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आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

३३६ आत्मतत्त्वविवेके
सिद्धेरदोष इति चेन्न, स्वतन्त्रसाधनत्वात् । यदि परः सहसैव
नैवमभ्युपगच्छेत्, नूनं साधनमिदं मूच्र्छेत् । यदि च परो
दृष्टिमवधूय दृश्यं तमभ्युपगच्छेत्, एवमपि सम्भवेत् । न चैवं
शक्यम्, तस्य तदुपहितरूपत्वादिति संक्षेप । विस्तरस्त्व-
सन्तोऽक्षणिका इतिवदूहनीयम् ।
यदि कहो कि—नैयायिक आत्माको दृश्य मानते हैं इसलिये उनके
अभ्युपगमको लेकर दृश्यत्व विशेषण होनेसे कोई दोष नहीं है—तो यह
नहीं कह सकते । क्योंकि अनुमान एक स्वतन्त्र साधन है, अतः
दूसरेके अभ्युपगमके आधारपर उसकी प्रवृत्ति नहीं हुआ करती । तर्क
ही ऐसी वस्तु है, जो दूसरेके अभ्युपगमके आधार पर प्रवृत्त होता है ।
क्योंकि उसके द्वारा दूसरेके अभ्युपगममें अनिष्टका आपादान ( प्रसङ्ग )
किया जाता है । इसका कारण यह है कि यदि दूसरेके अभ्युपगमके
आधारपर अनुमान किया जाय तो कदाचित् वह दूसरा व्यक्ति वैसा
अभ्युपगम ही न करे तो निश्चय ही यह हेतु मूच्छित हो जायगा, अर्थात्
स्वरूपासिद्ध हो जायगा ।
एव, यदि दूसरा ( नैयायिक ) दृष्टिके ( उपलब्धके ) अभावमें भी
आत्माको दृश्य माने तो "दृश्यत्वे सति अनुपलब्धे" इस हेतुको
नैयायिकके अभ्युपगमके आधारपर ही सिद्ध मानकर उक्त अनुमान
संभव होता । किन्तु नैयायिक भी दृष्टि ( उपलब्धि ) के अभावमें अर्थात्
अनुपलब्धिकी दशामें तो आत्माको दृश्य मान ही नहीं सकता है ।
क्योंकि दृश्य वही है जो दृष्टिसे उपहित हो । अर्थात् जिसका दर्शन
( उपलम्भ ) होगा, वही दृश्य कहा जा सकता है । इसलिये यदि आत्मा
दृश्य होगा तो उसकी अनुपलब्धि नहीं हो सकती और यदि अनुपलब्धि
होगी तो उसमें दृश्यत्व विशेषण नहीं सिद्ध हो सकता । इस प्रकार
' दृश्यत्वे सति अनुपलब्धे ' यह हेतु सर्वथा असिद्ध है । यह संक्षेपमें
कहा गया । विशेष विस्तारको तो पूर्वमें कहे गये ' जो क्षणिक नहीं है
अर्थात् स्थिर है, वह असत् है" इस अनुमानके समान ही स्वयं समझ
लेना चाहिये । अर्थात् जिस प्रकार वहां कहा गया है कि 'यदि स्थिर-
वस्तुरूप पक्ष सिद्ध है, तो उसमें असत्त्व साध्यका बाध हो जायगा,

अनुपलब्धवादः ३३७
अथात्मसद्भावे किं प्रमाणम् ? प्रत्यक्षमेव तावत् , अह-
मिति विकल्पस्य प्राणभृन्मात्रसिद्धत्वात् । न चायमवस्तुकः
सन्दिग्धवस्तुको वा, अशाब्दत्वादप्रतिषेधाच्च । न च लैङ्गिकः,
अननुसंहितलिङ्गस्यापि स्वप्रत्ययात् । न च स्मृतिरियम् ,
अननुभूते तदनुपपत्तेः ।
यदि असिद्ध है तो आश्रयासिद्धि हो जायगी” वैसे ही यहाँ भी समझना
चाहिये कि “आत्मा नास्ति, अनुपलब्धेः” इस अनुमानमे आत्मारूप पक्ष
यदि सिद्ध है तो आत्माका अस्तित्व ही सिद्ध हो जाता है, इससे “नास्ति”
इस साध्यका बाध हो गया । यदि आत्मारूप पक्ष सिद्ध नहीं है तो पक्षके
असिद्ध होनेसे उक्त अनुमान ही नहीं हो सकेगा ॥
आत्माके सद्भावमें साधक प्रमाण
इसके बाद प्रश्न उठता है कि—आत्माके सद्भावमे पूर्वोक्त बाधक
भले ही न हो सके, किन्तु उसके सद्भावका (अस्तित्वका) साधक
प्रमाण क्या है ? अर्थात् आत्माके अस्तित्वमे प्रमाण नहीं होनेसे भी
नैरात्म्यवाद स्वतः सिद्ध हो जायगा—तो इसका उत्तर यही है कि
आत्माकी सत्तामे प्रत्यक्ष ही प्रमाण है । क्योंकि “अहम्” ऐसा
सविकल्पक प्रत्यक्ष प्राणीमात्रको होता है, जिसमें विषयरूपमे आत्मा ही
भासित होता है । यह नहीं कह सकते कि—उक्त “अहम्” यह प्रतीति
वस्तुके बिना ही होती है, अथवा सन्दिग्ध वस्तु ही उसका विषय बनता
है—क्योंकि “अहम्” यह प्रतीति न तो शाब्द ही है और न तो आगे चल
कर कभी बाधित ही होती है, जिससे वह प्रतीति अवस्तुक हो या सन्दि-
ग्धवस्तुक हो । अर्थात् यदि अबाधित होनेपर भी “अहं-प्रत्यय” अवस्तुक
हो तो सभी नीलादि प्रत्यय अवस्तुक होने लगेंगे ।
“अहं-प्रत्यय” लैङ्गिक (अनुमान) भी नहीं है, क्योंकि लिङ्ग
(व्याप्य) का अनुसन्धान हुए बिना भी “अहम्” ऐसी अपनी प्रतीति
सबको हुआ करती है । अहम् प्रतीति स्मृतिरूप भी नहीं है, क्योंकि
पूर्वमे अनुभव हुए बिना स्मृति नहीं हो सकती है ।
यदि कहो कि—आधुनिक वासनाके प्रभावसे जो स्मृति होती है,
२२

३३८ आत्मतत्त्वविवेके

अनादिवासनावशादनादिरयमवस्तुको विकल्प इत्यपि न
युक्तम्, नीलादिविकल्पसाधारण्यात् । इह वासनामुपादा-
यानाश्वासे प्रमाणान्तरेऽपि कः समाश्वासो यतो नीलादि-
विकल्पेषु समाश्वासः स्यात् ।
तस्माद् वासनामात्रवादं विहायागन्तुकमपि किञ्चित्
कारणं वाच्यम्, तच्चाप्तानाप्तशब्दौ वा लिङ्गतदाभासौ वा
प्रत्यक्षतदाभासौ वेति । तत्र यथा प्रथममध्यमप्रकाराभावा-
न्नीलविकल्पश्चरमं कल्पमालम्बते, तथाऽहमिति विकल्पोऽपि ।

