आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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अथवा योऽयं भूमौ दृश्यते तस्यच्छायेति ?
दूषितश्च—तत्र नाद्यः, शूर्पयुगलप्रस्फोटनानुपपत्तेः १। न
द्वितीयः, तस्य स्तम्भचतुष्टयाभावात् । न तृतीयः, तस्य
लगुडभ्रामणाभावात् । न चतुर्थः, तस्य नरशिरःशतोद्गिर-
णाभावात् । ततो न किञ्चिदिदमिति ।
किमेतावता द्विरदस्वरूपं निवर्त्तताम् ? यद्वा वरमेतस्माद्
योऽय सोऽयमिति वादी द्वितीयो भौतः । तद्विचारसहमिति
चेत्, एव तर्हि स्वयमेव विलीनमलीकादिवादैः, नोत्तरप्रती-
क्षणमपि ।
ऊपरकी तरफ खड़ी हुई छाया है ? ( यहाँ जमीनपर पड़ी छायामे
बिम्बभावका भ्रम तथा वास्तविक बिम्बमे छायाका भ्रम कर रहा है ।
पुन उसीने इन कल्पनाओंका खण्डन भी कर दिया कि प्रथमपक्ष
नहीं हो सकता । क्योंकि यह अन्धकार होता तो सूपोंका फड़फड़ाना
नही हो सकता । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि यह मेघ होता
तो इसके चार खम्भे नहीं होते । तीसरा पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि
यह बान्धव होता तो डण्डा नहीं घुमाता । चतुर्थ पक्ष भी नहीं हो सकता
है, क्योंकि वह भूमिस्थ वस्तुकी छाया होती तो उसमेंसे मनुष्योंके बहुत
से शिर नहीं निकलते । इसलिये यह कुछ भी नहीं है । (यहाँ कानोंमे
सूपका, चारों पैरोंमें स्तम्भका, पूँछमें डण्डेका तथा पुरीषपिण्डोंमे शिरका
भ्रम कर रहा है ) यहाँ पूर्व और उत्तर दोनों ही कथन भ्रम हैं ।
तो क्या इस भौतविचारसे हाथीकी सत्ता समाप्त हो जाती है ?
इससे वह दूसरा भौत ( भूतग्रस्त ) ही अच्छा है, जो “योऽय सोऽम्’
कहता हुआ अनिर्वचनीय बताता है ।
यदि तर्कसहित पञ्चावयववाक्योपपन्न प्रमाणरूप विचारको विचारसह
( विचारसिद्ध ) मानो तो यहीं पर तुम्हारा अलाकवाद बिना उत्तरकी
प्रतीक्षा किये अपने आप विलीन हो गया । अर्थात् तक प्रमाण और
पञ्चावयव वाक्य यदि पारमार्थिक हैं तो इनका विषय वक्ता और
१ प्रस्फोटनाभावात् इति ३ पु० पा० ।