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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 378, कुल 530 में से

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पृष्ठ 378

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गुणगुणिभेदभङ्गवादः ३८९
धर्मविरोध एव कोऽत्रेति चेत्, तदुपलम्भेऽप्यनुपलम्भः,
तदभिधानेऽप्यनभिधानं, तन्निषेधेऽप्यनिषेध इत्यादि। नील-
मुत्पलं चलतीत्यादौ च व्यावृत्तिभेदनिराकरणे पूर्वक एव
न्यायोऽनुसन्धेयः, अन्यत्रोपाधिभेदात्।
अभेदे च धर्मधर्मिणोर्दूरादूरवया ग्रहणे पट्वपटुनी कुतः?
यदि पूछो कि गुण गुणीमे विरोधी धर्म ही कहाँ हैं? तो यही
उत्तर होगा कि इनमें एकका उपलम्भ होनेपर भी दूसरेका अनुपलब्ध
होना, एकका कथन होनेपर भी दूसरेका अकथन होना तथा एकका
निषेध होनेपर भी दूसरेका अनिषेध होना आदि ही विरोधी धर्म हैं।
अर्थात् रूपगुणका ग्रहण नहीं होनेपर भी शङ्खका ग्रहण होता है, शङ्ख
कहनेपर भी उसका रूप नहीं कहा जाता तथा रूपका निषेध होनेपर भी
शङ्खका निषेध नहीं होता। ये सब बातें गुण गुणीके भेदपक्षमें ही
बन सकती हैं।
एवं, "नीलमुत्पलं चलति" यह व्यवहार होता है। इसमें गुण,
जाति और क्रियाका सामानाधिकरण्य सूचित होता है, और वह समान
अधिकरण द्रव्य ही है इस प्रकार गुणसे पृथक् गुणी द्रव्यकी सत्ता
सिद्ध होती है। यह नहीं कह सकते कि-उस व्यवहारमें अनीलादि-
व्यावृत्ति ही सूचित होती है-क्योंकि व्यावृत्तिविशेषके खण्डनमें पहले
ही बहुतसे न्याय दिये जा चुके हैं, उन्हें ही स्मरण करना चाहिये। हाँ,
जहाँ उपाधिविशेषसे विशिष्ट व्यवहार होता है, वहाँ अतद्व्यावृत्तिका
निराकरण नहीं करते। जैसे, कार्यत्व-उपाधिसे अवश्य ही अकार्यकी
व्यावृत्ति समझी जाती है तथा नित्यत्व उपाधिसे अवश्य ही अनित्यकी
व्यावृत्ति समझी जाती है।
एवं, धर्म और धर्मीमें यदि परस्पर अभेद है तो दूरसे किया
गया प्रत्यक्ष अपटु (अस्पष्ट) होता है तथा निकटसे किया गया प्रत्यक्ष
पटु (स्पष्ट) क्यों होता है? अर्थात् धर्मीके अधिकांश धर्मोंका ग्रहण
पटुत्व है तथा अल्प धर्मोंका ग्रहण अपटुत्व है। यदि धर्मी और
धर्म अभिन्न ही हैं तो धर्मीका ग्रहण तो दूर और निकट दोनों दशाओंमें