उसके लिये मूलभूत अनुभवकी अपेक्षा है। किन्तु अनादिवासनाके
कारण होनेवाला "अहम्" यह विकल्प अनादि है और वस्तुशून्य है—
तो यह कथन भी युक्त नहीं है। क्योंकि अनादि वासनाको मानकर
यदि 'अहम्' प्रतीतिको वस्तुशून्य और अविश्वसनीय माना जाय तो और
प्रमाणोंका भी क्या विश्वास कि उनके द्वारा होनेवाली नीलादि-प्रतीतियों
पर विश्वास किया जा सके। अर्थात् प्राणीमात्रको होने वाली "अहम्"
इस प्रत्यक्ष प्रतीतिको अविश्वसनीय माननेपर नीलादिविषयक सभी
प्रतीतियाँ अविश्वसनीय हो जायेंगी और हमारा सम्पूर्ण व्यवहार लुप्त
हो जायगा।
इसलिये "उक्त प्रतीतियोंका कारण वासनामात्र है" इस बातको
छोड़कर कुछ आगन्तुक भी कारण मानना होगा। और वह आगन्तुक
कारण आप्त और अनाप्त शब्द हो या लिङ्ग और लिङ्गाभास हो अथवा
प्रत्यक्ष और प्रत्यक्षाभास हो। इन आगन्तुक कारणोंमें जैसे प्रथम
और द्वितीय प्रकारोंको छोड़कर नीलादि-प्रतीतिका आधार प्रत्यक्ष और
प्रत्यक्षाभासरूप अन्तिम प्रकार है, वैसे ही "अहम्" प्रतीतिका भी
आधार निर्विकल्पात्मक प्रत्यक्ष या प्रत्यक्षाभास होगा। इन दोनोंमें भी
यदि "अहम्" प्रतीतिको निर्विकल्पक प्रत्यक्षके अव्यवहित उत्तरकालमें
उत्पन्न माना जाय तो उस निर्विकल्पके समान ही "अहम्" यह
सविकल्पक प्रतीति भी साक्षात् ही सवस्तुक सिद्ध हो जाती है। यदि
तो "अहम्" प्रतीतिका मूल निर्विकल्पक प्रत्यक्षको न मानकर प्रत्यक्षा-

अनुपलब्धवादः ३३९
तत्रायं प्रत्यक्षपृष्ठभावित्वे साक्षादेव सवस्तुकः, तदाभासे तु
मूलेऽस्य पारम्पर्यात् सवस्तुतेति ।
न च बाह्यप्रत्यक्षनिवृत्तावेव निर्मूलत्वम् , बुद्धिविकल्प-
स्यापि तथात्वप्रसङ्गात् । तत्र स्वसंवेदनं मूलमिहापि मानस-
प्रत्यक्षमिवि न कश्चिद् विशेषः ।
शरीरादिवस्तुको भविष्यतीति चेन्न, निरूपाधिशरीरेन्द्रिय-
भासको माना जाय तो भी परम्परा "अहम्" प्रतीति सवस्तुक सिद्ध हो
जाती है । क्योंकि किसी भी भ्रमात्मक ज्ञानके मूलमें प्रमात्मक ज्ञान
भी अवश्य होता है । जैसे, मिथ्यासर्पका ज्ञान तभी होता है, जबकि
वास्तविक सर्पज्ञान भी कहीं है ।
यह भी नहीं कह सकते कि—यदि आत्मा होता तो नीलादिके समान
बहिरिन्द्रियोंके द्वारा जाना जाता । किन्तु आत्मविषयक बाह्यप्रत्यक्षकी
निवृत्ति होनेसे ही यह समझा जाता है कि "अहम्" यह विकल्प सर्वथा
निर्मूल है । अर्थात् परम्परा भी कोई निर्विकल्पकज्ञान इसका मूल
नहीं है । अतः मूलभूत निर्विकल्पकके अभावमे 'अहम्' प्रतीति वस्तुशू-न्य
है—क्योंकि आपका बुद्धि-विकल्प ( बुद्धिकी प्रतीति ) भी तब निर्मूल
हो जायगा और बुद्धिकी भी सत्ता नहीं सिद्ध हो सकेगी । कारण,
उसका भी बाह्य-प्रत्यक्ष नहीं होता है ।
यदि कहो कि—बुद्धि स्वप्रकाश है, इसलिये अपनी सत्तामें वह
स्वयं प्रमाण है । आत्मा तो जड़ होनेसे अपनी सत्तामें अपने आप
प्रमाण नहीं हो सकता, अतः बुद्धि-प्रतीतिका मूल है उसका स्वप्रकाश
होना—तो "अहम्" प्रतीतिका भी मूल आत्माका मानस-प्रत्यक्ष ही है ।
इस प्रकार दोनोंके समूल होनेमें कोई अन्तर नहीं है । अर्थात् आत्मा-
की सत्तामें मानस प्रत्यक्ष ही प्रमाण है ।
यदि कहो कि—'अहम्' प्रतीतिका विषय शरीर आदि होगा न कि
अतिरिक्त चेतन आत्मा—तो यह नहीं कह सकते । क्योंकि बिना किसी
उपाधि ( विशेषण ) के शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि या इनका समुदाय यदि
"अहम्" प्रतीतिका विषय हो तो अतिव्याप्ति हो जायगी । अर्थात् दूसरे

३४० आत्मतत्त्वविवेके

बुद्धितत्समुदायालम्बनत्वेऽतिप्रसङ्गात् स्वसम्बन्धिशरीरादायं
स्यादिति वाच्यम्, तत्र कः स्वार्थ इति वचनीयम् । अन-
न्यत्वं स्वत्वं सर्वभावानाम्, तथा च यदा तेनैव तदनुभूयते
तदा प्रत्येतुः प्रत्येतव्याद्व्यतिरेकादहमिति स्यात् । अतएव
घटादयो न कदाचिदनन्यानुभवितृका इति न कदाप्यहमास्पद-
मिति चेत्, एवन्तर्हि त्वन्मतेऽप्यहंप्रत्ययः शरीरादावारोपरूप एव,
ततः प्रत्येतुरन्यत्वात् ।


के शरीरादिके लिये भी "अहं गौर- काणः" आदि प्रतीति होने लगेगी ।
अतः इस दोषसे बचनेके लिये स्वसम्बन्धी जो शरीरादि, उसे ही इस
'अहम्' प्रत्ययका विषय कहना होगा । अत उसमे स्वशब्दका क्या अर्थ
है?—यह कहना चाहिये । अर्थात् वहां स्वशब्दका अर्थ आत्मा ही
कहना होगा । इसलिए जिस आत्मा का जो शरीर सम्बन्धी होगा,
उस आत्माको उस शरीरमें "अहं गौरः" यह प्रतीति होगी । इस प्रकार
शरीरसे अतिरिक्त आत्माकी सिद्धि हो गयी ।
यदि कहो कि—अनन्य ( अभिन्न ) होना ही सभी भाव-पदार्थोंका
स्वत्व है। अर्थात् अभिन्नमें स्वशब्दका प्रयोग होता है। यद्यपि
सामान्यत अभिन्न कहनेमे भी अतिप्रसङ्गदोषसे छुटकारा नहीं हो पाता
है, फिर भी विशेषरूपसे यों कहा जायगा कि जब उसीके द्वारा उसीका
अनुभव होता है, तब अनुभवित्रा और अनुभूयमानके अभिन्न होनेसे
उस अनुभवित्राके लिये वह अनुभूयमान पदार्थ 'स्व' कहा जायगा तथा
उसमें 'अहं' की प्रतीति होगी । यही कारण है कि घट आदि कभी भी
अनन्यसे अर्थात् अपने आप अनुभूयमान नहीं होते, इसीलिये कभी भी
वे अह-प्रतीतिके आस्पद ( विषय ) नहीं होते हैं—तो इस प्रकार तुम्हारे
मतमे भी शरीरादिमें अहंप्रत्यय आरोपात्मक ही है, वास्तविक नहीं ।
क्योंकि घटादिके समान शरीरादिका भी अनुभवित्रा दूसरा ही है, स्वयं
शरीर नहीं है। इसलिये अह-प्रतीतिका विषय शरीर आदि को
कहना असङ्गत है ।

