आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवादः ७२९
प्रतिषेध्यसिद्ध्यसिद्धिब्याघातश्च । यदि हि प्रतिषेध्यं
सिद्धं नात्यन्ताय प्रतिषेधः । न चेन्नतराम् । लोकव्यवहारसि-
द्धमिति चेत्, सिद्धमेव हि तर्हि, नह्यन्यतोऽपि किञ्चित् सिध्यति ।
नायमबाध्यो व्यवहार इति चेत्, न, यदि नैकत्र, अन्यत्रापि¹
तथाभावप्रसङ्गात् ।
सर्वत्र बाध्यत इति चेत्, तदपेक्षसिद्धिना व्यवहारेण ?
यदि कहो कि तत्त्वका अर्थ परमार्थ है, इसलिए उक्त प्रतिज्ञाओंका
अर्थ है कि परमार्थतः कुछ भी सत् नहीं है इत्यादि—तो भी प्रतिषेध्यकी
सिद्धि या असिद्धि उभय दशाओंमें व्याघात दोष आ जाता है । क्योंकि
जिस पदार्थका प्रतिषेध कर रहे हो वह प्रतिषेध्य यदि सिद्ध है, तो उसका
आत्यन्तिक प्रतिषेध नहीं हो सकता है । और यदि वह प्रतिषेध्य वस्तु
असिद्ध है, तब तो सुतराम् प्रतिषेध नहीं हो सकता है । क्योकि निषेधके
प्रति निषेध्यरूप प्रतियोगीका ज्ञान कारण होता है यदि कहो कि—
प्रतिषेध्य वस्तु लोकव्यवहारसे सिद्ध है, अतः उसका प्रतिषेध होनेमे
कोई बाधा नहीं है—तब तो वह वस्तु सिद्ध ही हो गयी । क्योंकि
किसी भी वस्तुकी सिद्धि लोकव्यवहारसे ही होती है, अन्य प्रकार-
से नहीं ।
यदि कहो कि—प्रतियोगीभूत प्रतिषेध्य वस्तु लोकव्यवहारसे सिद्ध
तो है, किन्तु वह लोकव्यवहार अबाध्य नहीं है । अर्थात् प्रतिषेधके लिए
प्रतियोगीके प्रमात्मक ज्ञानकी आवश्यकता नहीं है, किन्तु भ्रमात्मक
प्रतियोगीज्ञानसे प्रतिषेध हो सकता है—तो ऐसा नहीं कह सकते ।
क्योंकि वह लोकव्यवहार यदि एक जगह अबाध्य नहीं है, अर्थात् किसी
एक ही जगह बाध्य है, तो अन्य जगहोंपर उसका अबाध्य होना मानो ।
तात्पर्य यह है कि शुक्तिमें रजतत्व यदि अबाध्य नहीं है, तो बाजारमें
वर्तमान रजत अवश्य अबाध्य है । यदि कहो कि—वह लोकव्यवहार
सिर्फ एक जगह नहीं किन्तु सर्वत्र बाधित है—तो क्या बाध्यभूत वस्तु
की अपेक्षाकर जिसकी सिद्धि है, ऐसे व्यवहारप्रमाणसे वह बाधित
¹ मूले 'अपि' शब्द स्वीकृतिसूचक ।