आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
बाह्यार्थभङ्गवादः २२१
तद्बाधने बलिनि वेदनये जयश्रीः ।
नो चेदनिन्द्यमिदमीदृशमेव विश्वं
तथ्यं तथागतमतस्य तु कोऽवकाशः ? ॥ १ ॥
तच्चालीकं विचारासहमनिर्वचनीयं वा यमाश्रित्य जग-
दुद्गीयते, स एव विचारश्चिन्त्यतां कोऽसौ कीदृशश्चेति ।
सतर्कं प्रमाणमेव वाक्यारूढमिति चेत्, तच्चेद् विचारासहम्,
किं तेन भौतविचारकल्पेन ।
तथाहि, केनचिद्भौतेन राजद्वारे द्विरदमवलोक्य विक-
ल्पितम्-किमयमन्धकारो मूलकमत्ति ? आहोस्वित् जलवाहो
वलाकान् वर्षति गर्जति च ? यद्वा बान्धवोऽयम् “राजद्वारे
श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः” इति परमाचार्यवचनात् ,
बाह्यार्थबाधे विजयछवि वेदान्तकी ही सिद्ध है ।
यदि यों नहीं, तो विश्व ऐसा ही यथार्थप्रकाश है,
फिर क्या सुगतमतका यहाँ कुछ भी बचा अवकाश है ?
एवं जिसके द्वारा जगत्को विचारासहके रूपमें अथवा अनिर्वचनीय
के रूपमें अलीक कहते हो, उस विचारका ही चिन्तन करो कि वह क्या
है और कैसा है ? यदि—प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन-
रूप पञ्चावयववाक्योपपन्न तर्कसहित प्रमाण ही वह विचार है—तो वह
प्रमाणरूप विचार भी यदि नीलादिके समान ही विचारासह है तो भूता-
विष्टोंके विचारके समान वह विचार भी निष्फल ही है । अर्थात् उसके
द्वारा सिद्ध किया हुआ जगत्का अलीकत्व भी स्वयं मिथ्या हो गया
और फलतः जगत् सत्य ही सिद्ध हो गया ।
जैसे, किसी भूताविष्टने राजाके द्वारपर हाथीको देखकर कल्पना की
कि—क्या यह अन्धकार मूली खा रहा है ? या मेघ बगुलोंकी वर्षा कर
रहा है और गरज रहा है ? या यह कोई बान्धव है ? क्योंकि श्रेष्ठ
आचार्योंका वचन है कि राजाके द्वारपर और श्मशानपर जो रहता है
वह बान्धव है । अथवा जो यह जमीनपर दिखाई देता है, उसीकी
२७२ आत्मतत्त्वविवेके
अथवा योऽयं भूमौ दृश्यते तस्यच्छायेति ?
दूषितश्च—तत्र नाद्यः, शूर्पयुगलप्रस्फोटनानुपपत्तेः १। न
द्वितीयः, तस्य स्तम्भचतुष्टयाभावात् । न तृतीयः, तस्य
लगुडभ्रामणाभावात् । न चतुर्थः, तस्य नरशिरःशतोद्गिर-
णाभावात् । ततो न किञ्चिदिदमिति ।
किमेतावता द्विरदस्वरूपं निवर्त्तताम् ? यद्वा वरमेतस्माद्
योऽय सोऽयमिति वादी द्वितीयो भौतः । तद्विचारसहमिति
चेत्, एव तर्हि स्वयमेव विलीनमलीकादिवादैः, नोत्तरप्रती-
क्षणमपि ।
ऊपरकी तरफ खड़ी हुई छाया है ? ( यहाँ जमीनपर पड़ी छायामे
बिम्बभावका भ्रम तथा वास्तविक बिम्बमे छायाका भ्रम कर रहा है ।
पुन उसीने इन कल्पनाओंका खण्डन भी कर दिया कि प्रथमपक्ष
नहीं हो सकता । क्योंकि यह अन्धकार होता तो सूपोंका फड़फड़ाना
नही हो सकता । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि यह मेघ होता
तो इसके चार खम्भे नहीं होते । तीसरा पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि
यह बान्धव होता तो डण्डा नहीं घुमाता । चतुर्थ पक्ष भी नहीं हो सकता
है, क्योंकि वह भूमिस्थ वस्तुकी छाया होती तो उसमेंसे मनुष्योंके बहुत
से शिर नहीं निकलते । इसलिये यह कुछ भी नहीं है । (यहाँ कानोंमे
सूपका, चारों पैरोंमें स्तम्भका, पूँछमें डण्डेका तथा पुरीषपिण्डोंमे शिरका
भ्रम कर रहा है ) यहाँ पूर्व और उत्तर दोनों ही कथन भ्रम हैं ।
तो क्या इस भौतविचारसे हाथीकी सत्ता समाप्त हो जाती है ?
इससे वह दूसरा भौत ( भूतग्रस्त ) ही अच्छा है, जो “योऽय सोऽम्’
कहता हुआ अनिर्वचनीय बताता है ।
यदि तर्कसहित पञ्चावयववाक्योपपन्न प्रमाणरूप विचारको विचारसह
( विचारसिद्ध ) मानो तो यहीं पर तुम्हारा अलाकवाद बिना उत्तरकी
प्रतीक्षा किये अपने आप विलीन हो गया । अर्थात् तक प्रमाण और
पञ्चावयव वाक्य यदि पारमार्थिक हैं तो इनका विषय वक्ता और
१ प्रस्फोटनाभावात् इति ३ पु० पा० ।
, क्त has that horizontal/slanted shape! So it's clearly युक्तेरनाक्षेपकं!
Wait, what about line 8:
"अनङ्गमिवरत्" vs "अनङ्गमितरत्":
Look at line 8:
अ न ङ्ग म् ? No, look at the glyph:
Wait, could it be "अनङ्गमिवरत्"?
Look at the character after म: it has an i-matra and then a letter with a belly. That letter is definitely व or त. If it's a typo in the original print, let's look at whether it's 'व': yes, it looks very much like 'िव' or 'ित'. In fact, it is printed "अनङ्गमिवरत्" (misprint for अनङ्गमितरत्). Let's print "अनङ्गमिवरत्" (or "अनङ्गमितरत्"). Actually, in scholarly transcriptions, writing what is printed is standard, or "अनङ्गमिवरत् [अनङ्गमितरत्]". But let's look at the letters:
Wait, look at: 'अनङ्गमितरत्' - could the letter after ङ्ग be 'मि'?
Wait! Look at letter 4:
Could letter 4 be 'मि'?
If letter 4 is 'मि', what is letter 5?
Letter 5 is 'त'!
Wait! Is letter 5 'त'?