अनुपलम्भवादः ३४१
बुद्धौ मुख्य एवेति चेन्न, तस्याः क्रियात्वेनानुभूयमानाया
भिन्नस्य कर्तुरहं छिनद्मीतिवत् अहं जानामीत्यनुभवात् । नीलादि-
प्रत्येतव्याकारवत् प्रतिपत्त्या¹कारोऽपि प्रतिपत्तेरेवायमात्मा तथा
भासत इति चेत्, तर्हि प्रत्येतव्यप्रतिपत्त्या¹कारयोस्तुल्ययोगक्षेम-
त्वात् सिद्धं नः समीहितम् ।
अस्तु स्वोपादानमात्रमिति चेन्न, तत्प्रतिभासने तदाकार-
स्यापि प्रतिभासप्रसङ्गात्, आकारमन्तरेणाकारिणोऽनवभासात् ।
यदि कहो कि—बुद्धिरूपविषयमें 'अहं' प्रत्यय मुख्य ही है।
अर्थात् 'अहं' प्रत्ययका विषय बुद्धि है, अतः अतिप्रसङ्गदोष भी नहीं
होगा—तो यह नहीं कह सकते। क्योंकि बुद्धि तो छिदा आदिके
समान क्रियारूपमें ही अनुभूयमान होती है। इसलिये जैसे 'छिनद्मि'
इस व्यवहारमें छिदाक्रियासे भिन्न कर्त्ताका अनुभव होता है, वैसे ही
“जानामि” इस व्यवहारमें भी ज्ञानक्रियासे भिन्न कर्त्ताका अनुभव होता
है, और वही ज्ञानका आधारभूत आत्मा है।
यदि कहो कि—जैसे, नीलादिरूप प्रत्येतव्यका आकार प्रतिपत्ति
(ज्ञान) का ही आत्मा है, उसी प्रकार प्रतिपत्ताका आकारभूत अहन्त्व
भी प्रतिपत्तिका ही आत्मा होता हुआ “जानामि” इति व्यवहारमें
भासित होता है—तब तो नीलादि प्रत्येतव्य-आकार और अहरूप प्रति-
पत्ता-आकार इन दोनोंका तुल्य योगक्षेम होनेसे हमारा अभीष्ट सिद्ध ही
हो गया। अर्थात् जैसे, नीलादि विषय प्रतीतिसे भिन्न है, वैसे ही
प्रतिपत्ता (आत्मा) भी प्रतीतिसे भिन्न ही प्रतीतिको आकार भासित
होता है, यह सिद्ध हो गया। नीलका प्रतीतिसे भिन्नत्व द्वितीय प्रकरणमें
सिद्ध किया जा चुका है।
यदि कहो कि—अहमाकार प्रतिपत्तिका उपादानकारणभूत जो
प्रतिपत्त्यन्तर है, वही अहरूपसे भासित होता है, अतिरिक्त आत्मा नहीं—
तो यह नहीं कह सकते। क्योंकि उपादानभूत उस प्रतिपत्तिका भासित
होनेपर उसके नीलादि-आकारका भी अहं-प्रतीतिमें भान होने लगेगा।
१ प्रतिपत्त्राकार इति पाठ उचितः ।

३५२ आत्मतत्त्वविवेके
प्रवृत्तिसन्तानान्यो बुद्धिमन्तानः प्रतिपत्ता, वयं तमालयविज्ञान-
माचक्ष्मह इति चेत्, अस्तु तर्हि प्रवृत्तिविज्ञानोपादानमनादि-
निधनः प्रतिपत्ता । स किं सन्तन्यमानज्ञानरूपस्तद्विपरीतो चेति
चिन्ताऽवशिष्यते, निःशेषिता चासौ प्रागिति ॥
कः पुनरत्र न्यायः ? प्रतिसन्धानम् ॥
क्योंकि आकारको छोड़कर आकारीका भान नहीं होता है । अर्थात्
अहमाकार प्रतिपत्तिका उपादानकारणभूत प्रतिपत्त्यन्तर यदि नीलादि-
विज्ञान हो और वही अह प्रतीति मे भासित होता हो तो नीलादिविज्ञान-
के साथ साथ नीलादि-विषयका भी अहं-प्रतीतिमे नियमत उल्लेख होना
चाहिये ।
यदि कहो कि—नीलादिविज्ञान प्रवृत्तिविज्ञान है, अतः प्रवृत्ति-
विज्ञानकी धारासे भिन्न जो विज्ञानधारा है, वही अहं-प्रत्ययका उपा-
दानकारण है तथा वही 'प्रतिपत्ताके रूपमें अह-प्रतीतिमे भासित होता
है । उस विज्ञानधाराको हम आलयविज्ञानकी धारा कहते हैं । एव
उस आलयविज्ञानका आकार अहन्त्वमात्र होनेसे अह-प्रतीतिमे नीला-
कारका भानप्रसङ्ग नहीं होगा—तो जिस प्रकार प्रवृत्तिविज्ञान अनादि
अनन्त होता है, वैसे ही उसका उपादानकारणभूत आलयविज्ञानसन्तान
भी अनादि अनन्त ही होगा । ऐसी स्थितिमें वह आलयविज्ञानका
सन्तान (धारा) सन्तन्यमान-विज्ञानरूप होगा या उससे भिन्न
होगा ? यह चिन्ता शेष रह जाती है और उसे भी क्षणभङ्गका
निराकरण करते समय प्रथम प्रकरणमें ही दूर कर चुका हूँ । अर्थात्
आत्माका ज्ञानरूपत्व और क्षणिकत्व खण्डित किया जा चुका है, इसी
लिये सन्तन्यमान ज्ञानसे अतिरिक्त अनादि-अनन्त स्थिर आत्माकी सिद्धि
हो जाती है ॥
आत्मसिद्धिमे अनुमानप्रमाण
( प्रश्न )—क्षणभङ्ग सिद्ध हो या नहीं, स्थिर आत्माकी सिद्धिमें
अनुमान क्या है ?
( उत्तर )—प्रतिसन्धान ( प्रत्यभिज्ञा ) ही वह अनुमान प्रमाण है,

