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आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 376, कुल 530 में से

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पृष्ठ 376

हेतुः, अनैकान्तात् । अभास्वरं रूपं भास्वरेण सह नियमे-
नोपलभ्यते भिन्नं चेति ।
देशाविच्छेद इति चेन्न, असिद्धेः देहदेहिभ्यामनैका-
न्ताच्च । न तयोरविच्छेदस्तदनुपलम्भेऽप्युपलम्भादिति चेत् ,
तुल्यम्, रूपायनुपलम्भेऽपि तद्गतामुपलब्धेः ।
है । जैसे, घटका अभास्वर ( नहीं चमकनेवाला ) रूप आलोकके
भास्वर ( चमकनेवाले ) रूपके साथ ही नियमत उपलब्ध होता है,
फिर भी घटका रूप और आलोकका रूप परस्परमे अभिन्न नहीं बल्कि
भिन्न ही हैं ।
यदि कहो कि—सहोपलब्भ के साथ साथ देशका भी विच्छेद नहीं
होना चाहिये । इसलिये घटरूप और आलोकरूपका सहोपलम्भ होनेपर
भी उनका देश भिन्न भिन्न है । अर्थात् घटरूपका देश ( आश्रय ) घट
है और आलोकरूपका देश आलोक है । अत भिन्न देश होनेके कारण
सहोपलम्भ होनेपर भी घटरूप और आलोकरूप परस्पर अभिन्न नहीं
होंगे । गुण गुणीका तो सहोपलम्भके साथ साथ देश भी एक है, इस
लिये इनके अभेदमें कोई बाधा नहीं है—तो देशाविच्छेद भी यहाँ
असिद्ध है । क्योंकि गुणका देश ( आश्रय ) द्रव्य है और गुणीका
( द्रव्यका ) देश उसका अवयव है । इस प्रकार देशका विच्छेद (भेद)
होनेके कारण गुण गुणीमे अभेद नहीं सिद्ध हो सकेगा । एव, देशा-
विच्छेद हेतु भी देह देहीमे व्यभिचरित है । अर्थात् देह और देहीकी
एक देशमे प्रतीति होनेपर भी अप्रकाशात्मक देह भिन्न है और स्वप्रकाश-
ज्ञानात्मक देही भिन्न वस्तु है । इस प्रकार देशाविच्छेद होनेसे अभिन्न
होनेका नियम यहीं व्यभिचरित हो गया ।
यदि कहो कि—देह देहीको लेकर उक्त नियम व्यभिचरित नहीं
होगा, क्योंकि देह देहीमे अविच्छेद ही नहीं है । कारण, देहका
अनुपलम्भ होनेपर भी "अहम्" रूपमे स्वप्रकाशज्ञानात्मक देहीका
उपलब्ध होता रहता है, इसलिये इनमें भेद होनेपर भी हमारे पूर्वोक्त
नियममे व्यभिचार नहीं है—तो यह बात गुण गुणीके लिये भी तुल्य
है । क्योंकि रूपादिको अनुपलब्धि होनेपर भी आधारभूत गुणीकी