YES! Look at 'त': it has the exact shape
७२४ आत्मतत्त्वविवेके
अहं मूक इति, इमं न जानामीति, मम कर्णे प्रविश्य गजो
गर्जति भेषजमुच्यतामिति ।
तदर्थश्च साधनं दूषणं च । तत्र साधनं व्याप्तिपक्षधर्म-
तौपयिकरूपपञ्चकोपेतं लिङ्गम्, यथा विशिष्टधूमवत्त्वादिति ।
लिङ्गाभासमितरत्, यथा जलाशयत्वादिति ।
तत्परिकरश्च तर्कः । सोऽपि व्याप्तिबलमालम्ब्यानिष्टप्रसङ्ग-
रूपः । अनिष्टं च द्विविधं प्रामाणिकपरित्यागोऽप्रामाणिकपरि¹-
प्रमाणसे बाधित होनेके कारण "शशो विषाणी" यह वाक्य, स्ववचन-
व्याघातदोषसे "माता वन्ध्या" यह वाक्य, उच्चारणरूप क्रियासे व्या-
घात होनेके कारण "अहं मूकः" यह वाक्य, स्वज्ञानव्याघात होनेसे
"इमं न जानामि" यह वाक्य (क्योंकि ज्ञात विषयको ही "इमम्" शब्द
से व्यवहृत किया जा सकता है, अतः "इमं न जानामि" कहना स्वज्ञान-
व्याहत है), तथा स्वार्थप्रतिषेधक युक्तिका उपस्थापक होनेके कारण
"मम कर्णे प्रविश्य गजो गर्जति, भेषजमुच्यताम्" इत्यादि वाक्य अर्थके
बोधक नहीं होते हैं। यहाँ अन्तिम वाक्यमें कानमें प्रविष्ट हाथीकी
गर्जनाके निवारणार्थ औषधकी जिज्ञासा की गयी है। किन्तु कर्णमें
गजगर्जनरूप निवारणीय वस्तु ही अत्यन्त असत् है। अतः उसके
लिए औषधाभिधान सर्वथा अयोग्य है। अतः यह वाक्य अर्थबोधक
नहीं हो सकता है।
एवं उक्त पञ्चावयव वाक्यका अर्थ (प्रयोजन) है 'स्वपक्षका साधन
तथा परपक्षका दूषण'। इनमें व्याप्ति पक्षधर्मताके सम्पादक पक्षसत्त्व,
सपक्षसत्त्व, विपक्षव्यावृत्तत्व, असत्प्रतिपक्षितत्व और अबाधितत्व नामक
पञ्चरूपोंसे युक्त हेतु ही साधन है, जैसे वह्निको सिद्ध करनेमें अविच्छि-
न्नमूळवाला धूम हेतु। किन्तु उक्त पञ्चरूपोंसे जो रहित होगा, वह
हेतु न होकर हेत्वाभास होगा जैसे वह्नि सिद्ध करनेमें जलाशयत्व
हेत्वाभास होगा न कि हेतु। तथा उसका सहकारी कारण तर्क होता
है। वह तर्क भी व्याप्तिबलके आधारपर अनिष्टापादनस्वरूप है।
१ नाभ्युपगमश्च इति ३ पु० पा० ।
बाह्यार्थभङ्गवादः २२५
ग्रहश्च¹, यथा यद्यदकं पिपासादुःखं न शमयेन्, न पीयेत ।
यदि च तदेव परमन्तर्दहेत्, तदाऽविशिष्टं मामपि दहेत् ।
इतरस्तु तर्काभासः । यथा यदि जलं पिपासादुःखं नाश-
मयिष्यत् रूपवदपि नाभविष्यत्, यथाऽऽकाशम् । यदि च
तदेव परमधक्ष्यत् मामपि सुरभिमकरिष्यदिति ।
दूषणमपि स्वप्रतिक्षेपयुक्तेरनाक्षेपकं दूष्यासाधकत्वा-
विनाभूतं सिद्धं च । यथाऽग्निमत्त्वे साध्ये प्रमेयत्वमनैकान्ति-
और यह अनिष्ट दो प्रकारका होता है, प्रामाणिकका परित्यागरूप तथा
अप्रामाणिकका ग्रहणरूप । जैसे-यदि पानी प्यासके कष्टको नहीं मिटाता
तो उसका पान नहीं किया जाता । यहाँ पानीका पीया जाना प्रामाणिक
है, अतः प्रामाणिकका परित्यागरूप अनिष्टापादन किया गया है । एवं
वही यदि भीतर दाह पैदा करता तो समानन्यायसे मुझमें भी दाह
पैदा करता । यहाँ पानीका दाह पैदा करना अप्रामाणिक है । अतः
अप्रामाणिकका ग्रहणरूप अनिष्टका आपादन किया गया है । यहाँ प्रामा-
णिकका परित्याग तथा अप्रामाणिकका ग्रहणरूप दोनों ही तरहका
अनिष्टापादन व्याप्तिके आधारपर है, अत यह तर्क है ।
किन्तु व्याप्तिबलके बिना ही किया जाने वाला अनिष्टापादन तर्का-
भास है । जैसे-यदि जल प्यासके कष्टको नहीं शान्त करता तो वह
रूपवान् भी नहीं होता, जैसे आकाश । और यदि वही भीतर दाह
पैदा करता तो मुझे भी सुगन्धित कर देता । यहाँ पिपासा शान्त करनेका
रूपवान् होनेके साथ तथा दाह पैदा करनेका सुगन्धित करनेके साथ कोई
व्याप्ति सम्बन्ध नहीं है । अत यह तर्काभास है ।
एव परपक्षका दूषण करनेवाला भी वही होता है, जो स्वार्थप्रति-
क्षेपक युक्तिका उपस्थापक न हो, दूषणीय विषयका निश्चित रूपसे असा-
धक हो तथा स्वय सिद्ध हो अर्थात् असिद्धग्रस्त न हो । जैसे, अग्नि-
साध्यके प्रति व्यभिचारी होनेसे प्रमेयत्व हेतु नहीं होता । अर्थात् यहाँ
दिया गया व्यभिचाररूप दूषण स्वार्थपर आघात करनेवाली युक्तिको
उपस्थित नहीं करता और न दूषणीय वह्निरूप साध्यका साधक ही है
तथा वह्निसाध्यके प्रति प्रमेयत्वहेतुमे व्यभिचारदोष सिद्ध भी है ।
१५
२२६ आत्मतत्त्वविवेके
कत्वादहेतुरिति । अन्यथा तु तदाभासम्, यथाऽयं धूमो
नाग्निसाधकः सर्वथानुपलभ्यमानोपाधिशङ्काग्रस्तत्वात् प्रमेय-
त्वात् विरुद्धत्वाच्चेति ।
इतरदपि प्रमाणमनुमानच्छाययैव विचाराङ्गम्, तर्क-
मन्यथासिद्धिं च पुरस्कृत्य प्रवृत्तेः । ततस्तत्राप्येषैव रीतिरनु-
गन्तव्येति ।
एवं व्यवस्थिते लोकव्यवहारे साधनोपक्रमेण यदि
विचारयसि, प्रतिज्ञैव तावन्नाङ्गं धारयति । तथाहि—न
किञ्चिदस्ति, न किञ्चित् सत्यम्, न किञ्चित् कारकम्, न
इसके विपरीत जो दूषण उक्त तीनों लक्षणोंसे रहित होता है वह
तो दूषण न होकर दूषणाभास होता है । जैसे कोई कहे कि "यह धूम
अग्निका साधक नहीं है, क्योंकि सर्वथा अनुपलभ्यमान उपाधियोंकी
शङ्कासे ग्रस्त है, प्रमेय है तथा अग्निसाध्यके प्रति विरुद्ध है । अर्थात्
यहाँका दूषण अपना ही व्याघातक है । क्योंकि यदि धूम हेतुको सर्वथा
अनुपलभ्यमान उपाधियोंकी आशङ्कासे ग्रस्त माना जाय तो दूषणभूत
तुम्हारा यह सर्वथानुपलभ्यमानोपाधिशङ्काग्रस्तत्वरूप हेतु भी स्वयं
सर्वथानुपलभ्यमानोपाधिशङ्कासे ग्रस्त हो जायगा । एवं जो प्रमेय