अनुपलब्धवादः ३४३
तथ्यमिदमित्यसिद्धमतथ्यञ्च विरुद्धम्, अविशिष्टमनेकान्ति-
कमिति चेन्न, हेत्वर्थानवबोधात् । न हि प्रत्यभिज्ञानमात्रमत्र
विवक्षितम् । तत् किं कार्यकारणयोरेकसन्तानप्रतिनियमः ?
सोऽपि विरुद्ध इति चेत्, एषोऽपि न विवक्षितो नः । कस्तर्हि ?
जिसके द्वारा स्थिर आत्माकी सिद्धि होती है। अर्थात् प्रतिसन्धान भी
यद्यपि प्रत्यक्ष प्रमाण ही है, फिर भी उसका प्रयोग अनुमानकी छायासे
ही करना चाहिये । जैसे, 'योऽहं रूपमद्राक्षं स एवाहमधुना स्पृशामि"
इस अहम्प्रतीतिका विषय कोई स्थिर आत्मा है, क्योंकि पूर्वकाल और
परकालमे "अहम्" यह प्रत्यभिज्ञा होती है। जिस प्रकार "वही यह
घट है, जिसे कल देखा था" इस प्रत्यभिज्ञाका विषय घट स्थिर होता
है। इस प्रकार प्रत्यभिज्ञारूप हेतुसे अनुमानद्वारा भी स्थिर आत्माकी
सिद्धि हो जाती है।
यदि यह कहो कि-तथ्य (प्रमात्मक) प्रत्यभिज्ञाको हेतु माना
जाय तो यह स्वरूपासिद्ध होगा । क्योंकि क्षणिकविज्ञानको आत्मा
मानने वालेकी दृष्टिमें आत्माविषयक उक्त प्रतिसन्धान (प्रत्यभिज्ञा)
तथ्य नहीं है। कारण, उक्त प्रतिसन्धानद्वारा आत्माका स्थिरत्व प्रति-
पादित हो जाता है, जो उसे अमान्य है। यदि उक्त प्रतिसन्धान अतथ्य
हो तो यह विरुद्ध हेतु होगा। कारण, जो प्रतिसन्धान स्वयं अतथ्य
(भ्रम) है, उससे स्थिर आत्मा कैसे सिद्ध होगा ? यदि उक्त प्रति-
सन्धान न यथार्थ हो और न भ्रम ही हो, किन्तु अविशिष्ट अर्थात् भ्रम-
प्रमा उभय साधारण हो तो वह व्यभिचारी हेतु होगा। अर्थात् जैसे,
"सैवेयं दीपकलिका" यह प्रत्यभिज्ञा क्षण क्षणमे परिवर्तनशील
दीपज्वालाके स्थिरत्वमे प्रमाण नहीं होती है, वैसे ही उक्त प्रत्यभिज्ञा भी
आत्माके स्थिरत्वमे प्रमाण नहीं हो सकती है-तो ऐसा नहीं कह
सकते । क्योंकि तुम हमारे प्रत्यभिज्ञारूप हेतुका अर्थ नहीं समझ सके
हो। कारण, यहा हेतुके रूपमे प्रत्यभिज्ञानमात्र नहीं विवक्षित है
किन्तु "योह रूपमुपलब्धवान सोऽह स्पृशामि" इन पूर्वापर प्रतीतियोँका
एक सन्तान (धारा) गत होना ही विवक्षित है। अर्थात् इससे एक-
धारावाही स्थिर वस्तुका नियमत रहना सूचित होता है।
यदि कहो कि-यह भी हेतु विरुद्ध ही है। अर्थात् पूर्व प्रतीतिसे पर-

३३४ आत्मतत्त्वविवेके
पूर्वोपधियामेककर्त्तृतया विनिश्चयः। एषोऽपि तासामुपादानोपा-
देयभावेनाप्युपपद्यत इति चेन्न, स्थैर्य्यस्थितौ तदभावात्। क्षणि-
कत्वेऽपि नैकजातीयत्वे सति तदुत्पत्तिरेवोपादानोपादेयभावः,
शिष्याचार्य्यधियामपि तथाभावप्रसङ्गात्।
भेदाग्रहे सतीति चेन्न, प्रकृतेऽपि तदभावात्। शरीरभेदाग्रह-
प्रतीति नियत भिन्न होती है। इसलिये पूर्व्वापर प्रतीतियोंके सन्तानसे
भी एक अभिन्न स्थिर आत्मा सिद्ध नहीं हो सकता है—तो यह भी मेरा
विवक्षित नहीं है। किन्तु “योऽहं रूपमद्राक्षं सोऽहं स्पृशामि, योऽहं
घटमन्वभवं सोऽहं स्मरामि” इत्यादि व्यवहारोंमें पूर्व्वापर प्रतीतियोंका
एककर्त्तृत्व निश्चय ही स्थिर आत्माकी सिद्धिमें हेतु है। अर्थात् उक्त
पूर्वापर प्रतीतियोंका विषय एक स्थिर आत्मा है, क्योंकि उनका अनेक
कर्ता नहीं होनेसे एक ही कर्त्ता निश्चित होता है। कारण, चैत्रके
अनुभवसे मैत्रको कदापि स्मरण नहीं होता।
यदि कहो कि—यह भी उन प्रतीतियोंमें परस्पर उपादानोपादेयभाव
होनेसे भी बन सकता है। अर्थात् पूर्व्वापर ज्ञानोंमें जो एककर्तृकत्वका
निश्चय होता है वह इसलिये भी हो सकता है कि उत्तरज्ञानके प्रति
पूर्वज्ञान नियत उपादानकारण होता है। इसलिये पूर्वापर ज्ञानोंका
आश्रयभूत एकस्थिर आत्माकी कल्पना करना व्यर्थ है—तो ऐसा नहीं
कह सकते। क्योंकि भावोंका स्थिरत्व सिद्ध किया जा चुका है।
अत स्थिर-पक्षमें पूर्वज्ञान उत्तरज्ञानका उपादान कारण नहीं हो सकता
है, बल्कि स्थिर आत्मा ही पूर्वापरज्ञानोंका उपादान होगा। क्षणिकवादमें
भी यह नहीं कहा जा सकता कि 'सजातीयसे सजातीयकी उत्पत्तिका
होना ही उपादानोपादेयभाव है' क्योंकि तब शिष्य और आचार्यके
ज्ञानोंमें भी उपादानोपादेयभाव होने लगेगा। कारण, आचार्यके ज्ञानसे
शिष्यका ज्ञान उत्पन्न होता है और वह उसके सजातीय भी होता है।
यदि कहो कि—भेदाग्रहके साथ साथ सजातीयसे सजातीयकी
उत्पत्ति जहां होती है, वहीं उपादानोपादेयभाव होता है। शिष्याचार्य
में तो भेदका ग्रह होनेसे उनके ज्ञानोंमें साजात्य होनेपर भी उपादानोपा
देयभावका प्रसङ्ग नहीं होगा—तो यह भी नहीं कह सकते। क्योंकि

अनुपलम्भवादः ३४५

स्तावदस्तीति चेन्न, भिन्नजन्मज्ञानाव्याप्तेः । अनुपलब्धपितृकेणा-
पि बालेनातिप्रसङ्गात्, घटकपालक्षणयोरतथाभावप्रसङ्गाच्च ।
एकाधारतया नियम¹ इति चेन्न, तस्य वास्तवस्य क्षणिकत्वपक्षे-

