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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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पृष्ठ 383

३३४ आत्मतत्त्वविवेके
विभागयोरिति ॥
॥ इति गुणगुणिभेदमङ्गवादः ॥
किसी पदार्थके परवर्ती भागोंके साथ अर्वाग्वर्ती भागोंका जो संयोग
विभाग होता है, वह प्रत्यक्षाप्रत्यक्ष वस्तुवृत्ति होनेके कारण वायु
वनस्पतिके संयोग-विभागके समान अप्रत्यक्ष होता है तथा उसका
निर्विकल्पक ग्रहण तुम मानते हो, साथ ही वहाँ कोई विपरीत निश्चय
भी नहीं होता है । ऐसी परिस्थितिमें उस संयोग विभागका अनुभवानु
रूप निश्चय क्यों नहीं होता है ? अतः पूर्वोक्त अनुभवोंके द्वारा गुण
गुणिभेदके निश्चित हो जानेसे गुण गुणिभेदभङ्गके आधारपर आत्माकी
सत्ताका खण्डन नहीं किया जा सकता है ॥
इति गुण-गुणिभेदभङ्गवादनिरास