होता है वह अग्निका असाधक नहीं होता, क्योंकि धूम प्रमेय होता
हुआ भी तुम्हारे लिये दूषणीयभूत अग्निका साधक ही होता है । तथा
वह्निरूप साध्यके प्रति धूमहेतुको विरुद्ध कहना असिद्ध है ।
प्रत्यक्ष आदि प्रमाण भी अनुमानके समान ही विचारका अङ्ग होते
हैं । क्योंकि तर्क और अनन्यथासिद्धि (व्याप्ति) को लेकर ही उनकी
भी प्रवृत्ति होती है । इसलिये उनमें भी अनुमानकी ही रीतिको अनु-
सरण करना होगा ।
इस प्रकार तर्करूप परिकरकी शुद्धिसहित साधन और दूषणद्वारा
ही लोकव्यवहार होता है, ऐसी व्यवस्था हो जानेपर यदि स्वपक्ष-
साधनके रूपमें विचार करते हो तो तुम्हारी प्रतिज्ञा ही अपने स्वरूपको
कायम नहीं रख सकती है । क्योंकि कोई वस्तु नहीं है, जैसे रज्जुसर्प,
बाह्यार्थभङ्गवादः २२७
किञ्चिद् विचारसहम्, न किञ्चित् सालम्बनम्, न किञ्चिद्
दर्शनम्, न कश्चित् सिद्धान्त इत्यादौ स्वार्थप्रतिक्षेपस्तावद् दुरु-
द्धरः१। प्रतिज्ञाऽपि हि न स्यान्न सत्या, न कारिका, न
विचारसहा, तद्विज्ञानमपि न सालम्बनम्, तत्फलमपि न
दर्शनम्, तदर्थोऽपि न सिद्धान्त इत्यापद्येत ।
इष्यत एवेदमिति चेत्, इच्छामात्रेण व्याघातनिवृत्तेः ।
यदि हि न (ज्ञातं)२ किञ्चिदस्तीत्यादिप्रतिज्ञार्थः प्रतिज्ञां
स्पृशेत्, कथमयमर्थः प्रत्येत्तव्यः ? न चेत्, कथं सानुपपन्ना ?
कोई ज्ञान सत्य नहीं है, जैसे रज्जुसर्पज्ञान, कुछ भी अर्थक्रियाकारक
नहीं है, जैसे शशशृङ्ग; कुछ भी विचारकी कसौटीपर स्थिर रहनेवाला
नहीं है; जैसे प्रतिबिम्ब; कोई भी ज्ञान सालम्बन ( सविषयक ) नहीं है,
जैसे स्वप्नज्ञान, दृश्यरूप वस्तुके अभावमें कोई दर्शनरूप क्रिया भी नहीं
है; जल और अग्निके समान परस्पर व्याघातक होनेके कारण कोई
सिद्धान्त भी नहीं है; इत्यादि प्रकारकी प्रतिज्ञाओंमें स्वार्थप्रतिक्षेपका
वारण अशक्य है। अर्थात् इस प्रकारकी प्रतिज्ञासे उक्तप्रतिज्ञाके ही
स्वरूपपर आघात पहुँच जाता है। क्योंकि जब कुछ नहीं है, तब यह
प्रतिज्ञा भी नहीं है। यदि कोई ज्ञान सत्य नहीं है तो प्रतिज्ञार्थका ज्ञान
भी सत्य नहीं होगा एवं पूर्वोक्त प्रकारसे प्रतिज्ञा भी अर्थक्रियाकारिका
नहीं होगी, विचारसह नहीं होगी, उसका ज्ञान सविषयक नहीं होगा,
उसका फल भी कोई बोध नहीं हो सकता तथा उसका अर्थ भी कोई
सिद्धान्त नहीं हो सकता; इत्यादि आपत्तियां स्वयं प्रतिज्ञाके ऊपर आ
पड़ती हैं।
यदि कहो कि—उक्त सारी बातें इष्ट ही हैं—तो तुम्हारी इच्छामात्रसे
व्याघातकी निवृत्ति नहीं हो सकती है। क्योंकि "न किञ्चिदस्ति"
इत्यादि प्रतिज्ञाओंका अर्थ यदि स्वयं इन प्रतिज्ञाओंपर भी लागू होता हो
तो इनके द्वारा बताये जानेवाले आपके अभीष्ट अर्थकी भी प्रतीति कैसे
हो सकेगी ? यदि उक्त प्रतिज्ञाओंका अर्थ इन प्रतिज्ञाओंको न छूता हो
१. दुर्वार इति १ पु० पा० २. ज्ञातमिति १ पुस्तके नास्ति ।
२२८ आत्मतत्त्वविवेके
तदनुपपन्नत्वे च कथं पुनः प्रतिज्ञार्थ उपपद्येत ? तदिदमा-
यातम्, स्वविषमूर्च्छिता भुजङ्गी आत्मानमेव१ दशतीति ।
तत्त्वत इति विशेषणादयमदोष इति चेत्, तद्विचारो वा
स्यात् लोकमर्यादातिक्रमो वा । प्रथमः पूर्वमेव निरस्तः;
तस्य प्रतिज्ञारूपतया कुलीरस्येव स्वप्रसूतयुक्त्यपत्येनैव प्रतिहत-
त्वात् । द्वितीये तु स्वच्छायातिक्रमवत् स एव व्याघातः । यदि
हि लोकमर्यादातिक्रमः, न विचारस्वरूपस्थितिः । तत्स्वरूप-
स्थितिश्चेत्, न तदतिक्रम२ इत्यर्थः ।
तो स्वयं इनका ही अस्तित्व सिद्ध हो गया, फिर सबका असत्त्व कहाँ
सिद्ध हुआ ? यदि तो सबके साथ इन प्रतिज्ञाओंका भी अस्तित्व न हो
तो इनके द्वारा बताये जानेवाले सर्वासत्त्व आदि आपका अभीष्ट
प्रतिज्ञार्थ भी कैसे सिद्ध हो सकेगा ? अर्थात् आपकी प्रतिज्ञायें अपने ही
स्वार्थकी घातिका बन जाती हैं । इससे यही आया कि अपने ही विषसे
मूर्च्छित हुई प्रतिज्ञासर्पिणी अपने आपको डँस रही है ।
यदि कहो कि—उक्त प्रतिज्ञावाक्योंमें "तत्त्वत" ऐसा विशेषण
देनेसे यह दोष नहीं आ सकता । अर्थात् तत्त्वरूपसे कुछ नहीं है,
यही उन प्रतिज्ञाओंका अर्थ है । इसलिए वस्तुओंकी और इन
प्रतिज्ञावाक्योंकी भी व्यावहारिक सत्ता मानते हैं—तो बताओ, तत्त्वका
अर्थ विचार है या अतात्त्विक लोकमर्यादाका अतिक्रमण ही तत्त्व
है ? प्रथम पक्ष तो पहले ही खण्डित हो चुका है । क्योंकि विचार
तो पूर्वोक्त प्रतिज्ञारूप ही है, जो केंकड़ेके समान स्वयं पैदा की गयी
युक्तिरूपी सन्ततिक ही द्वारा विनष्ट हो चुका है । दूसरे पक्षमें तो
अपनी छायाको लाँघनेके समान फिर वही व्याघात दोष आ जाता है ।
क्योंकि यदि लोकमर्यादाका अतिक्रमण होगा तो विचारका स्वरूप
ही नष्ट हो जायगा और वह दुर्विचार हो जायगा । यदि विचार
स्वरूपको कायम मानो तो लोकमर्यादाका अतिक्रमण नहीं हुआ ।
१ स्वा मानमपि इति २ पु० पा०
२ इति प्रतिषेध्यसिद्ध्यासिद्धिभ्यां व्याघातात् इति १ पु० पा०
बाह्यार्थभङ्गवादः ७२९
प्रतिषेध्यसिद्ध्यसिद्धिब्याघातश्च । यदि हि प्रतिषेध्यं
सिद्धं नात्यन्ताय प्रतिषेधः । न चेन्नतराम् । लोकव्यवहारसि-
द्धमिति चेत्, सिद्धमेव हि तर्हि, नह्यन्यतोऽपि किञ्चित् सिध्यति ।
नायमबाध्यो व्यवहार इति चेत्, न, यदि नैकत्र, अन्यत्रापि¹
तथाभावप्रसङ्गात् ।
सर्वत्र बाध्यत इति चेत्, तदपेक्षसिद्धिना व्यवहारेण ?