पूर्वापर प्रतीतियोंमें भी भेदका अग्रह नहीं रहता किन्तु भेदका ग्रह ही
रहता है। इसलिए उनमें भी आपका अभिमत उपादानोपादेयभाव
नहीं बन सकेगा। यदि कहो कि—बुद्धि सन्तानमे भी शरीरभेदका तो
अग्रह है ही। अर्थात् बुद्धियोंमे भेदग्रह होनेपर भी उपाधिभूत शरीर
तो अभिन्न ही रहता है। अत पूर्वापर प्रतीतियोंमे उपादानोपादेयभाव
होनेमे कोई आपत्ति नहीं है। शिष्याचार्यमे ऐसी बात नहीं है, क्योंकि
वहा उपाधिभूत शरीर भिन्न भिन्न हैं, अत उनकी बुद्धियोंमे उपादानो-
पादेयभावका प्रसङ्ग नहीं हो सकेगा—तो यह भी नहीं कह सकते हो।
क्योंकि भिन्न जन्मकी ज्ञानधारामे उपादानोपादेयभावकी अव्याप्ति हो
जायगी। अर्थात् जातिस्मरताके अनुरोधसे अन्य जन्मकी ज्ञानसन्ततिमें
भी तुम उपादानोपादेयभाव मानते हो किन्तु वहा पूर्वजन्मके शरीरका
इस जन्मके शरीरके साथ भेदका ग्रह होनेसे उन बुद्धियोंमे उपादानो-
पादेयभाव नहीं हो सकेगा।
एव, जिस बालकने पिताका प्रत्यक्ष नहीं हुआ है, वहा पिता-पुत्रके
शरीरोंमे भेदका अग्रह सुतरा सिद्ध है। फिर भी पिता पुत्रके ज्ञानोंमें
उपादानोपादेयभाव नहीं होता है, किन्तु तुम्हारे नियमानुसार शरीरमे
भेदरा अग्रह रहनेसे वहाँ भी उपादानोपादेयभाव होने लगेगा। यदि
वहाँ उपादानोपादेयभाव इष्ट मानो तो पिताके अनुभवसे पुत्रको स्मरण
होने लगेगा। एव, सजातीयमें ही उपाद्योपादेयभाव माननेपर घट
और कपालमें साजात्य नहीं होनेसे वहा उपादानोपादेयभावकी अव्याप्ति
भी हो जायगी।
यदि कहो कि—एकाधारताके साथ साथ जहा कार्यकारणभाव हो,
वहीं उपादानोपादेयभावका नियम है। इसके अनुसार घट कपालका
तथा अपनी बुद्धिधाराका एक आधार होते हुए कार्यकारणभाव होनेसे
उनमे तो उपादानोपादेयभाव होगा। किन्तु शिष्याचार्य एव पिता पुत्रकी


१ तथा नियम इति २ पु० पा०

ऽपि विषमसमयानां क्षणानामभावात्, काल्पनिकश्चेत्त्वतिप्रसञ्ज-
कत्वात्, शरीरबुद्ध्योरपि समानदेशताभिमानात् । एतेन—
“अश्रान्तमसत्तैकावमायः प्रकृतिविक्रिये ।
ततौ हेतुफलस्योपादानोपादेयलक्षणम् ॥”
इति निरस्तम् ।
बुद्धियोंका एक आधार नहीं होनेसे उनमें उपादानोपादेयभावका प्रसङ्ग
नहीं हो सकेगा—तो यह भी नहीं कह सकते । क्योंकि क्षणिकवादमें
असमानकालिक वस्तुओंका वास्तविक एक आधार नहीं हो सकता ।
अर्थात् घट कपालमें देशकृत एकाधारता नहीं हो सकती तथा कालकृत
भी एकाधारता नहीं हो सकती है । क्योंकि तुम्हारे मतमें देशकालके
क्षणिक होनेसे घट कालमें कपालका देश और काल दोनों ही नष्ट हो
गया रहेगा । ऐसी स्थितिमें दैशिक और कालिक दोनों प्रकारकी
एकाधारता नहीं होनेसे घट कपालमें भी उपादानोपादेयभाव नहीं बन
सकेगा ।
यदि घटकपालमे काल्पनिक एकाधारता मानो तो अतिप्रसङ्गदोष
हो जायगा । अर्थात् तन्तु घट और कपाल पटमें भी कदाचित् एका-
धारताका भ्रम हो सकनेसे तन्तु और घटमे तथा कपाल और पटमें भी
उपादानोपादेयभाव होने लगेगा । इसी प्रकार शरीर और बुद्धिमे
भी एकदेशताका भ्रम होनेसे शरीर बुद्धिमें भी उपादानोपादेयभाव
होने लगेगा । क्योंकि शरीरके अवयवमें शरीर और बुद्धि दोनोंके
आश्रित होनेका भ्रम हो सकता है ।
उक्त दोषके कारण यह कथन भी खण्डित हो गया कि—कारण
और कार्यकी सन्ततिमें ( परम्परामें ) दो प्रकारका उपादानोपादेयभाव
होता है । प्रथम, कारण और कार्यमे समानताके कारण अभ्रमात्मक
एकाकारताकी प्रतीति और दूसरा, प्रकृति विकृतिभाव । अर्थात् जहाँ
प्रकृति विकृतिभाव होता है वहा कारण कार्यमें उपादानोपादेयभाव होता
है । जैसे, काष्ठ और अङ्गारमें । एव, समानरूपसे होनेवाली भ्रम
रहित नीलाद्याकार बुद्धिकी सन्तति ( धारा ) में भी उपादानोपादेयभाव
होता है—क्योंकि घट कपालमें एकाकारताकी प्रतीति नहीं होनेसे तथा

चतुर्थ परिच्छेद: अनात्मवाद खण्डन, आत्म-सिद्धि, अपवर्ग स्वरूप व उपसंहार

काष्ठस्य तु¹ प्रकृतेर्विकृतिरङ्गार इति कुतो निश्चितं भवता,
यावता वह्नेरेवायं विकारः किं न स्यात् ? वह्निसम्बन्धिकाष्ठादेव
तदुत्पत्तेरिति चेन्न, काष्ठसम्बन्धेन वह्नेरेव तदुत्पत्तिरित्यपि किं
न कल्प्येत ? पार्थिवं पार्थिवोपादानकमिति निश्चयादिति चेत्,
कुत एतत् ? सभागेषु स्वलक्षणेषु² तथा दर्शनादिति चेत्, एतदपि
कुतः ?
अभ्रान्तसमतैकावसायादिति चेत्, अथ केयं समता नाम ?

विज्ञानसन्ततिमे प्रकृति विकृतिभाव नहीं होनेसे उक्त दोनों ही लक्षण
एक दूसरेके लक्ष्यमे अव्याप्त हैं । एव, समस्त लक्ष्यमे वर्तमान नहीं
होनेसे उक्त दोनों लक्षण अननुगत भी हैं । लक्षणका लक्ष्यमात्रमे अनु-
गत होना आवश्यक है ।
अननुगमके साथ साथ दूसरा दोष यह भी है कि—काष्ठरूप प्रकृति-
का अङ्गार विकार है—यही आपने कैसे निश्चय कर लिया हैं ? जब
कि अग्निका ही विकार अङ्गार क्यों न हो सकता है ? यदि कहें कि—
अग्निसम्बद्ध काष्ठसे ही अङ्गारकी उत्पत्ति होती है, इसलिये काष्ठका
ही विकार अङ्गार है—तो ऐसा नहीं कह सकते हैं । क्योंकि काष्ठसम्बद्ध
अग्निसे ही अङ्गारकी उत्पत्ति होती है, यही कल्पना क्यों न कर ली
जाय ? यदि कहें कि—पार्थिव वस्तुका उपादान पार्थिव ही वस्तु होती
है, यह निश्चित है । अत अङ्गारके पार्थिव होनेसे वह पार्थिव काष्ठसे
ही उत्पन्न हो सकता है, न कि तेज (अग्नि) से—तो यह भी क्यों
है ? अर्थात् सजातीयका सजातीय ही उपादान कारण होता है, यह
निश्चय भी आपको कैसे है ? यदि कहें कि—सजातीय वस्तुओंमें वैसा
ही देखा जाता है । इसलिये काष्ठ-अङ्गार आदि स्थलमे साजात्य ही
उपादानोपादेयभावका नियामक है—तो वैसा देखे जानेका भी क्या
कारण है ?
यदि कहें कि—सजातीय कारण-कार्यकी सन्ततिमे समताके कारण
अभ्रमात्मक एकाकारताकी प्रतीति होनेसे ही वैसा देखा जाता है—


