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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 273, कुल 530 में से

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पृष्ठ 273

७२४ आत्मतत्त्वविवेके

अहं मूक इति, इमं न जानामीति, मम कर्णे प्रविश्य गजो
गर्जति भेषजमुच्यतामिति ।
तदर्थश्च साधनं दूषणं च । तत्र साधनं व्याप्तिपक्षधर्म-
तौपयिकरूपपञ्चकोपेतं लिङ्गम्, यथा विशिष्टधूमवत्त्वादिति ।
लिङ्गाभासमितरत्, यथा जलाशयत्वादिति ।
तत्परिकरश्च तर्कः । सोऽपि व्याप्तिबलमालम्ब्यानिष्टप्रसङ्ग-
रूपः । अनिष्टं च द्विविधं प्रामाणिकपरित्यागोऽप्रामाणिकपरि¹-
प्रमाणसे बाधित होनेके कारण "शशो विषाणी" यह वाक्य, स्ववचन-
व्याघातदोषसे "माता वन्ध्या" यह वाक्य, उच्चारणरूप क्रियासे व्या-
घात होनेके कारण "अहं मूकः" यह वाक्य, स्वज्ञानव्याघात होनेसे
"इमं न जानामि" यह वाक्य (क्योंकि ज्ञात विषयको ही "इमम्" शब्द
से व्यवहृत किया जा सकता है, अतः "इमं न जानामि" कहना स्वज्ञान-
व्याहत है), तथा स्वार्थप्रतिषेधक युक्तिका उपस्थापक होनेके कारण
"मम कर्णे प्रविश्य गजो गर्जति, भेषजमुच्यताम्" इत्यादि वाक्य अर्थके
बोधक नहीं होते हैं। यहाँ अन्तिम वाक्यमें कानमें प्रविष्ट हाथीकी
गर्जनाके निवारणार्थ औषधकी जिज्ञासा की गयी है। किन्तु कर्णमें
गजगर्जनरूप निवारणीय वस्तु ही अत्यन्त असत् है। अतः उसके
लिए औषधाभिधान सर्वथा अयोग्य है। अतः यह वाक्य अर्थबोधक
नहीं हो सकता है।
एवं उक्त पञ्चावयव वाक्यका अर्थ (प्रयोजन) है 'स्वपक्षका साधन
तथा परपक्षका दूषण'। इनमें व्याप्ति पक्षधर्मताके सम्पादक पक्षसत्त्व,
सपक्षसत्त्व, विपक्षव्यावृत्तत्व, असत्प्रतिपक्षितत्व और अबाधितत्व नामक
पञ्चरूपोंसे युक्त हेतु ही साधन है, जैसे वह्निको सिद्ध करनेमें अविच्छि-
न्नमूळवाला धूम हेतु। किन्तु उक्त पञ्चरूपोंसे जो रहित होगा, वह
हेतु न होकर हेत्वाभास होगा जैसे वह्नि सिद्ध करनेमें जलाशयत्व
हेत्वाभास होगा न कि हेतु। तथा उसका सहकारी कारण तर्क होता
है। वह तर्क भी व्याप्तिबलके आधारपर अनिष्टापादनस्वरूप है।
१ नाभ्युपगमश्च इति ३ पु० पा० ।