यदि कहो कि तत्त्वका अर्थ परमार्थ है, इसलिए उक्त प्रतिज्ञाओंका
अर्थ है कि परमार्थतः कुछ भी सत् नहीं है इत्यादि—तो भी प्रतिषेध्यकी
सिद्धि या असिद्धि उभय दशाओंमें व्याघात दोष आ जाता है । क्योंकि
जिस पदार्थका प्रतिषेध कर रहे हो वह प्रतिषेध्य यदि सिद्ध है, तो उसका
आत्यन्तिक प्रतिषेध नहीं हो सकता है । और यदि वह प्रतिषेध्य वस्तु
असिद्ध है, तब तो सुतराम् प्रतिषेध नहीं हो सकता है । क्योकि निषेधके
प्रति निषेध्यरूप प्रतियोगीका ज्ञान कारण होता है यदि कहो कि—
प्रतिषेध्य वस्तु लोकव्यवहारसे सिद्ध है, अतः उसका प्रतिषेध होनेमे
कोई बाधा नहीं है—तब तो वह वस्तु सिद्ध ही हो गयी । क्योंकि
किसी भी वस्तुकी सिद्धि लोकव्यवहारसे ही होती है, अन्य प्रकार-
से नहीं ।
यदि कहो कि—प्रतियोगीभूत प्रतिषेध्य वस्तु लोकव्यवहारसे सिद्ध
तो है, किन्तु वह लोकव्यवहार अबाध्य नहीं है । अर्थात् प्रतिषेधके लिए
प्रतियोगीके प्रमात्मक ज्ञानकी आवश्यकता नहीं है, किन्तु भ्रमात्मक
प्रतियोगीज्ञानसे प्रतिषेध हो सकता है—तो ऐसा नहीं कह सकते ।
क्योंकि वह लोकव्यवहार यदि एक जगह अबाध्य नहीं है, अर्थात् किसी
एक ही जगह बाध्य है, तो अन्य जगहोंपर उसका अबाध्य होना मानो ।
तात्पर्य यह है कि शुक्तिमें रजतत्व यदि अबाध्य नहीं है, तो बाजारमें
वर्तमान रजत अवश्य अबाध्य है । यदि कहो कि—वह लोकव्यवहार
सिर्फ एक जगह नहीं किन्तु सर्वत्र बाधित है—तो क्या बाध्यभूत वस्तु
की अपेक्षाकर जिसकी सिद्धि है, ऐसे व्यवहारप्रमाणसे वह बाधित
¹ मूले 'अपि' शब्द स्वीकृतिसूचक ।
अतः भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि (८.३.१७) and हशि च (६.१.११४):
अ-कारान्तात् परस्य विसर्गस्य उत्वं भवति हशि परे, ततो गुणः = 'ओ'!
सम्भवः + न = सम्भवो न!
Now look at the glyph again:
Does it have an 'ो'?
Yes! An 'ो' has a vertical purna-danda and a top stroke slanted to the left!
Let's look at that glyph: it has a vertical stroke, and on top, a stroke slanting to the left!
And after the vertical stroke, there is a comma: "सम्भवो,"!
It is unmistakably: "द्वितीयस्त्वसम्भवो,"!
ध्यसिद्धिनिरपेक्षं भवितुं क्षमते । तृतीये तु तद्विपरीतापत्तिः,
Visarga and comma at the end: तद्विपरीतापत्तिः,
विचारबाध्यत्वमुपक्रम्याविचारेण मुद्रणात्१ ।
Footnote marker '१' after मुद्रणात्. Then purna viram '।'.
न चैतदपि निर्व्यूढम् । स ह्ययत्नसिद्धमध्यक्षं वा स्यात्,
Comma at the end: स्यात्,
अनिच्छामात्रं वा । आद्ये विरोधोऽसिद्धिborder...
