आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविरोधमूलशैथिल्येष्टापादनानुकूलत्वविपर्ययापर्यवसानैस्तर्काभा-
सत्त्वात् ।
यथा हि नायं पर्वतो निरग्निः निर्धूमत्वप्रसङ्गात्, नाप्य-
ग्निमान् तथोपलब्धिप्रसङ्गात् इत्यनयोरेक आभासः, परस्परा-
र्थप्रतिक्षेपकतयोरुभयोरनाभासत्वानुपपत्ते, तथाऽत्रापि । न
ह्यस्थूलतादिनिषेधादन्यः स्थूलतादिविधिः, तन्निषेधाद्वान्योऽ-
स्थूलतादिविधिरिति ।
मूलशैथिल्य, इष्टापादन, अनुकूलत्व तथा विपर्ययापर्यवसानके कारण
तुम्हारे सभी तर्क तर्काभासरूप हैं । यहाँ मूलशैथिल्यका अर्थ है—तर्कके
मूलभूत जो आपाद्यापादकका व्याप्तिनिश्चय तथा आपादकका अभ्युपगम
है, उनमें दोनोंका अथवा किसी एकका अभाव होना । इष्टापादनका
अर्थ है—वादिस्वीकृत अर्थका ही आपादन करना । अनुकूलत्वका
अर्थ है—वादिस्वीकृत अर्थकी सिद्धिके ही अनुकूल होना । विपर्यया-
पर्यवसानका अर्थ है—व्यतिरेकव्याप्तिका न होना । मिथोविरोधका
अर्थ तो स्पष्ट है ।
जैसे कि—यह पर्वत निरग्नि नहीं है, क्योंकि वैसा होनेपर यह
निर्धूम (धूमरहित) होने लगेगा । एवं यह अग्निमान् भी नहीं है,
क्योंकि यदि अग्निमान् हो तो वैसी उपलब्धि होनी चाहिये । इन दोनों
अनुमानोंमें एक अवश्य आभास है । क्योंकि एक दूसरेका विरोधी
होनेके कारण दोनों अनाभास (सदनुमान) नहीं हो सकते । वैसे ही
यहाँ भी स्थूलत्वनिषेधका अनुमान तथा अस्थूलत्वनिषेधका अनुमान
इन दोनोंमे एक अवश्य आभास है और एक सही है । क्योंकि
अस्थूलतानिषेधसे भिन्न वस्तु स्थूलताकी विधि नहीं है तथा स्थूलता
निषेधसे भिन्न अस्थूलताकी विधि भी नहीं है । अर्थात् यदि अस्थूल-
त्वका निषेध करोगे तो स्थूलत्वका विधान स्वत हो जायगा तथा
स्थूलत्वका निषेध करोगे तो अस्थूलत्वका विधान अवश्य हो जायगा ।
परन्तु एक साथ दोनोंका निषेध परस्पर विरोधी होनेके कारण कथमपि
सम्भव नहीं है ।