सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 283, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 283

२३४ आत्मतत्त्वविवेके
तानि । तदनुपपत्तौ वा साध्यविकलतया सर्व एवैते दृष्टान्ता-
भासाः । अन्तिमस्तु साधनविकल । सिद्धान्तानां व्या-
घातः परस्परविरहरूपत्वलक्षणः । जलानलयोस्तु वध्यघातक-
स्वभावत्वलक्षणः, न च शब्दसाम्येनानुमानमित्येषा दिक् ।
अस्तु तर्हि दूषणोपक्रमेण विचार इति चेत्, तमपि
पश्याम. कीदृशोऽसाविति । नेदं स्थूलं विरुद्धधर्मसंसर्ग
छिदाक्रिया तथा सिद्धिके प्रति ज्ञानको कर्म सिद्ध करते हो । अर्थात्
बाह्यवस्तु सिद्धिका कर्म तुम्हारी दृष्टिमे भले ही न हो सके किन्तु ज्ञानको
सिद्धिका कर्म तुम भी बताते हो । यदि वैसा न हो अर्थात् कहीं सत्त्व
आदिकी प्रसिद्धि न हो तो सत्त्व आदिका अभावरूप साध्य भी प्रसिद्ध
नहीं हो सकता है । इस प्रकार साध्योंकी अप्रसिद्धिके कारण तुम्हारे
सभी दृष्टान्त साध्यविकल ( साध्यशून्य ) होनेसे दृष्टान्ताभास हो जाते
हैं । अर्थात् दृष्टान्त वे ही हो सकते हैं, जहाँ साध्यका निश्चय हो ।
जल और अग्निरूप अन्तिम दृष्टान्त तो हेतुसे ही रहित हैं। क्योंकि
पक्षभूत सिद्धान्तमे जिस प्रकारका व्याघात है, उस प्रकारका व्याघात
दृष्टान्तभूत जलानलमें नहीं है । कारण, सिद्धान्तोंका व्याघात परस्पर
अभावरूप है, जैसे शब्दनित्यत्व-सिद्धान्त और शब्दानित्यत्व-सिद्धान्त
का । किन्तु जलानलरूप दृष्टान्तमे तो वध्यघातकभावरूप व्याघात है ।
अर्थात् जल अग्निका या अग्नि जलका अभावरूप नहीं है, किन्तु एक
दूसरेका वध्य और घातकरूप है । इस प्रकार दृष्टान्तभूत जलानलमें
सिद्धान्तोंवाला व्याघात है ही नहीं । अत यह दृष्टान्त साधनसे शून्य
हो गया । केवल व्याघातशब्दके साम्यमात्रसे वह दृष्टान्त अनुमानो
पयोगी नहीं हो सकता है । इस तरह स्थापनापक्षमें दूषणोंका दिग्दर्शन
कराया गया ।
अवयविनिषेधका खण्डन
यदि कहो कि—परपक्षदूषणके रूपमे ही विचार किया जाय—तो
उस विचार को भी देखते हैं कि वह कैसा है ? जैसे-घटादि बाह्य स्थूल
नहीं है, क्योंकि यदि स्थूल होता तो उसमें विरुद्ध धर्मोंका संसर्ग नहीं
होता । किन्तु घटादिमे एकभागावच्छेदेन ग्रहण और अन्यभागावच्छे-
देन अग्रहणरूप विरुद्धधर्म देखे जाते हैं । अत वह स्थूल एक