आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्वतो विरोधादनुत्तरः। द्वितीयः सुषुप्त्यवस्थानुरोधादुपे-
क्षणीयः। तृतीयोऽपि विरोधादेव। चतुर्थस्तु भेदोल्ले-
खादेव त्याज्यः।
पञ्चमस्तु चिन्त्यते—किमेतेष्वन्यतमात्मा तस्य विषयः ?
तदन्यो वा ? तत्र यद्यन्य एव, किमेताभिर्व्यधिकरणानुपपत्ति-
भिस्तस्य बाध्यते । एवं हि चोरापराधेन व्यक्तमयं माण्डव्य-
निग्रहः स्यात् ।
अथान्यतमात्मा¹, तत्रापि यदि धर्मान्तरमेवेति तत्त्वम्,
प्रतियोगीरूपमें भेदज्ञानकी सत्ता मानी जाय । साथ ही "भेदज्ञान
नहीं है" इस कथनमें स्ववचनविरोध भी है। एव भेदज्ञानके
बिना वादिप्रतिवादियोंकी कथा भी नहीं चल सकती है। अतः प्रथम
पक्ष असङ्गत है।
सुषुप्तिके अनुरोधसे द्वितीयपक्ष उपेक्षणीय है। अर्थात् यदि भेद-
ज्ञान नित्य होता तो सुषुप्ति अवस्था होती ही नहीं। तीसरा पक्ष भी
विरोधके कारण त्याज्य है। अर्थात् जो अनित्य होगा, वह अहेतुक
हो नहीं सकता। चौथा पक्ष भी त्याज्य है, क्योंकि भेदज्ञानमे भेदरूप
विषयका उल्लेख ही है। अतः वह निर्विषयक कहाँ हुआ ? पञ्चम पक्ष
तो विचारणीय है कि भेदज्ञानका विषय पूर्वोक्त स्वरूप, इतरेतराभाव
तथा धर्मान्तर इन तीनोंमे कोई एक है जिसे बाध्यमान बताते हो ? अथवा
इन तीनोंसे अन्य है ? यदि अन्य हो तो अन्यगत पूर्वोक्त सहप्रयोगा-
नुपपत्ति, आत्माश्रय तथा अनवस्थारूप दोषोंसे इन तीनोंका बाध कैसे
हो सकेगा ? क्योंकि सहप्रयोगानुपपत्ति आदि दोष अन्यमे हों और
ये तीनों बाधित किये जायें तो स्पष्ट ही चोरके अपराधसे निरपराध
माण्डव्यको दण्ड देनेके समान यह हो जायगा ।
यदि मानो कि—भेदज्ञानका विषय भेदके पूर्वोक्त तीनों स्वरूपोंमे
ही कोई एक है और वही बाध्यमान है। एव उनमें भी धर्मान्तर
१. अथान्यतमोऽस्य विषय इति २ पु० पा०