१. च इति दीधितिसम्मत पाठः । २ लक्षणेषु इति ३ पु० पा०

३४८ आत्मतत्त्वविवेके
यदि साजात्यं सादेश्यं वा, तत् प्राङ्निरस्तम् । एकसन्तानत्वं
चेत्, तदपि तदुत्पत्तिमात्रं चेत्, निमित्तनैमित्तिकयोरपि तथाभाव-
प्रसङ्गः¹ । उपादानोपादेयभावश्चेत्, कथं तेनैव तद्व्यवस्था-
प्येत ? ज्ञानेषु तत्प्रतिसन्धानमेवोपादानोपादेयलक्षणमिति चेन्न,
आत्माश्रयप्रसङ्गात् ।
तो बतायें कि यह समता क्या वस्तु है ? यदि कहें कि—साजात्य या
समानदेशत्व ही समता है—तो यह दोनों पूर्वमें खण्डित हो चुका है ।
अर्थात् यदि साजात्य समता है, तो साजात्यसे ही साजात्यका निरूपण
किये जानेसे आत्माश्रय दोष हो जायगा । एवं, यदि समानदेशत्व समता
हो तो पूर्वोक्त एकाधारताके खण्डनसे ही खण्डित है ।
यदि कहो कि—एक सन्तान ( एकधारा ) रूप होना ही समता है—
तो उसका भी अभिप्राय यदि उस कारणसे उस कार्यका उत्पन्न होना हो
तो निमित्तनैमित्तिकमें भी उपादानोपादेयभाव होने लगेगा । अर्थात्
निमित्तकारणसे भी कार्यकी उत्पत्ति होती है, इसलिये निमित्त भी उपा-
दान होने लगेगा । यदि कहें कि—एक सन्तानका अभिप्राय उत्पत्तिमात्र
नहीं है किन्तु उससे उपादानोपादेयभाव विवक्षित है—तो उपादानोपा-
देयभावसे ही उपादानोपादेयभावका व्यवस्थापन कैसे हो सकेगा ?
यदि कहें कि—ज्ञानोंके सम्बन्धमे उनका प्रतिसन्धान ही उपादानो-
पादेयभाव है । अर्थात् घट-कपालादिके सम्बन्धमे जैसा भी उपादानो
पादेयभाव हो किन्तु ज्ञानोंके सम्बन्धमे तो उन्हीं ज्ञानोंमें उपादानोपादेय
भाव होगा, जिनमें एककी प्रत्यभिज्ञा ( प्रतिसन्धान ) अन्य ज्ञानके द्वारा
होती है । क्योंकि क्षणिकविज्ञानवादके अनुसार क्षणिक विज्ञानधाराओंमें
पूर्वविज्ञानका प्रतिसन्धान उससे उत्पन्न होने वाले उत्तरविज्ञानके द्वारा
ही होता है । इसीलिये पूर्वविज्ञान और उत्तरविज्ञानमें उपादानोपादेय-
भाव होता है—तो यह भी नहीं हो सकता, क्योंकि तब आत्माश्रय
दोष हो जायगा । अर्थात् प्रतिसन्धानका नियामक उपादानोपादेयभाव
को मानते हो और उपादानोपादेयभावका स्वरूप प्रतिसन्धानको बताते
१ प्रसङ्गात् इति २ पु० पा० ।

अथानुपलम्भवार्तः ३४९
तद्योग्यतेति चेत्, सैव केति चिन्त्यम् । शक्तिविशेष इति
चेत्, स तावन्न प्रतिक्षणनियत: । यथा हि तेन तत्कर्तव्यं तथा
तादृशापि तत्कर्तव्यमित्यपि नियम एव । अन्यथा तेन तत्कृत-
मित्यपि न निश्चीयेत, क्षणस्य दुरुन्नेयत्वात् । तथा च निरीहं
हो । इस प्रकार स्वय स्वयका ज्ञापक होनेसे आत्माश्रय दोष स्पष्टतः
हो जाता है ।
यदि कहें कि—प्रतिसन्धानकी योग्यता उपादानोपादेयभावका लक्षण
है—तो प्रतिसन्धानकी योग्यता ही तो विचारणीय है कि वह क्या वस्तु
है ? अर्थात् जो स्वय विचारकोटिमे है, वह किसीका लक्षण (परिचायक)
कैसे हो सकता है? यदि कहें कि—बुद्धियोंकी विशेषप्रकारकी शक्ति ही
प्रतिसन्धान योग्यता है । अर्थात् बुद्धियोंमे एक विशेष शक्ति होती है,
जिससे कार्यकारणभावापन्न बुद्धियोंमे प्रतिसन्धानका नियम रहता है ।
किन्तु शिष्याचार्यकी बुद्धियोंमें या पिता-पुत्रकी बुद्धियोंमें वह शक्ति-
विशेष नहीं रहता है, इसीलिये वहा प्रतिसन्धान नहीं होता है—तो वह
शक्तिविशेष प्रतिक्षण नियत नहीं हो सकता है । क्योंकि शक्तिविशेष
कारणत्वरूप ही है तथा उसके अननुगत होनेसे प्रत्येक क्षणिकव्यक्तिमे
उसका ज्ञान होना असंभव है ।
एवं, जैसे उस व्यक्तिके द्वारा वह कार्य होता है, वैसे ही उस व्यक्ति-
की जातिके द्वारा भी वह कार्य होता है—यह भी नियम ही है। अर्थात् जो
व्यक्ति विशेष कारण होता है, उस जातिका दूसरा व्यक्तिविशेष भी कारण
होता ही है—यह भी नियम ही है । अतः शक्तिविशेष (कारणता) प्रति-
व्यक्ति नियत ही होता है—यह कथन असंगत है । क्योंकि उक्त रीतिसे
कारणता व्यक्तिके समान जातिसे भी नियत होती है । यदि कारणता
जातिनियत न मानी जाय, अर्थात् कारणतावच्छेदक कोई जाति न मानी
जाय, तो "अमुक कार्य अमुक व्यक्तिके द्वारा किया गया है" यह भी
निश्चय करना असंभव हो जायगा । क्योंकि क्षणका या अनागतादि
क्षणिकव्यक्तिका ज्ञान ही कठिन है । ऐसी स्थितिमें सम्पूर्ण जगत् चेष्टा-
रहित हो जायगा । क्योंकि कारणताका ज्ञान नहीं होनेसे वस्तुओंमे इष्ट-
साधनता या अनिष्टसाधनताका ज्ञान नहीं होगा तथा उसके बिना प्रवृत्ति

