सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 280, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 280

[Header] बाह्यार्थभङ्गवाद २३१

क्रमः, परानिच्छ्या त्वदनिच्छाबाधप्रसङ्गश्चेति ।
एतेन हेतवो निरस्ताः । ते हि ज्ञेयत्वात् ज्ञानत्वात् अस-
च्त्वात् विकल्पानुपपत्तेः प्रत्ययत्वात् कर्मानुपपत्तेः मिथोव्याघा-
तादित्यादयः । एते हि सर्व एव स्वार्थक्रियाप्रतिक्षेपिकां
युक्तिमाक्षिपन्ति निषेध्यसिद्धिश्चापेक्षन्ते । अनैकान्तिकौ च
प्रथमद्वितीयौ, स्वफल एव व्यभिचारात् । असिद्धौ तृतीय-

क्रमण हो जाता है । अर्थात् अनिच्छामात्रसे किसी वस्तुका बाध नहीं
होता, यह लोकसिद्ध नियम है । साथ ही यदि अनिच्छामात्रसे
किसीका बाध हो तो दूसरेको अनिच्छामात्रसे तुम्हारी इस अनिच्छाका
भी बाध हो जायगा ।
इससे अपना ही व्याघातक युक्तियोंके उपस्थापक होनेके कारण
आपके हेतु भी खण्डित हो जाते हैं । क्योंकि ज्ञेयत्व, ज्ञानत्व, असत्त्व,
विकल्पानुपपत्ति, प्रत्ययत्व, कर्मानुपपत्ति और मिथोव्याघात आदि ही
वे हेतु हैं, जिन्हें आपने अपने अभीष्ट साध्योंकी सिद्धिके लिये प्रयुक्त
किया है । ये सभी हेतु अपनी अर्थसिद्धिकी व्याघातिका युक्ति
उपस्थित कर देते हैं और निषेध्यवस्तुकी सिद्धि भी करा देते हैं ।
अर्थात् सबको असत् सिद्ध करनेवाला आपका ज्ञेयत्व हेतु स्वयं ज्ञेय
है या नहीं ? यदि ज्ञेय है, तब तो स्वयं वह हेतु भी असत् हो जायगा,
फिर दूसरेको कैसे असत् सिद्ध कर सकेगा ? यदि वह हेतु अज्ञेय हो
तो वह हेतु ही नहीं हो सकता । क्योंकि अज्ञात होकर कोई हेतु नहीं
होता है । इस प्रकार सभी हेतु अपना ही व्याघातक हो जाते हैं ।
तथा आपकी प्रतिज्ञाओंमें निषेधनीय जो सत्त्व, सत्यत्व, सालम्बनत्व,
कारकत्व, दर्शनत्व और सिद्धान्तत्व आदि हैं, वे यदि कहीं भी सिद्ध
नहीं हैं, तो उनका अभाव भी सिद्ध नहीं हो सकता है । क्योकि अभाव
बुद्धिके प्रति प्रतियोगिबुद्धि कारण होती है । यदि वे कहीं सिद्ध हैं, तो
वे ही सत्, सत्य, सालम्बन आदि सिद्ध हो गये । फिर 'कुछ भी सत्
नहीं है" इत्यादि आपकी प्रतिज्ञायें ही भग्न हो जाती हैं ।
एव, उक्त हेतुओंमें प्रथम ज्ञेयत्वहेतु और द्वितीय ज्ञानत्वहेतु
अनैकान्तिक हो जाते हैं । कारण, अनुमितिरूप अपने फलमे ही उनका