आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवादः २३७
शिथिलमूलाश्चैते, प्रतिबन्धस्यासिद्धेः। सिद्धौ वा व्याप्य-
व्यापकतदधिकरणानां सिद्धौ विवादनिवृत्तेः। इष्टापादनं च
प्रथमे, अनुभूतावसिते स्थूले विरुद्धधर्मासंसर्गस्येष्टत्वात्। तथा
च वक्ष्यामः।
अनुकूलश्च द्वितीयः, अस्थूलताप्रतिषेधस्य स्थूलतोपलम्भा-
नुग्राहकत्वात् तद्रूपताव्यवहारस्य तथाप्रतिभासव्याप्तत्वाच्च।
एवं तृतीयोऽपि, अनपेक्षत्वप्रतिषेधस्य सापेक्षत्वोपलम्भानुग्राह-
कत्वात् अनपेक्षत्वविधेः सदातनत्वव्याप्तत्वाच्च।
एवं, यहाँके सभी हेतु शिथिलमूल हैं, क्योंकि अनुमानका मूलभूत
साध्यसाधनकी व्याप्ति ही असिद्ध है। कारण, यदि व्याप्ति सिद्ध हो तो
व्याप्तिके प्रयोजक व्याप्य, व्यापक और उनके अधिकरणकी भी सिद्धि
अनायास हो जानेसे सर्वशून्यत्ववाद स्वतः खण्डित हो जाता है। इस
प्रकार हमलोगोंका विवाद ही समाप्त हो जाता है।
एवं, प्रथम "नेदं स्थूलम्" इस अनुमानमें तो मुझे इष्टापत्ति ही है;
क्योंकि निर्विकल्पात्मक अनुभव और सविकल्पात्मक अनुव्यवसायके
द्वारा प्रत्यक्षसिद्ध स्थूलमें विरुद्ध धर्मोंका असंसर्ग तो इष्ट ही है। इस
बातको आगे कहेंगे।
"न अस्थूलम्" यह द्वितीय अनुमान तो मेरे अभीष्टकी सिद्धिके ही
अनुकूल है। क्योंकि अस्थूलताका खण्डन स्थूलतासिद्धिका ही पोषक
है। तथा अस्थूलताका व्यवहार अस्थूलताप्रतीतिसे व्याप्त ही है।
अर्थात् जहाँ वस्तुत अस्थूलता है, वहाँ अस्थूलताकी प्रतीति होती है,
इसमें आपत्ति क्या है?
ऐसा ही "न परानपेक्षम्" यह तृतीय अनुमान भी अनुकूल ही
है। क्योंकि अनपेक्षत्वका खण्डन सापेक्षत्वसिद्धिका ही पोषक है।
तथा अनपेक्षत्वका विधान सदातनत्वसे व्याप्त ही है। अर्थात् जो
वस्तुतः हेत्वनपेक्ष है, वह सदातन भी होता ही है, इसमें भी कोई
आपत्ति नहीं है।