आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवादः २२१
तद्बाधने बलिनि वेदनये जयश्रीः ।
नो चेदनिन्द्यमिदमीदृशमेव विश्वं
तथ्यं तथागतमतस्य तु कोऽवकाशः ? ॥ १ ॥
तच्चालीकं विचारासहमनिर्वचनीयं वा यमाश्रित्य जग-
दुद्गीयते, स एव विचारश्चिन्त्यतां कोऽसौ कीदृशश्चेति ।
सतर्कं प्रमाणमेव वाक्यारूढमिति चेत्, तच्चेद् विचारासहम्,
किं तेन भौतविचारकल्पेन ।
तथाहि, केनचिद्भौतेन राजद्वारे द्विरदमवलोक्य विक-
ल्पितम्-किमयमन्धकारो मूलकमत्ति ? आहोस्वित् जलवाहो
वलाकान् वर्षति गर्जति च ? यद्वा बान्धवोऽयम् “राजद्वारे
श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः” इति परमाचार्यवचनात् ,
बाह्यार्थबाधे विजयछवि वेदान्तकी ही सिद्ध है ।
यदि यों नहीं, तो विश्व ऐसा ही यथार्थप्रकाश है,
फिर क्या सुगतमतका यहाँ कुछ भी बचा अवकाश है ?
एवं जिसके द्वारा जगत्को विचारासहके रूपमें अथवा अनिर्वचनीय
के रूपमें अलीक कहते हो, उस विचारका ही चिन्तन करो कि वह क्या
है और कैसा है ? यदि—प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन-
रूप पञ्चावयववाक्योपपन्न तर्कसहित प्रमाण ही वह विचार है—तो वह
प्रमाणरूप विचार भी यदि नीलादिके समान ही विचारासह है तो भूता-
विष्टोंके विचारके समान वह विचार भी निष्फल ही है । अर्थात् उसके
द्वारा सिद्ध किया हुआ जगत्का अलीकत्व भी स्वयं मिथ्या हो गया
और फलतः जगत् सत्य ही सिद्ध हो गया ।
जैसे, किसी भूताविष्टने राजाके द्वारपर हाथीको देखकर कल्पना की
कि—क्या यह अन्धकार मूली खा रहा है ? या मेघ बगुलोंकी वर्षा कर
रहा है और गरज रहा है ? या यह कोई बान्धव है ? क्योंकि श्रेष्ठ
आचार्योंका वचन है कि राजाके द्वारपर और श्मशानपर जो रहता है
वह बान्धव है । अथवा जो यह जमीनपर दिखाई देता है, उसीकी