Wait,
[Header] बाह्यार्थभङ्गवाद २३१
क्रमः, परानिच्छ्या त्वदनिच्छाबाधप्रसङ्गश्चेति ।
एतेन हेतवो निरस्ताः । ते हि ज्ञेयत्वात् ज्ञानत्वात् अस-
च्त्वात् विकल्पानुपपत्तेः प्रत्ययत्वात् कर्मानुपपत्तेः मिथोव्याघा-
तादित्यादयः । एते हि सर्व एव स्वार्थक्रियाप्रतिक्षेपिकां
युक्तिमाक्षिपन्ति निषेध्यसिद्धिश्चापेक्षन्ते । अनैकान्तिकौ च
प्रथमद्वितीयौ, स्वफल एव व्यभिचारात् । असिद्धौ तृतीय-
क्रमण हो जाता है । अर्थात् अनिच्छामात्रसे किसी वस्तुका बाध नहीं
होता, यह लोकसिद्ध नियम है । साथ ही यदि अनिच्छामात्रसे
किसीका बाध हो तो दूसरेको अनिच्छामात्रसे तुम्हारी इस अनिच्छाका
भी बाध हो जायगा ।
इससे अपना ही व्याघातक युक्तियोंके उपस्थापक होनेके कारण
आपके हेतु भी खण्डित हो जाते हैं । क्योंकि ज्ञेयत्व, ज्ञानत्व, असत्त्व,
विकल्पानुपपत्ति, प्रत्ययत्व, कर्मानुपपत्ति और मिथोव्याघात आदि ही
वे हेतु हैं, जिन्हें आपने अपने अभीष्ट साध्योंकी सिद्धिके लिये प्रयुक्त
किया है । ये सभी हेतु अपनी अर्थसिद्धिकी व्याघातिका युक्ति
उपस्थित कर देते हैं और निषेध्यवस्तुकी सिद्धि भी करा देते हैं ।
अर्थात् सबको असत् सिद्ध करनेवाला आपका ज्ञेयत्व हेतु स्वयं ज्ञेय
है या नहीं ? यदि ज्ञेय है, तब तो स्वयं वह हेतु भी असत् हो जायगा,
फिर दूसरेको कैसे असत् सिद्ध कर सकेगा ? यदि वह हेतु अज्ञेय हो
तो वह हेतु ही नहीं हो सकता । क्योंकि अज्ञात होकर कोई हेतु नहीं
होता है । इस प्रकार सभी हेतु अपना ही व्याघातक हो जाते हैं ।
तथा आपकी प्रतिज्ञाओंमें निषेधनीय जो सत्त्व, सत्यत्व, सालम्बनत्व,
कारकत्व, दर्शनत्व और सिद्धान्तत्व आदि हैं, वे यदि कहीं भी सिद्ध
नहीं हैं, तो उनका अभाव भी सिद्ध नहीं हो सकता है । क्योकि अभाव
बुद्धिके प्रति प्रतियोगिबुद्धि कारण होती है । यदि वे कहीं सिद्ध हैं, तो
वे ही सत्, सत्य, सालम्बन आदि सिद्ध हो गये । फिर 'कुछ भी सत्
नहीं है" इत्यादि आपकी प्रतिज्ञायें ही भग्न हो जाती हैं ।
एव, उक्त हेतुओंमें प्रथम ज्ञेयत्वहेतु और द्वितीय ज्ञानत्वहेतु
अनैकान्तिक हो जाते हैं । कारण, अनुमितिरूप अपने फलमे ही उनका
२३२ आत्मतत्त्वविवेके
चतुर्थौ । अनैकान्तिकश्च पञ्चमः, पूर्ववत् । असिद्धो व्या-
घातेनानैकान्तिकश्च षष्ठः । असिद्धोऽनैकान्तिकश्च सप्तमः ।
व्यभिचार हो जाता है । अर्थात् उक्त दोनों हेतुओंका फल है-आपकी
अभीष्ट अनुमिति, जिसे ज्ञेय मानते हुए सत् मानोगे और ज्ञान मानते
हुए सत्य मानोगे । यदि अपनी अनुमितिकी भी सत्ता और सत्यता
तुम न मानो तो, हमारा ही अभीष्ट सिद्ध हो जायगा । क्योंकि मैं
चाहता ही हूँ कि तुम्हारी उक्त अनुमिति ही गलत सिद्ध हो जाय ।
एव, तृतीय असत्त्व और चतुर्थ विकल्पानुपपत्तिरूप हेतु असिद्ध
हैं । क्योंकि पूर्वोक्त प्रमाणोंसे हमने बाह्य सत्त्वको सिद्ध कर दिया
है । साथ ही अबाध्य होनेसे बाह्यवस्तुओंका सत्त्वरूपसे विकल्प भी
सम्भव है ।
एव पाँचवाँ प्रत्ययत्व हेतु भी अनैकान्तिक है । क्योंकि आपकी
अनुमिति ही प्रत्यय होती हुई भी हेतु आदि आलम्बनोंसे युक्त है ।
एव छठा हेतु भी असिद्ध तथा व्याघातके साथ साथ अनैकान्तिक भी
है । अर्थात् ग्राह्यत्वरूप कर्मत्व सिद्ध किया जा चुका है, अतः कर्मत्वा-
नुपपत्तिरूप हेतु असिद्ध है । तथा “कर्मका अभाव होनेसे कोई भी
दर्शन (ज्ञान) नहीं है" इस उक्तिमे व्याघात दोष आ जाता है । क्योंकि
'न किञ्चिद् दर्शनम्' यह एक तुम्हारा साध्य ही है, जो तुम्हारे दर्शन
(ज्ञान) का कर्म है । इस प्रकार तुम्हारा प्रतिज्ञावाक्य स्वय व्याघात-
दोष से ग्रस्त है । साथ ही यह कर्मत्वानुपपत्तिरूप हेतु व्यभिचारी
भी है । क्योंकि फलीभूत प्रकृत अनुमिति ही स्वयं एक दर्शन (ज्ञान)
है, जो “न किञ्चिद्दर्शनम्" इस साध्यको विषय बनाती है तथा तुम्हारे
मतानुसार कर्मत्वानुपपत्तिरूप हेतु वहाँ भी है ।
एव, “न कश्चित् सिद्धान्तो मिथोव्याघातात्” इस अनुमानमें मिथो-
व्याघातरूप सातवाँ हेतु भी असिद्ध है तथा अनैकान्तिक है । असिद्ध
इसलिए कि एक ही सिद्धान्त प्रामाणिक होता है और उसका विरोधी
दूसरा सिद्धान्त तो अप्रामाणिक होता है । जब दोनों विरोधी सिद्धान्तों-
को प्रामाणिक माना जाता, तभी मिथोव्याघात होता । अत मिथो-
व्याघात ही असिद्ध है । अनैकान्तिक इसलिये है कि “न कश्चित्
सिद्धान्तः” यह भी तो एक सिद्धान्त ही है ।
बाह्यार्थभङ्गवादः २३३
सर्व एव कालात्ययापदिष्टा इति ।
एतेन दृष्टान्ता अपि विसर्जनीयाः । ते हि रज्जुसर्पवन्
तज्ज्ञानवत् शशविषाणवत् दर्पणमुखवत् स्वप्नप्रत्ययवत् छेद्यानु-
पपत्तौ छिदावत् मिथः शोषकनिर्वापकानलसलिलवदित्यादयः ।
येन च तत्र पपस्यासत्त्वं, तज्ज्ञानस्य मिथ्यात्वं, शशविषाणस्या-
कारकत्वं, दर्पणमुखस्य विचारासहत्वं, स्वप्नज्ञानस्य निराल-
म्बनत्वं, छेद्यानुपपत्तौ छिदानुपपत्तिश्चावधारितानि; तेनैव तत्र
रज्जोः सत्त्वम्, असर्पज्ञानस्य सत्यत्वं, शशस्यान्यत्र गवादेर्वि-
षाण एव कारकत्वं, दर्पणस्य विचारसहत्वम् , अस्वप्नज्ञानस्य
सालम्बनत्वं, छेद्यनिष्ठा छिदा, सिद्धौ ज्ञानं कर्म चोपरादि-
एवं, उक्त सभी हेतु बाधित भी हैं। क्योंकि प्रमाणद्वारा सर्वासत्त्व-
सर्वोसत्यत्व आदि तुम्हारे साध्योंका अभाव सर्वसत्त्व और सर्वसत्यत्व
