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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 281, कुल 530 में से

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पृष्ठ 281

२३२ आत्मतत्त्वविवेके

चतुर्थौ । अनैकान्तिकश्च पञ्चमः, पूर्ववत् । असिद्धो व्या-
घातेनानैकान्तिकश्च षष्ठः । असिद्धोऽनैकान्तिकश्च सप्तमः ।
व्यभिचार हो जाता है । अर्थात् उक्त दोनों हेतुओंका फल है-आपकी
अभीष्ट अनुमिति, जिसे ज्ञेय मानते हुए सत् मानोगे और ज्ञान मानते
हुए सत्य मानोगे । यदि अपनी अनुमितिकी भी सत्ता और सत्यता
तुम न मानो तो, हमारा ही अभीष्ट सिद्ध हो जायगा । क्योंकि मैं
चाहता ही हूँ कि तुम्हारी उक्त अनुमिति ही गलत सिद्ध हो जाय ।
एव, तृतीय असत्त्व और चतुर्थ विकल्पानुपपत्तिरूप हेतु असिद्ध
हैं । क्योंकि पूर्वोक्त प्रमाणोंसे हमने बाह्य सत्त्वको सिद्ध कर दिया
है । साथ ही अबाध्य होनेसे बाह्यवस्तुओंका सत्त्वरूपसे विकल्प भी
सम्भव है ।
एव पाँचवाँ प्रत्ययत्व हेतु भी अनैकान्तिक है । क्योंकि आपकी
अनुमिति ही प्रत्यय होती हुई भी हेतु आदि आलम्बनोंसे युक्त है ।
एव छठा हेतु भी असिद्ध तथा व्याघातके साथ साथ अनैकान्तिक भी
है । अर्थात् ग्राह्यत्वरूप कर्मत्व सिद्ध किया जा चुका है, अतः कर्मत्वा-
नुपपत्तिरूप हेतु असिद्ध है । तथा “कर्मका अभाव होनेसे कोई भी
दर्शन (ज्ञान) नहीं है" इस उक्तिमे व्याघात दोष आ जाता है । क्योंकि
'न किञ्चिद् दर्शनम्' यह एक तुम्हारा साध्य ही है, जो तुम्हारे दर्शन
(ज्ञान) का कर्म है । इस प्रकार तुम्हारा प्रतिज्ञावाक्य स्वय व्याघात-
दोष से ग्रस्त है । साथ ही यह कर्मत्वानुपपत्तिरूप हेतु व्यभिचारी
भी है । क्योंकि फलीभूत प्रकृत अनुमिति ही स्वयं एक दर्शन (ज्ञान)
है, जो “न किञ्चिद्दर्शनम्" इस साध्यको विषय बनाती है तथा तुम्हारे
मतानुसार कर्मत्वानुपपत्तिरूप हेतु वहाँ भी है ।
एव, “न कश्चित् सिद्धान्तो मिथोव्याघातात्” इस अनुमानमें मिथो-
व्याघातरूप सातवाँ हेतु भी असिद्ध है तथा अनैकान्तिक है । असिद्ध
इसलिए कि एक ही सिद्धान्त प्रामाणिक होता है और उसका विरोधी
दूसरा सिद्धान्त तो अप्रामाणिक होता है । जब दोनों विरोधी सिद्धान्तों-
को प्रामाणिक माना जाता, तभी मिथोव्याघात होता । अत मिथो-
व्याघात ही असिद्ध है । अनैकान्तिक इसलिये है कि “न कश्चित्
सिद्धान्तः” यह भी तो एक सिद्धान्त ही है ।