३५० आत्मतत्त्वविवेके
जगज्जायेत, आकस्मिकञ्च कार्यस्य तादृशत्वमापद्येत । तथा च
न नियम उपलभ्येत५ । नापि प्रतिसन्ताननियत: (शक्तिविशेष:),
विशेषाभावात् ।
अस्तु वैजात्यमिति चेन्न, अनुपलब्धिबाधितत्वात् । न हि
या निवृत्ति कुछ भी नहीं हो सकेगी । एव कारणकी नियत जाति नहीं
माननेपर कार्यकी नियतजातीयता भी आकस्मिक (निर्मूल) हो जायगी ।
ऐसी स्थितिमें "धूमजातीय वह्नि जातीयका कार्य (जन्य) है" यह नियम
नहीं बन सकेगा । आशय यह है कि कारण और कार्यकी नियत-
जाति अवश्य माननी होगी । अत: प्रतिसन्धानके प्रति भी बुद्धित्वरूप
से ही कारणता माननी पडेगी । इसप्रकार शिष्याचार्यके बुद्धियोंमें
भी बुद्धित्वजातिके होनेसे परस्पर प्रतिसन्धातृ-प्रतिसन्धेयभाव होने
लगेगा ।
यह भी नहीं कहा जा सकता कि—उक्त शक्तिविशेष प्रतिसन्तान-
नियत है । अर्थात् कार्यकारणभाव (उपादानोपादेयभाव) अथवा
प्रतिसन्धातृप्रतिसन्धेयभाव न प्रतिक्षण (प्रतिव्यक्ति) नियत है और न
जातिनियत है, किन्तु प्रत्येक बुद्धि-सन्तान (बुद्धिधारा) मे अलग अलग
है । इसलिये आचार्यके नीलविषयक बुद्धिसन्तानसे शिष्यका नील-
विषयक बुद्धिसन्तान दूसरा ही है । अत: शिष्याचार्यके बुद्धिसन्तानोंमें
न उपादेयोपादानभावका और न प्रतिसन्धातृप्रतिसन्धेयभावका ही प्रसङ्ग
होगा—क्योंकि आचार्यके नीलबुद्धिसन्तानसे शिष्यके नीलबुद्धिसन्तानमें
पार्थक्यकी नियामिका कोई भी विशेषता नहीं है । ज्ञानत्व या सन्तानत्व
तो दोनोंकी बुद्धियोंमें समान ही है । इसप्रकार आचार्यबुद्धिका प्रति-
सन्धान शिष्यको भी होना चाहिये—यह आपत्ति क्षणिकविज्ञानवादमें
यथापूर्व स्थिर ही रह गयी ।
यदि कहो कि—वैजात्य ही दोनोंमें विशेषताके रूपमें है । अर्थात्
वैजात्य एक जातिविशेष है, जो भिन्न भिन्न बुद्धिसन्तानोंमे भिन्न भिन्न
है—तो यह भी नहीं कह सकते । क्योंकि उस प्रकारकी कोई जाति
५ उपपद्यते इति १ पु० पा०

अनुपलम्भवाद. ३५१
शिष्याचार्यनीलधियोर्मात्रयाऽपि जातिकृतं विशेषमुपलभामहे ।
अदृश्यत्वादयमदोष इति चेन्न, दृश्यसमवायिन्या जातेरदृश्यत्वा-
नुपपत्तेः । उपपत्तौ वा धूमादावपि अवकाशप्रसङ्गात् । तथा
चावान्तरसत्त्ववदवान्तरधूम एव वह्नेः कार्यः स्यात् इति शङ्का-
कलङ्कितत्वात् न (च) धूमसामान्यमग्निं गमयेत् ।
एवमेतत्, आद्यस्यैव तथाभावादिति चेन्न, तत्रापि शङ्काया-
उपलब्ध नहीं होती है । कारण, शिष्य और आचार्यकी नीलविषयक-
बुद्धियोंमें लेशमात्र भी जातिकृत-विशेषता अर्थात् वैजात्यको हम नहीं
पाते हैं । यदि कहो कि—दृश्य वस्तु ही अनुपलब्धिके कारण बाधित
हो जाती है । यहाँपर शिष्याचार्य बुद्धियोंमें जो वैजात्य है, वह
अदृश्य है, इसलिये अनुपलब्धिके कारण वह बाधित नहीं हो सकता
है—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि दृश्यमें समवायसम्बन्धसे रहने
वाली जाति कभी भी अदृश्य नहीं हो सकती है । कारण, दृश्यवर्ती
जाति यदि अदृश्य हो तो धूम आदिमें भी अदृश्यजाति रहने लगेगी ।
ऐसी स्थितिमें क्षणिकविज्ञानरूप अवान्तर आत्माके समान कोई अवान्तर
धूम ही वह्निका कार्य होगा—ऐसी आशङ्का उठ जानेसे धूमसामान्यसे
अग्निसामान्यको अनुमिति नहीं हो सकेगी । अर्थात् जैसे, कारणभूत
दृश्यज्ञानोंमे प्रतिसन्धानकी प्रयोजिका अदृश्यभूत अवान्तर जाति मानते
हो, वैसे ही धूमादि दृश्यकार्योंमे भी वह्निजन्यतावच्छेदिका किसी अवा-
न्तरजातिकी संभावना होनेके कारण धूमसामान्य वह्निसामान्यका कार्य
नहीं हो सकेगा और उस धूमसामान्यसे वह्निसामान्यका अनुमान भी
नहीं हो सकेगा ।
यदि कहो कि—ऐसी ही बात है । अर्थात् अवान्तर-जातिविशेषसे
युक्त धूमविशेषसे ही अग्निका अनुमान होता है न कि धूमसामान्यसे ।
क्योंकि आद्यक्षणवाला धूम ही अग्निसे जन्य है न कि सभी धूम । उत्तर-
क्षणवर्ती धूम तो बौद्धमतमे धूमजन्य ही माना गया है—तो धूममें भी
वह शङ्का वैसे ही अवस्थित रहेगी । अर्थात् उसमें भी किसी अवान्तर
जातिकी शङ्का होनेसे वह भी अग्निका अनुमापक नहीं हो सकेगा ।

३५२ आत्मतत्त्वविवेके

स्तदवस्थत्वात् । तस्मात् कारणस्य वैजात्ये प्रमाणसिद्धे कार्यस्य
सौसादृश्येऽप्यवान्तरजातिभेदः कल्प्यते, हेतुवैजात्यस्य फलवैजा-
त्यं प्रति प्रयोजकत्वात्, अप्रयोजकत्वे तस्याकस्मिकत्वप्रसङ्गात् ।
कारणसाजात्येऽपि कार्यस्य वैजात्यं सहकारिवैजात्ये पर्यवस्यतीति
युक्तमुत्पश्यामः ।
अन्यथा प्रकृते परलोकोऽपि न सिध्येत् । अचेतनोपादा-
नकमपि ज्ञानमवान्तरजातीयं स्यात्, अचेतनमप्यवान्तरजातीय
इसलिये यदि कारणमे वैजात्य प्रमाणद्वारा सिद्ध हो तो कार्यमे
पूर्ण सादृश्य रहनेपर भी अवान्तरजातिभेदकी कल्पना की जाती है ।
क्योंकि कारणगत वैजात्य कार्यगत वैजात्यके प्रति प्रयोजक होता है ।
यदि कारणवैजात्यको कार्यवैजात्यका प्रयोजक न माना जाय तो
कार्यगत वैजात्य आकस्मिक हो जायगा, जो ठीक नहीं है। यदि तो
कारणमे साजात्य होनेपर भी कार्यमें वैजात्य दीख पड़े अर्थात् सजातीय
कारणसे भी विजातीय कार्य उत्पन्न हो तो वहा सहकारियोंके वैजात्यके
कारण वैसा होता है, यह मेरी कल्पना बिल्कुल ठीक है ।
अन्यथा, कारणवैजात्य होनेपर ही यदि कार्यवैजात्यकी कल्पना न की
जाय तथा कार्यवैजात्यके प्रति कारणवैजात्यको प्रयोजक न माना जाय
तो परलोककी भी सिद्धि न हो सकेगी । अर्थात् प्रमाणके बिना ही
यदि वैजात्यकी कल्पना करके कार्यकारणभाव माना जाय तो जन्मान्तर
स्वरूप परलोक भी सिद्ध न हो सकेगा । क्योंकि अनियमके कारण
इसी जन्ममें अकस्मात् ज्ञान सन्तान (ज्ञानधारा) का विश्राम हो जा
सकता है । ऐसी स्थितिमे अविच्छिन्नरूपसे ज्ञानधाराकी परम्पराके
भविष्यमें भी जारी रहनेके कारण आपके द्वारा माना गया जन्मान्तर-
ग्रहणस्वरूप परलोक भी कैसे सिद्ध हो सकेगा ? मूलोक्त 'अपि' शब्दसे
सामान्यव्याप्तिके आधारपर होनेवाले अनुमानकी भी असिद्धि सूचित
होती है ।
एव, उक्त अनियमकी दशामे कोई ऐसा भी विलक्षण ज्ञान सम्भव
होने लगेगा, जो ज्ञानरूप उपादानकारणसे न उत्पन्न होकर अचेतन
घटादिरूप उपादानकारणसे उत्पन्न होता हो। इसी प्रकार अचेतन कोई