ही आदि सिद्ध हैं।
पूर्वोक्त दोषोंसे तुम्हें अपने अनुमानमें दिये दृष्टान्तोंका भी परित्याग
कर देना पड़ेगा। क्योंकि वे दृष्टान्त क्रमशः रज्जुसर्प, उसका ज्ञान,
शशविषाण, दर्पणमुख, स्वप्नज्ञान, छेद्यवस्तुके अभावमें छेदनक्रिया,
तथा परस्परका शोषक और निर्वापक (बुझा देनेवाला) अग्नि एवं जल
आदि हैं। अर्थात् इन्हीं दृष्टान्तोंसे तुम क्रमशः सबको असत्, सभी
ज्ञानको मिथ्या, सबमें अकारकत्व, सबको विचारायोग्य, सबको अना-
लम्बन (निर्विषयक), सबको अदर्शनरूप तथा सबकी असिद्धान्तरूपता
आदि साध्य सिद्ध करते हो। किन्तु उक्त सभी दृष्टान्त दृष्टान्ताभास
होनेसे प्रकृत अनुमानमें उपयोगी नहीं हो सकते हैं।
कारण, जिस प्रमाणसे रज्जुसर्पको असत्, उसके ज्ञानको मिथ्या,
शशविषाणको अकारक, दर्पणमुखको विचारासह, स्वप्नज्ञानको निरा-
लम्बन, छेद्यवस्तुकी अनुपपत्तिमे छेदनक्रियाकी अनुपपत्ति आदिका
निश्चय करते हो, उसी प्रमाणद्वारा रज्जुमें सत्त्व, असर्पज्ञानमें सत्यता,
शशके लोम आदिमे तथा गौकी तो सींगमें ही कारकत्व, दर्पणमें विचार-
सहत्व, स्वप्नभिन्न ज्ञानमे सालम्बनत्व (सविषयकत्व), छेद्य वस्तुमें
२३४ आत्मतत्त्वविवेके
तानि । तदनुपपत्तौ वा साध्यविकलतया सर्व एवैते दृष्टान्ता-
भासाः । अन्तिमस्तु साधनविकल । सिद्धान्तानां व्या-
घातः परस्परविरहरूपत्वलक्षणः । जलानलयोस्तु वध्यघातक-
स्वभावत्वलक्षणः, न च शब्दसाम्येनानुमानमित्येषा दिक् ।
अस्तु तर्हि दूषणोपक्रमेण विचार इति चेत्, तमपि
पश्याम. कीदृशोऽसाविति । नेदं स्थूलं विरुद्धधर्मसंसर्ग
छिदाक्रिया तथा सिद्धिके प्रति ज्ञानको कर्म सिद्ध करते हो । अर्थात्
बाह्यवस्तु सिद्धिका कर्म तुम्हारी दृष्टिमे भले ही न हो सके किन्तु ज्ञानको
सिद्धिका कर्म तुम भी बताते हो । यदि वैसा न हो अर्थात् कहीं सत्त्व
आदिकी प्रसिद्धि न हो तो सत्त्व आदिका अभावरूप साध्य भी प्रसिद्ध
नहीं हो सकता है । इस प्रकार साध्योंकी अप्रसिद्धिके कारण तुम्हारे
सभी दृष्टान्त साध्यविकल ( साध्यशून्य ) होनेसे दृष्टान्ताभास हो जाते
हैं । अर्थात् दृष्टान्त वे ही हो सकते हैं, जहाँ साध्यका निश्चय हो ।
जल और अग्निरूप अन्तिम दृष्टान्त तो हेतुसे ही रहित हैं। क्योंकि
पक्षभूत सिद्धान्तमे जिस प्रकारका व्याघात है, उस प्रकारका व्याघात
दृष्टान्तभूत जलानलमें नहीं है । कारण, सिद्धान्तोंका व्याघात परस्पर
अभावरूप है, जैसे शब्दनित्यत्व-सिद्धान्त और शब्दानित्यत्व-सिद्धान्त
का । किन्तु जलानलरूप दृष्टान्तमे तो वध्यघातकभावरूप व्याघात है ।
अर्थात् जल अग्निका या अग्नि जलका अभावरूप नहीं है, किन्तु एक
दूसरेका वध्य और घातकरूप है । इस प्रकार दृष्टान्तभूत जलानलमें
सिद्धान्तोंवाला व्याघात है ही नहीं । अत यह दृष्टान्त साधनसे शून्य
हो गया । केवल व्याघातशब्दके साम्यमात्रसे वह दृष्टान्त अनुमानो
पयोगी नहीं हो सकता है । इस तरह स्थापनापक्षमें दूषणोंका दिग्दर्शन
कराया गया ।
अवयविनिषेधका खण्डन
यदि कहो कि—परपक्षदूषणके रूपमे ही विचार किया जाय—तो
उस विचार को भी देखते हैं कि वह कैसा है ? जैसे-घटादि बाह्य स्थूल
नहीं है, क्योंकि यदि स्थूल होता तो उसमें विरुद्ध धर्मोंका संसर्ग नहीं
होता । किन्तु घटादिमे एकभागावच्छेदेन ग्रहण और अन्यभागावच्छे-
देन अग्रहणरूप विरुद्धधर्म देखे जाते हैं । अत वह स्थूल एक
प्रसङ्गात्, नास्थूलं तथाप्रतिभासप्रसङ्गात्, न परापेक्षं सदसद्-
व्यतिरेकप्रसङ्गात्, नैकं तथा प्रतिभासप्रसङ्गात्, नानेकं
भेदव्यवस्थितिप्रसङ्गात्, न च व्यापकं निष्क्रियत्वप्रसङ्गात्,
नाव्यापकम् अविधेयत्वप्रसङ्गादित्यादिरिति चेत्, न, मिथो-
अवयवीरूप नहीं हो सकता है। एव, यह घटादि अस्थूल भी नहीं है,
क्योंकि यदि यह अस्थूल हो तो अस्थूलरूपसे प्रतीति होनी चाहिये,
किन्तु नहीं होती है। अर्थात् घटादि-बाह्य स्थूल भी नहीं है और
अस्थूल भी नहीं है तथा इन दोनोंसे विलक्षण कोई प्रकार भी नहीं है।
इसलिये अगत्या सिद्ध हो जाता है कि वह शून्यरूप है।
एवं, यह घटादि परानपेक्ष अर्थात् अहेतुक नहीं है, क्योंकि यदि
यह अहेतुक होता तो यह आकाशके समान सदातन होता अथवा
शशविषाणके समान सदा असत् ही होता। एव, यह परापेक्ष अर्थात्
अपने होनेके लिये हेतुकी अपेक्षा करनेवाला भी नहीं है, क्योंकि वैसा
होता तो यह सत् और असत् दोनोंसे भिन्न होता। अर्थात् कारण-
व्यापारके पूर्व घट सत् होकर नहीं पैदा होता है एव असत् होकर भी
नहीं पैदा होता है, क्योंकि असत् घटकी उत्पत्ति हो तो घटकारणसे
पटकी भी उत्पत्ति होनी चाहिये। कारण, पूर्वमे जैसे घट असत् है,
वैसे ही पट भी असत् है।
एवं, यह घट एक नहीं है, क्योंकि एक होनेपर वैसी प्रतीति होनी
चाहिये। अर्थात् रूपस्पर्शादिका समुदाय ही घट है। वह यदि एक होता
तो रूपादि का विना भान किये केवल घटमात्रका भान होना चाहिये। घट
अनेक भी नहीं है, क्योंकि अनेक होनेमे भेद व्यवस्थित होने लगेगा,
किन्तु भेद तो आगे दूषित किया जाने वाला है। एवं घट व्यापक नहीं
है, क्योंकि व्यापकमें क्रिया नहीं होनेसे वह भी निष्क्रिय होने लगेगा।
घट अव्यापकभी नहीं है, क्योंकि उसमें अविधेयत्वकी प्रसक्ति होने
लगेगी। अर्थात् अव्यापकत्वका अर्थ है, कहीं असत् होना ओर केवल
