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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 274, कुल 530 में से

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पृष्ठ 274

बाह्यार्थभङ्गवादः २२५
ग्रहश्च¹, यथा यद्यदकं पिपासादुःखं न शमयेन्, न पीयेत ।
यदि च तदेव परमन्तर्दहेत्, तदाऽविशिष्टं मामपि दहेत् ।
इतरस्तु तर्काभासः । यथा यदि जलं पिपासादुःखं नाश-
मयिष्यत् रूपवदपि नाभविष्यत्, यथाऽऽकाशम् । यदि च
तदेव परमधक्ष्यत् मामपि सुरभिमकरिष्यदिति ।
दूषणमपि स्वप्रतिक्षेपयुक्तेरनाक्षेपकं दूष्यासाधकत्वा-
विनाभूतं सिद्धं च । यथाऽग्निमत्त्वे साध्ये प्रमेयत्वमनैकान्ति-
और यह अनिष्ट दो प्रकारका होता है, प्रामाणिकका परित्यागरूप तथा
अप्रामाणिकका ग्रहणरूप । जैसे-यदि पानी प्यासके कष्टको नहीं मिटाता
तो उसका पान नहीं किया जाता । यहाँ पानीका पीया जाना प्रामाणिक
है, अतः प्रामाणिकका परित्यागरूप अनिष्टापादन किया गया है । एवं
वही यदि भीतर दाह पैदा करता तो समानन्यायसे मुझमें भी दाह
पैदा करता । यहाँ पानीका दाह पैदा करना अप्रामाणिक है । अतः
अप्रामाणिकका ग्रहणरूप अनिष्टका आपादन किया गया है । यहाँ प्रामा-
णिकका परित्याग तथा अप्रामाणिकका ग्रहणरूप दोनों ही तरहका
अनिष्टापादन व्याप्तिके आधारपर है, अत यह तर्क है ।
किन्तु व्याप्तिबलके बिना ही किया जाने वाला अनिष्टापादन तर्का-
भास है । जैसे-यदि जल प्यासके कष्टको नहीं शान्त करता तो वह
रूपवान् भी नहीं होता, जैसे आकाश । और यदि वही भीतर दाह
पैदा करता तो मुझे भी सुगन्धित कर देता । यहाँ पिपासा शान्त करनेका
रूपवान् होनेके साथ तथा दाह पैदा करनेका सुगन्धित करनेके साथ कोई
व्याप्ति सम्बन्ध नहीं है । अत यह तर्काभास है ।
एव परपक्षका दूषण करनेवाला भी वही होता है, जो स्वार्थप्रति-
क्षेपक युक्तिका उपस्थापक न हो, दूषणीय विषयका निश्चित रूपसे असा-
धक हो तथा स्वय सिद्ध हो अर्थात् असिद्धग्रस्त न हो । जैसे, अग्नि-
साध्यके प्रति व्यभिचारी होनेसे प्रमेयत्व हेतु नहीं होता । अर्थात् यहाँ
दिया गया व्यभिचाररूप दूषण स्वार्थपर आघात करनेवाली युक्तिको
उपस्थित नहीं करता और न दूषणीय वह्निरूप साध्यका साधक ही है
तथा वह्निसाध्यके प्रति प्रमेयत्वहेतुमे व्यभिचारदोष सिद्ध भी है ।
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