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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 530 में से

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पृष्ठ 282

बाह्यार्थभङ्गवादः २३३
सर्व एव कालात्ययापदिष्टा इति ।
एतेन दृष्टान्ता अपि विसर्जनीयाः । ते हि रज्जुसर्पवन्
तज्ज्ञानवत् शशविषाणवत् दर्पणमुखवत् स्वप्नप्रत्ययवत् छेद्यानु-
पपत्तौ छिदावत् मिथः शोषकनिर्वापकानलसलिलवदित्यादयः ।
येन च तत्र पपस्यासत्त्वं, तज्ज्ञानस्य मिथ्यात्वं, शशविषाणस्या-
कारकत्वं, दर्पणमुखस्य विचारासहत्वं, स्वप्नज्ञानस्य निराल-
म्बनत्वं, छेद्यानुपपत्तौ छिदानुपपत्तिश्चावधारितानि; तेनैव तत्र
रज्जोः सत्त्वम्, असर्पज्ञानस्य सत्यत्वं, शशस्यान्यत्र गवादेर्वि-
षाण एव कारकत्वं, दर्पणस्य विचारसहत्वम् , अस्वप्नज्ञानस्य
सालम्बनत्वं, छेद्यनिष्ठा छिदा, सिद्धौ ज्ञानं कर्म चोपरादि-
एवं, उक्त सभी हेतु बाधित भी हैं। क्योंकि प्रमाणद्वारा सर्वासत्त्व-
सर्वोसत्यत्व आदि तुम्हारे साध्योंका अभाव सर्वसत्त्व और सर्वसत्यत्व
ही आदि सिद्ध हैं।
पूर्वोक्त दोषोंसे तुम्हें अपने अनुमानमें दिये दृष्टान्तोंका भी परित्याग
कर देना पड़ेगा। क्योंकि वे दृष्टान्त क्रमशः रज्जुसर्प, उसका ज्ञान,
शशविषाण, दर्पणमुख, स्वप्नज्ञान, छेद्यवस्तुके अभावमें छेदनक्रिया,
तथा परस्परका शोषक और निर्वापक (बुझा देनेवाला) अग्नि एवं जल
आदि हैं। अर्थात् इन्हीं दृष्टान्तोंसे तुम क्रमशः सबको असत्, सभी
ज्ञानको मिथ्या, सबमें अकारकत्व, सबको विचारायोग्य, सबको अना-
लम्बन (निर्विषयक), सबको अदर्शनरूप तथा सबकी असिद्धान्तरूपता
आदि साध्य सिद्ध करते हो। किन्तु उक्त सभी दृष्टान्त दृष्टान्ताभास
होनेसे प्रकृत अनुमानमें उपयोगी नहीं हो सकते हैं।
कारण, जिस प्रमाणसे रज्जुसर्पको असत्, उसके ज्ञानको मिथ्या,
शशविषाणको अकारक, दर्पणमुखको विचारासह, स्वप्नज्ञानको निरा-
लम्बन, छेद्यवस्तुकी अनुपपत्तिमे छेदनक्रियाकी अनुपपत्ति आदिका
निश्चय करते हो, उसी प्रमाणद्वारा रज्जुमें सत्त्व, असर्पज्ञानमें सत्यता,
शशके लोम आदिमे तथा गौकी तो सींगमें ही कारकत्व, दर्पणमें विचार-
सहत्व, स्वप्नभिन्न ज्ञानमे सालम्बनत्व (सविषयकत्व), छेद्य वस्तुमें