आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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कत्वादहेतुरिति । अन्यथा तु तदाभासम्, यथाऽयं धूमो
नाग्निसाधकः सर्वथानुपलभ्यमानोपाधिशङ्काग्रस्तत्वात् प्रमेय-
त्वात् विरुद्धत्वाच्चेति ।
इतरदपि प्रमाणमनुमानच्छाययैव विचाराङ्गम्, तर्क-
मन्यथासिद्धिं च पुरस्कृत्य प्रवृत्तेः । ततस्तत्राप्येषैव रीतिरनु-
गन्तव्येति ।
एवं व्यवस्थिते लोकव्यवहारे साधनोपक्रमेण यदि
विचारयसि, प्रतिज्ञैव तावन्नाङ्गं धारयति । तथाहि—न
किञ्चिदस्ति, न किञ्चित् सत्यम्, न किञ्चित् कारकम्, न
इसके विपरीत जो दूषण उक्त तीनों लक्षणोंसे रहित होता है वह
तो दूषण न होकर दूषणाभास होता है । जैसे कोई कहे कि "यह धूम
अग्निका साधक नहीं है, क्योंकि सर्वथा अनुपलभ्यमान उपाधियोंकी
शङ्कासे ग्रस्त है, प्रमेय है तथा अग्निसाध्यके प्रति विरुद्ध है । अर्थात्
यहाँका दूषण अपना ही व्याघातक है । क्योंकि यदि धूम हेतुको सर्वथा
अनुपलभ्यमान उपाधियोंकी आशङ्कासे ग्रस्त माना जाय तो दूषणभूत
तुम्हारा यह सर्वथानुपलभ्यमानोपाधिशङ्काग्रस्तत्वरूप हेतु भी स्वयं
सर्वथानुपलभ्यमानोपाधिशङ्कासे ग्रस्त हो जायगा । एवं जो प्रमेय
होता है वह अग्निका असाधक नहीं होता, क्योंकि धूम प्रमेय होता
हुआ भी तुम्हारे लिये दूषणीयभूत अग्निका साधक ही होता है । तथा
वह्निरूप साध्यके प्रति धूमहेतुको विरुद्ध कहना असिद्ध है ।
प्रत्यक्ष आदि प्रमाण भी अनुमानके समान ही विचारका अङ्ग होते
हैं । क्योंकि तर्क और अनन्यथासिद्धि (व्याप्ति) को लेकर ही उनकी
भी प्रवृत्ति होती है । इसलिये उनमें भी अनुमानकी ही रीतिको अनु-
सरण करना होगा ।
इस प्रकार तर्करूप परिकरकी शुद्धिसहित साधन और दूषणद्वारा
ही लोकव्यवहार होता है, ऐसी व्यवस्था हो जानेपर यदि स्वपक्ष-
साधनके रूपमें विचार करते हो तो तुम्हारी प्रतिज्ञा ही अपने स्वरूपको
कायम नहीं रख सकती है । क्योंकि कोई वस्तु नहीं है, जैसे रज्जुसर्प,