आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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तदनुपपन्नत्वे च कथं पुनः प्रतिज्ञार्थ उपपद्येत ? तदिदमा-
यातम्, स्वविषमूर्च्छिता भुजङ्गी आत्मानमेव१ दशतीति ।
तत्त्वत इति विशेषणादयमदोष इति चेत्, तद्विचारो वा
स्यात् लोकमर्यादातिक्रमो वा । प्रथमः पूर्वमेव निरस्तः;
तस्य प्रतिज्ञारूपतया कुलीरस्येव स्वप्रसूतयुक्त्यपत्येनैव प्रतिहत-
त्वात् । द्वितीये तु स्वच्छायातिक्रमवत् स एव व्याघातः । यदि
हि लोकमर्यादातिक्रमः, न विचारस्वरूपस्थितिः । तत्स्वरूप-
स्थितिश्चेत्, न तदतिक्रम२ इत्यर्थः ।
तो स्वयं इनका ही अस्तित्व सिद्ध हो गया, फिर सबका असत्त्व कहाँ
सिद्ध हुआ ? यदि तो सबके साथ इन प्रतिज्ञाओंका भी अस्तित्व न हो
तो इनके द्वारा बताये जानेवाले सर्वासत्त्व आदि आपका अभीष्ट
प्रतिज्ञार्थ भी कैसे सिद्ध हो सकेगा ? अर्थात् आपकी प्रतिज्ञायें अपने ही
स्वार्थकी घातिका बन जाती हैं । इससे यही आया कि अपने ही विषसे
मूर्च्छित हुई प्रतिज्ञासर्पिणी अपने आपको डँस रही है ।
यदि कहो कि—उक्त प्रतिज्ञावाक्योंमें "तत्त्वत" ऐसा विशेषण
देनेसे यह दोष नहीं आ सकता । अर्थात् तत्त्वरूपसे कुछ नहीं है,
यही उन प्रतिज्ञाओंका अर्थ है । इसलिए वस्तुओंकी और इन
प्रतिज्ञावाक्योंकी भी व्यावहारिक सत्ता मानते हैं—तो बताओ, तत्त्वका
अर्थ विचार है या अतात्त्विक लोकमर्यादाका अतिक्रमण ही तत्त्व
है ? प्रथम पक्ष तो पहले ही खण्डित हो चुका है । क्योंकि विचार
तो पूर्वोक्त प्रतिज्ञारूप ही है, जो केंकड़ेके समान स्वयं पैदा की गयी
युक्तिरूपी सन्ततिक ही द्वारा विनष्ट हो चुका है । दूसरे पक्षमें तो
अपनी छायाको लाँघनेके समान फिर वही व्याघात दोष आ जाता है ।
क्योंकि यदि लोकमर्यादाका अतिक्रमण होगा तो विचारका स्वरूप
ही नष्ट हो जायगा और वह दुर्विचार हो जायगा । यदि विचार
स्वरूपको कायम मानो तो लोकमर्यादाका अतिक्रमण नहीं हुआ ।
१ स्वा मानमपि इति २ पु० पा०
२ इति प्रतिषेध्यसिद्ध्यासिद्धिभ्यां व्याघातात् इति १ पु० पा०