ज्ञानोपादानं भवेत्, दृश्यजात्यभेदेऽपि किञ्चिदेव निमित्तं भविष्य-
तीति शङ्कायाः समुत्थापयितुं शक्यत्वादिति ।
अस्त्व तर्हि सहकारिभेदान्नियम इति चेत् , स एवैकः कर्तेति
गीयते । अथैक एव कर्ता न तु तादृक्सहकारिपरम्परेति कुतो
विशेषादिति चेत्, (न,) तत्कर्तृकत्वं भिन्नकर्तृकेभ्यो व्यावर्तते न तु
तादृक्सहकारित्वमित्यतो विशेषात् । कुतश्चिदेवमपि स्यादिति
विजातीय घटादि भी कपालरूप उपादानकारणसे न पैदा होकर ज्ञान-
रूप उपादानकारणसे पैदा होने लगेगा । एव, दृश्यमान धूमत्व-जातिके
एक होनेपर भी कोई धूम अग्निसे होगा और कोई किसी अन्यसे
होगा—ऐसी आशङ्का बराबर उठायी जा सकती है, तथा कभी भी धूमसे
वह्निका अनुमान नहीं हो सकेगा ।
यदि कहो कि—सहकारि-विशेष ही प्रतिसन्धानका नियामक रहे
तथा शिष्याचार्यकी बुद्धियोंमें उस सहकारि-विशेषके नहीं रहनेके कारण
अतिप्रसङ्ग भी नहीं होगा—तो वह सहकारि-विशेष ही तो एक कर्ता
(आत्मा) कहा जाता है। अर्थात् वह सहकारि-विशेष ही पूर्वापर
बुद्धियोंका एक प्रतिसन्धाता (प्रत्यभिज्ञान करनेवाला) आत्मा है।
यदि पूछो कि—ऐसा क्यों माना जाय कि एक ही कर्ता पूर्वसे लेकर
अन्ततक प्रतिसन्धानकर्ताके रूपमें स्थित रहता है न कि वैसे सहकारियों
की परम्परा जारी रहती है—तो यह इस कारण माना जाता है कि
पूर्वापर बुद्धियोंका एक कर्ता माननेपर ही भिन्न कर्त्ताओंकी व्यावृत्ति हो
सकेगी न कि वैसे सहकारियोंकी परम्पराको कर्ता माननेपर । अर्थात्
यदि भिन्न-भिन्न सहकारियोंकी परम्परा ही पूर्वापर बुद्धियोंका कर्ता
होकर उनका प्रतिसन्धान (स्मरण) करनेवाली हो तो चैत्रने जिसे
देखा है, उसका स्मरण मैत्रको भी हो जाय । किन्तु ऐसा नहीं होता
है। इसीकारण एक ही कर्ता माना गया है, सहकारियोंकी परम्परा-
को नहीं।
यदि कहो कि—एक कर्ताके न माननेपर भी किसी विशेषताके कारण
ही तथाविध सहकारियोंकी परम्पराको प्रतिसन्धानका नियामक मानने-
१. सहकारित्वपरम्परेति २ पु० पा०
२३

चेत्, ननु स एव विशेषश्चिन्त्यते । -
स च१ तत्स्वभावत्वं वा, तज्जातीयत्वं वा, तत्सहकारित्वं
वा, तादृक्सहकारित्वं वेत्यतो नातिरिच्यते । तत्र प्रथमोऽसंभवी ।
द्वितीयोऽतिप्रसञ्जकः । चतुर्थे नियामकाभावः । ततस्तृतीय एव
परिशिष्यते, गत्यन्तराभावादिति ।
अथवा सम्भवन्नपि नायमुपाधिः, तत्र तावन्मात्रस्यानिवन्ध-
पर भी शिष्याचार्य बुद्धियों में या चैत्रमैत्रकी बुद्धियोंमें अतिप्रसङ्ग नहीं
होगा—तो उस विशेषताका ही यहाँ विचार किया जा रहा है कि वह
विशेषता क्या वस्तु है ?
क्या पूर्वापर बुद्धियोंका एकस्वभावका होना विशेषता है ? या एक
जातीय होना विशेषता है ? या बुद्धिसन्तानके साथ-साथ एक-एक
सहकारिकी अपेक्षा होना विशेषता है ? अथवा उस निश्चित सहकारीकी
जातिका होना वह विशेषता है ? क्योंकि इससे अतिरिक्त कोई विशेषता
नहीं हो सकती है ।
इनमें प्रथमपक्ष असम्भव है । क्योंकि अत्यन्त भिन्न पूर्वापर-
बुद्धियोंका एक स्वभाव नहीं हो सकता है । द्वितीयपक्षमें अतिप्रसङ्ग
दोष आ जायगा । क्योंकि शिष्य और आचार्यकी बुद्धिया भी एक
जातिकी हैं इसलिये आचार्यकी बुद्धिका स्मरण शिष्यको भी होने
लगेगा । चतुर्थपक्षमे कोई नियामक नहीं है । अर्थात् जिस सहकारीके
कारण चैत्रको अपनी पूर्वापर बुद्धियोंका प्रतिसन्धान होता है, उस
जातिका सहकारी मैत्रको भी सम्भव है, इसलिये चैत्रके देखेका मैत्रको
भी स्मरण होने लगेगा । इसलिये तृतीय ही पक्ष बच जाता है !
क्योंकि उसके सिवाय अन्यगति नहीं है । अर्थात् प्रतिसन्धानके
नियामकके रूपमे बुद्धिसन्तानोंसे भिन्न एक सहकारी मानना होगा, जो
मेरे मतानुसार प्रतिसन्धानकर्ता आत्मा है ।
अथवा यदि बुद्धिसन्तानोंमें परस्पर उपादानोपादेयभाव सम्भव भी
हो तो भी यह प्रतिसन्धानका प्रयोजक नहीं हो सकता है । क्योंकि


१ न च इति १ पु० पा०

तन्मात्रनिबन्धनमिति"?
Wait! Let's check:
"यदन्वयेऽपि यस्यानन्वयः, तत् तन्मात्रनिबन्धनम्" -> "यस्यानन्वयस्तत्तन्मात्रनिबन्धनम्"!
If it is: "यस्यानन्वयस्तत्तन्मात्रनिबन्धनम्":
How was it typeset?
Look at line 6:
यस्यानन्वयस्तत्ता-
Line 7:
न्मात्रनिबन्धनमिति ।
Wait! Look at:
त - त् - ता - / न् - मा - त्र
Why would there be "ता" and "न्"?
Wait, is it "स्तत्ता-"?
Could line 6 be:
यस्यानन्वयस्तत्त्वा-? No.
Wait, let's look at the image at 200%:
Line 6:
यस्यानन्वयस्तत्ता-
Wait, look at the letter between 'य' and the hyphen:
Is it 'स्तत्ता'?
Wait:
स् (half s)
त (ta)
त् (half t)
त (ta)
ा (aa)
hyphen (-)
Wait, look at line 7 first letter:
Could line 7 be:
न्मात्रनिबन्धनमिति ।?
Wait, look at the first letter of line 7:
It is: व? No, look at the shape:
A