कारण उसे
उपलब्धि नहीं होती हो ।
यदि कहो कि—दृश्यत्व विशेषणके साथ अनुपलब्धिको हेतु मानने-
से उक्त व्यभिचारदोष नहीं होगा । अर्थात् प्रत्यक्षद्वारा देखने योग्य
होनेपर भी जिस वस्तुकी उपलब्धि नहीं होती है, उसका निश्चित ही
अभाव होता है—तो यह नहीं कह सकते । क्योंकि तुम्हारे मतमें आत्मा-
का दृश्यत्व असिद्ध है । अर्थात् तुम आत्माको दृश्य नहीं मानते हो ।
यदि दृश्य मानो तो वह सिद्ध ही हो गया, उसका अभाव कहाँ हुआ ?