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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 530 में से

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पृष्ठ 284

प्रसङ्गात्, नास्थूलं तथाप्रतिभासप्रसङ्गात्, न परापेक्षं सदसद्-
व्यतिरेकप्रसङ्गात्, नैकं तथा प्रतिभासप्रसङ्गात्, नानेकं
भेदव्यवस्थितिप्रसङ्गात्, न च व्यापकं निष्क्रियत्वप्रसङ्गात्,
नाव्यापकम् अविधेयत्वप्रसङ्गादित्यादिरिति चेत्, न, मिथो-
अवयवीरूप नहीं हो सकता है। एव, यह घटादि अस्थूल भी नहीं है,
क्योंकि यदि यह अस्थूल हो तो अस्थूलरूपसे प्रतीति होनी चाहिये,
किन्तु नहीं होती है। अर्थात् घटादि-बाह्य स्थूल भी नहीं है और
अस्थूल भी नहीं है तथा इन दोनोंसे विलक्षण कोई प्रकार भी नहीं है।
इसलिये अगत्या सिद्ध हो जाता है कि वह शून्यरूप है।
एवं, यह घटादि परानपेक्ष अर्थात् अहेतुक नहीं है, क्योंकि यदि
यह अहेतुक होता तो यह आकाशके समान सदातन होता अथवा
शशविषाणके समान सदा असत् ही होता। एव, यह परापेक्ष अर्थात्
अपने होनेके लिये हेतुकी अपेक्षा करनेवाला भी नहीं है, क्योंकि वैसा
होता तो यह सत् और असत् दोनोंसे भिन्न होता। अर्थात् कारण-
व्यापारके पूर्व घट सत् होकर नहीं पैदा होता है एव असत् होकर भी
नहीं पैदा होता है, क्योंकि असत् घटकी उत्पत्ति हो तो घटकारणसे
पटकी भी उत्पत्ति होनी चाहिये। कारण, पूर्वमे जैसे घट असत् है,
वैसे ही पट भी असत् है।
एवं, यह घट एक नहीं है, क्योंकि एक होनेपर वैसी प्रतीति होनी
चाहिये। अर्थात् रूपस्पर्शादिका समुदाय ही घट है। वह यदि एक होता
तो रूपादि का विना भान किये केवल घटमात्रका भान होना चाहिये। घट
अनेक भी नहीं है, क्योंकि अनेक होनेमे भेद व्यवस्थित होने लगेगा,
किन्तु भेद तो आगे दूषित किया जाने वाला है। एवं घट व्यापक नहीं
है, क्योंकि व्यापकमें क्रिया नहीं होनेसे वह भी निष्क्रिय होने लगेगा।
घट अव्यापकभी नहीं है, क्योंकि उसमें अविधेयत्वकी प्रसक्ति होने
लगेगी। अर्थात् अव्यापकत्वका अर्थ है, कहीं असत् होना ओर केवल
सत्त्व ही विधेयत्वका ज्ञापक है। अतः अव्यापक (कहीं असत्)
होनेपर घटमे विधेयत्वका अभाव हो जायगा। इत्यादि पूर्वोक्त प्रकारका
तुम्हारा परपक्षदूषणरूप विचार नहीं हो सकता है-क्योंकि मिथोविरोध,