आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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न च पुरुषभेदेन तथैवान्यस्योत्पादः, एकस्य द्वैरूप्याभावात् ।
न चान्यान्य एवासौ, एकदेशतया तत्त्वेन प्रतिसन्धानात् ।
न च सा भ्रान्ता, भिन्नदेशस्य तथाभूतस्य प्रत्यासीदताऽप्यनु-
पलम्भात् । न च निरालम्ब एव तदुपलम्भः, वृक्षादिदेश-
प्रतिनियमानुपपत्तेः ।
होता ही है, इसलिये उससे अभिन्न सभी धर्मोंका ग्रहण भी हो ही
जायगा । ऐसी स्थितिमें ज्ञानोंमें पटुत्व-अपटुत्वका भेद नहीं होना
चाहिये ।
यदि कहो कि—पुरुषभेदसे वृक्षादि वस्तु (धर्मी) ही किसी व्यक्ति
के लिये पटुरूपमें तथा किसी व्यक्तिके लिये अपटुरूपमें उत्पन्न हो जाती
है। अर्थात् पटुत्व-अपटुत्व वस्तुका धर्म है और उसका ग्राहक होनेसे
ज्ञानमें भी पटुत्व-अपटुत्वका व्यवहार हो जाता है । इसलिये एक ही
वस्तु निकटवर्ती पुरुषके प्रति पटरूपमें तथा दूरवर्ती पुरुषके प्रति अपटु-
रूपमें उत्पन्न होती है । अतः पटुत्वअपटुत्वका कारण धर्म-धर्मीका
भेद नहीं है—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि एक वस्तु पुरुषभेदसे
भी दो नहीं हो सकती ।
यदि कहो कि—एक ही दो नहीं हो जाता, किन्तु एक पटु और
दूसरा अपटु, इसप्रकार भिन्न भिन्न दो वृक्ष ही पैदा होते हैं—तो यह भी
नहीं हो सकता । क्योंकि एक ही जगह पर अभिन्नरूपमें उस वृक्षकी
प्रत्यभिज्ञा होती है । अर्थात् निकट जानेपर जिसे दूरसे देखा था,
वही यह वृक्ष है, ऐसी प्रत्यभिज्ञा निकटस्थ व्यक्तिको होती है। यह
बात भी नहीं है कि एकदेशता की और अभिन्नता की प्रतीति भ्रमात्मिका
हो, क्योंकि दूरी और नजदीकीके कारण अपटु और पटु मालूम पड़ने
वाला भी वह वृक्ष निकटस्थ होनेपर भी भिन्न देशस्थ नहीं मालूम पड़ता
किन्तु उसी स्थानमें और वही मालूम पड़ता है । यह भी नहीं हो
सकता कि पटुत्व-अपटुत्वकी उपलब्धि निर्विषयक (शशविषाणज्ञानके
समान असद्विषयक) हो, क्योंकि वैसा होनेपर वृक्षादि-देशके साथ
पटुत्व-अपटुत्वका कोई प्रतिनियम नहीं बन सकेगा । अर्थात् नियतरूपसे
वृक्षादिमें ही पटुत्व-अपटुत्वकी प्रतीति होती है । सर्वथा निर्विषयक