सत्त्व ही विधेयत्वका ज्ञापक है। अतः अव्यापक (कहीं असत्)
होनेपर घटमे विधेयत्वका अभाव हो जायगा। इत्यादि पूर्वोक्त प्रकारका
तुम्हारा परपक्षदूषणरूप विचार नहीं हो सकता है-क्योंकि मिथोविरोध,
विरोधमूलशैथिल्येष्टापादनानुकूलत्वविपर्ययापर्यवसानैस्तर्काभा-
सत्त्वात् ।
यथा हि नायं पर्वतो निरग्निः निर्धूमत्वप्रसङ्गात्, नाप्य-
ग्निमान् तथोपलब्धिप्रसङ्गात् इत्यनयोरेक आभासः, परस्परा-
र्थप्रतिक्षेपकतयोरुभयोरनाभासत्वानुपपत्ते, तथाऽत्रापि । न
ह्यस्थूलतादिनिषेधादन्यः स्थूलतादिविधिः, तन्निषेधाद्वान्योऽ-
स्थूलतादिविधिरिति ।
मूलशैथिल्य, इष्टापादन, अनुकूलत्व तथा विपर्ययापर्यवसानके कारण
तुम्हारे सभी तर्क तर्काभासरूप हैं । यहाँ मूलशैथिल्यका अर्थ है—तर्कके
मूलभूत जो आपाद्यापादकका व्याप्तिनिश्चय तथा आपादकका अभ्युपगम
है, उनमें दोनोंका अथवा किसी एकका अभाव होना । इष्टापादनका
अर्थ है—वादिस्वीकृत अर्थका ही आपादन करना । अनुकूलत्वका
अर्थ है—वादिस्वीकृत अर्थकी सिद्धिके ही अनुकूल होना । विपर्यया-
पर्यवसानका अर्थ है—व्यतिरेकव्याप्तिका न होना । मिथोविरोधका
अर्थ तो स्पष्ट है ।
जैसे कि—यह पर्वत निरग्नि नहीं है, क्योंकि वैसा होनेपर यह
निर्धूम (धूमरहित) होने लगेगा । एवं यह अग्निमान् भी नहीं है,
क्योंकि यदि अग्निमान् हो तो वैसी उपलब्धि होनी चाहिये । इन दोनों
अनुमानोंमें एक अवश्य आभास है । क्योंकि एक दूसरेका विरोधी
होनेके कारण दोनों अनाभास (सदनुमान) नहीं हो सकते । वैसे ही
यहाँ भी स्थूलत्वनिषेधका अनुमान तथा अस्थूलत्वनिषेधका अनुमान
इन दोनोंमे एक अवश्य आभास है और एक सही है । क्योंकि
अस्थूलतानिषेधसे भिन्न वस्तु स्थूलताकी विधि नहीं है तथा स्थूलता
निषेधसे भिन्न अस्थूलताकी विधि भी नहीं है । अर्थात् यदि अस्थूल-
त्वका निषेध करोगे तो स्थूलत्वका विधान स्वत हो जायगा तथा
स्थूलत्वका निषेध करोगे तो अस्थूलत्वका विधान अवश्य हो जायगा ।
परन्तु एक साथ दोनोंका निषेध परस्पर विरोधी होनेके कारण कथमपि
सम्भव नहीं है ।
बाह्यार्थभङ्गवादः २३७
शिथिलमूलाश्चैते, प्रतिबन्धस्यासिद्धेः। सिद्धौ वा व्याप्य-
व्यापकतदधिकरणानां सिद्धौ विवादनिवृत्तेः। इष्टापादनं च
प्रथमे, अनुभूतावसिते स्थूले विरुद्धधर्मासंसर्गस्येष्टत्वात्। तथा
च वक्ष्यामः।
अनुकूलश्च द्वितीयः, अस्थूलताप्रतिषेधस्य स्थूलतोपलम्भा-
नुग्राहकत्वात् तद्रूपताव्यवहारस्य तथाप्रतिभासव्याप्तत्वाच्च।
एवं तृतीयोऽपि, अनपेक्षत्वप्रतिषेधस्य सापेक्षत्वोपलम्भानुग्राह-
कत्वात् अनपेक्षत्वविधेः सदातनत्वव्याप्तत्वाच्च।
एवं, यहाँके सभी हेतु शिथिलमूल हैं, क्योंकि अनुमानका मूलभूत
साध्यसाधनकी व्याप्ति ही असिद्ध है। कारण, यदि व्याप्ति सिद्ध हो तो
व्याप्तिके प्रयोजक व्याप्य, व्यापक और उनके अधिकरणकी भी सिद्धि
अनायास हो जानेसे सर्वशून्यत्ववाद स्वतः खण्डित हो जाता है। इस
प्रकार हमलोगोंका विवाद ही समाप्त हो जाता है।
एवं, प्रथम "नेदं स्थूलम्" इस अनुमानमें तो मुझे इष्टापत्ति ही है;
क्योंकि निर्विकल्पात्मक अनुभव और सविकल्पात्मक अनुव्यवसायके
द्वारा प्रत्यक्षसिद्ध स्थूलमें विरुद्ध धर्मोंका असंसर्ग तो इष्ट ही है। इस
बातको आगे कहेंगे।
"न अस्थूलम्" यह द्वितीय अनुमान तो मेरे अभीष्टकी सिद्धिके ही
अनुकूल है। क्योंकि अस्थूलताका खण्डन स्थूलतासिद्धिका ही पोषक
है। तथा अस्थूलताका व्यवहार अस्थूलताप्रतीतिसे व्याप्त ही है।
अर्थात् जहाँ वस्तुत अस्थूलता है, वहाँ अस्थूलताकी प्रतीति होती है,
इसमें आपत्ति क्या है?
ऐसा ही "न परानपेक्षम्" यह तृतीय अनुमान भी अनुकूल ही
है। क्योंकि अनपेक्षत्वका खण्डन सापेक्षत्वसिद्धिका ही पोषक है।
तथा अनपेक्षत्वका विधान सदातनत्वसे व्याप्त ही है। अर्थात् जो
वस्तुतः हेत्वनपेक्ष है, वह सदातन भी होता ही है, इसमें भी कोई
आपत्ति नहीं है।
२३८ आत्मतत्त्वविवेके
चतुर्थस्त्वप्रसिद्धव्यापकः, सदसत्त्वस्य विरोधेनैकत्र विधि-
वन्निषेधस्याप्यनुपपत्तेः । पञ्चमस्त्वनुकूल एव, अनेकत्वाभिमते
वस्तुन्येकताप्रतिक्षेपस्यानेकतोपलम्भोपष्टम्भकत्वात् ताद्रूप्य-
व्यवहारस्य तथाप्रतिभासव्याप्तत्वाच्चेति । षष्ठस्त्विष्ट
एवास्माकम् ।
ननु भेदः स्वरूपं वा स्यात्, इतरेतराभावो वा, धर्मान्तरं
वा । न पूर्वः, घटो भिन्न इति सहप्रयोगानुपपत्तेः । नापरः,
"न परापेक्षम्" इस चतुर्थ अनुमानमे आपाद्यभूत व्यापक ही
अप्रसिद्ध है। क्योंकि परापेक्ष माननेमें सदसद्व्यतिरेक (निषेध)
का आपादन किया गया है, जो अनुपपन्न है। कारण, सत्त्व-असत्त्वका
परस्परमें विरोध होनेसे, जैसे एक जगह उनका विधान नहीं हो सकता,
वैसे ही उन दोनोंका एक जगह निषेध भी नहीं रह सकता है।
"न एकम्" यह पञ्चम अनुमान भी अनुकूल ही है। क्योंकि जो
वस्तु अनेकरूपमे अभिमत है, उसमें एकताका खण्डन उसकी अनेकता
सिद्धिका ही पोषक है, तथा एकताका व्यवहार एकताप्रतीतिसे व्याप्त भी
है। अर्थात् जहाँ वस्तुत एकता है, वहाँ एकताकी प्रतीति होनेमे
आपत्ति भी नहीं है।
"नानेक भेदव्यवस्थितिप्रसङ्गात्" यह षष्ठ अनुमान भी तो हमें
इष्ट ही है। क्योकि जो वस्तु अनेक मानी गया है, उसमें भेद भी
व्यवस्थित ही है।
यदि कहो कि—भेद ही नहीं है तो उसकी व्यवस्था कैसे हो सकेगी ?
