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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 374, कुल 530 में से

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पृष्ठ 374

गुणगुणिभेदभङ्गवादः ३९५
नासौ शङ्खः, किन्तु शङ्ख इव, तैमिरिककेशवदिति चेत् ,
-अहो गुणवद्विद्वेषः ! यत् तैमिरिककेशाः करतलपरामर्शनिय-
तार्थक्रिययोरपायान्न सम्भवन्तीति व्यवस्थापयति, इह तु
तत्सम्भवेऽपि शुभ्रतामात्रानुपलम्भादिति ।
व्यापकत्वादिति चेत्, वस्तुनोर्व्याप्तिः ? उपलम्भयोर्वा ?
आद्ये न विप्रतिपत्तिः । न च व्यापकानुपलब्धिमात्रेण व्याप्य-
तदुपलब्धी निवर्तेते, दहनानुपलब्धौ धूमतदुपलब्ध्योरपि
निवृत्तिप्रसङ्गात् । तत्रापि किं न परिकल्पयसि 'धूम इवासौ
होता है। इस प्रकार गुण और गुणीकी समनियत रूपसे सहोपलब्धिका
नियम कहाँ रहा ?
यदि कहो कि—पीतताकी प्रतीतिदशामे वह शङ्ख ही नहीं है, किन्तु
शङ्खजैसा है। जैसे कि तैमिरिक केश वास्तविक केश नहीं रहता है, किन्तु
तिमिर ही केशजैसा प्रतीत होता है—तो यह कैसा तुम्हारा गुणवान्‌से
विद्वेष है कि तैमिरिक केशोंकी सत्ता इसलिए नहीं है कि वे करतलसे
पकड़े नहीं जाते और केशों द्वारा होनेवाली प्रतिनियत अर्थक्रिया उनसे
नहीं होती है, ऐसी व्यवस्था तुम्हीं करते हो तथा यहाँपर उस शङ्खका
करतलसे परामर्श एवं उससे अर्थक्रियाके होनेपर भी केवल श्वेतताकी
उपलब्धि नहीं होनेके कारण शङ्खको असत् कह रहे हो।
यदि कहो—शुभ्रता शङ्खकी व्यापिका है। अर्थात् शङ्खमें शुभ्रता
अवश्य रहेगी, इसलिये दोषवशात् या जैसे भी हो शुभ्रताकी अनुपलब्धि
होनेपर शङ्खकी भी निवृत्ति हो जायगी, तो यहाँ व्याप्ति-सम्बन्ध शुभ्रता
-और शङ्ख इन दोनों वस्तुओं में मानते हो अथवा शुभ्रताकी उपलब्धि
और शङ्खकी उपलब्धिमे ? पहले पक्षमे तो हमे कोई विवाद नहीं है।
अतः व्यापककी निवृत्तिसे व्याप्यकी निवृत्ति भले ही हो किन्तु व्यापककी
अनुपलब्धि मात्रसे व्याप्यकी और उसकी उपलब्धिकी निवृत्ति नहीं हो
हो सकेगी। क्योंकि वैसा होनेपर अग्निकी अनुपलब्धि होनेपर धूमकी
और उसकी उपलब्धिकी निवृत्ति होने लगेगी। अथवा शङ्खके समान
वहां भी क्यों नहीं कल्पना करते हो कि अग्निके नहीं दीखनेपर भी जो