आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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चतुर्थस्त्वप्रसिद्धव्यापकः, सदसत्त्वस्य विरोधेनैकत्र विधि-
वन्निषेधस्याप्यनुपपत्तेः । पञ्चमस्त्वनुकूल एव, अनेकत्वाभिमते
वस्तुन्येकताप्रतिक्षेपस्यानेकतोपलम्भोपष्टम्भकत्वात् ताद्रूप्य-
व्यवहारस्य तथाप्रतिभासव्याप्तत्वाच्चेति । षष्ठस्त्विष्ट
एवास्माकम् ।
ननु भेदः स्वरूपं वा स्यात्, इतरेतराभावो वा, धर्मान्तरं
वा । न पूर्वः, घटो भिन्न इति सहप्रयोगानुपपत्तेः । नापरः,
"न परापेक्षम्" इस चतुर्थ अनुमानमे आपाद्यभूत व्यापक ही
अप्रसिद्ध है। क्योंकि परापेक्ष माननेमें सदसद्व्यतिरेक (निषेध)
का आपादन किया गया है, जो अनुपपन्न है। कारण, सत्त्व-असत्त्वका
परस्परमें विरोध होनेसे, जैसे एक जगह उनका विधान नहीं हो सकता,
वैसे ही उन दोनोंका एक जगह निषेध भी नहीं रह सकता है।
"न एकम्" यह पञ्चम अनुमान भी अनुकूल ही है। क्योंकि जो
वस्तु अनेकरूपमे अभिमत है, उसमें एकताका खण्डन उसकी अनेकता
सिद्धिका ही पोषक है, तथा एकताका व्यवहार एकताप्रतीतिसे व्याप्त भी
है। अर्थात् जहाँ वस्तुत एकता है, वहाँ एकताकी प्रतीति होनेमे
आपत्ति भी नहीं है।
"नानेक भेदव्यवस्थितिप्रसङ्गात्" यह षष्ठ अनुमान भी तो हमें
इष्ट ही है। क्योकि जो वस्तु अनेक मानी गया है, उसमें भेद भी
व्यवस्थित ही है।
यदि कहो कि—भेद ही नहीं है तो उसकी व्यवस्था कैसे हो सकेगी ?
क्योंकि भेद प्रतियोगिस्वरूप होगा या इतरेतराभावरूप होगा ? अथवा
कोई धर्मान्तर होगा ? इनमें पूर्वपक्ष ठीक नहीं है। क्योकि भेद यदि
घटादिप्रतियोगीस्वरूप हो तो पुनरुक्तिदोषके कारण 'घटो भिन्न" ऐसा
घट और भेदका सहप्रयोग नहीं हो सकता। साथ ही इसमें भेद घटका
विशेषण भी नहीं हो सकता, क्योंकि स्वयं ही कोई अपना विशेषण
नहीं होता है।