क्योंकि भेद प्रतियोगिस्वरूप होगा या इतरेतराभावरूप होगा ? अथवा
कोई धर्मान्तर होगा ? इनमें पूर्वपक्ष ठीक नहीं है। क्योकि भेद यदि
घटादिप्रतियोगीस्वरूप हो तो पुनरुक्तिदोषके कारण 'घटो भिन्न" ऐसा
घट और भेदका सहप्रयोग नहीं हो सकता। साथ ही इसमें भेद घटका
विशेषण भी नहीं हो सकता, क्योंकि स्वयं ही कोई अपना विशेषण
नहीं होता है।
प्रतीतावात्माश्रयप्रसङ्गात्, भिन्नप्रतियोगिनिरूपणाद्धि तद्-
भावो निरूप्यस्तन्निरूपणमेव च भेदनिरूपणम् । नोत्तरः, अनव-
स्थाप्रसङ्गात् । तत् कथमसौ व्यवतिष्ठतामिति चेत्—
तत् किं भेदज्ञानमेव नास्ति ? सदपि वा नित्यम् ?
अनित्यमपि¹ वा निर्हेतुकम् ? सहेतुकमपि वा निर्विषयकम् ?
सविषयकमपि वा बाध्यमानविषयकमिति ? तत्र प्रथमः
दूसरा मत भी ठीक नहीं है। कारण, प्रतीतिको लेकर आत्माश्रय
दोषका प्रसङ्ग हो जाता है। क्योंकि परस्पर भिन्नरूपमे प्रतियोगियोंका
ज्ञान होनेपर ही भेदस्वरूप इतरेतराभावका ज्ञान होगा और भेदात्मक
अभावका ज्ञान होनेपर ही भिन्नरूपमे प्रतियोगियोंका ज्ञान हो सकेगा।
इसप्रकार द्वितीयमतमे अन्योन्याश्रयदोष आ जाता है।
तीसरा मत भी ठीक नहीं है। क्योंकि घटपटगत पारस्परिक
भेद यदि कोई धर्मान्तररूप हो तो उभयगत वह धर्मान्तर अभिन्न
है या भिन्न भिन्न है ? यदि अभिन्न है तो उसके योगसे उसका
आश्रयीभूत घटपट परस्पर भिन्न कैसे हो सकते हैं ? यदि वह धर्मा-
न्तर (वैधर्म्य) उभयमे भिन्न भिन्न हो तो उस धर्मान्तररूप भेदमें
एक दूसरा भेद मानना पडेगा। इस प्रकार उसमे भी तीसरा और
तीसरेमे भी चौथा आदि भेद मानना पड़ जानेसे अनवस्थादोष आ
जायगा। अत जब भेद ही असिद्ध है तो पूर्वोक्त षष्ठ अनुमानमे
भेदको व्यवस्थित कहते हुए इष्टापत्ति कैसे दी जा सकती है ?—तो मैं
पूछता हूँ कि क्या भेदज्ञान ही नहीं है ? अथवा होता हुआ भी वह
नित्य है ? या अनित्य होता हुआ भी वह अहेतुक है ? या सहेतुक
होता हुआ भी निर्विषयक है ? अथवा सविषयक होता हुआ भी वह
भेदज्ञान बाध्यमानविषयक है ?
यहाँ सर्वतः विरोध हो जानेसे प्रथमपक्ष ठीक नहीं है। अर्थात्
जो भेदज्ञान सर्वजनानुभवसिद्ध है, उसका निषेध नहीं किया जासकता
है। एव भेदज्ञानका निषेध भी तभी किया जा सकता है, जबकि
१. अनित्यमेव इति २ पु० पा०
सर्वतो विरोधादनुत्तरः। द्वितीयः सुषुप्त्यवस्थानुरोधादुपे-
क्षणीयः। तृतीयोऽपि विरोधादेव। चतुर्थस्तु भेदोल्ले-
खादेव त्याज्यः।
पञ्चमस्तु चिन्त्यते—किमेतेष्वन्यतमात्मा तस्य विषयः ?
तदन्यो वा ? तत्र यद्यन्य एव, किमेताभिर्व्यधिकरणानुपपत्ति-
भिस्तस्य बाध्यते । एवं हि चोरापराधेन व्यक्तमयं माण्डव्य-
निग्रहः स्यात् ।
अथान्यतमात्मा¹, तत्रापि यदि धर्मान्तरमेवेति तत्त्वम्,
प्रतियोगीरूपमें भेदज्ञानकी सत्ता मानी जाय । साथ ही "भेदज्ञान
नहीं है" इस कथनमें स्ववचनविरोध भी है। एव भेदज्ञानके
बिना वादिप्रतिवादियोंकी कथा भी नहीं चल सकती है। अतः प्रथम
पक्ष असङ्गत है।
सुषुप्तिके अनुरोधसे द्वितीयपक्ष उपेक्षणीय है। अर्थात् यदि भेद-
ज्ञान नित्य होता तो सुषुप्ति अवस्था होती ही नहीं। तीसरा पक्ष भी
विरोधके कारण त्याज्य है। अर्थात् जो अनित्य होगा, वह अहेतुक
हो नहीं सकता। चौथा पक्ष भी त्याज्य है, क्योंकि भेदज्ञानमे भेदरूप
विषयका उल्लेख ही है। अतः वह निर्विषयक कहाँ हुआ ? पञ्चम पक्ष
तो विचारणीय है कि भेदज्ञानका विषय पूर्वोक्त स्वरूप, इतरेतराभाव
तथा धर्मान्तर इन तीनोंमे कोई एक है जिसे बाध्यमान बताते हो ? अथवा
इन तीनोंसे अन्य है ? यदि अन्य हो तो अन्यगत पूर्वोक्त सहप्रयोगा-
नुपपत्ति, आत्माश्रय तथा अनवस्थारूप दोषोंसे इन तीनोंका बाध कैसे
हो सकेगा ? क्योंकि सहप्रयोगानुपपत्ति आदि दोष अन्यमे हों और
ये तीनों बाधित किये जायें तो स्पष्ट ही चोरके अपराधसे निरपराध
माण्डव्यको दण्ड देनेके समान यह हो जायगा ।
यदि मानो कि—भेदज्ञानका विषय भेदके पूर्वोक्त तीनों स्वरूपोंमे
ही कोई एक है और वही बाध्यमान है। एव उनमें भी धर्मान्तर
१. अथान्यतमोऽस्य विषय इति २ पु० पा०