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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 288, कुल 530 में से

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पृष्ठ 288

प्रतीतावात्माश्रयप्रसङ्गात्, भिन्नप्रतियोगिनिरूपणाद्धि तद्-
भावो निरूप्यस्तन्निरूपणमेव च भेदनिरूपणम् । नोत्तरः, अनव-
स्थाप्रसङ्गात् । तत् कथमसौ व्यवतिष्ठतामिति चेत्—
तत् किं भेदज्ञानमेव नास्ति ? सदपि वा नित्यम् ?
अनित्यमपि¹ वा निर्हेतुकम् ? सहेतुकमपि वा निर्विषयकम् ?
सविषयकमपि वा बाध्यमानविषयकमिति ? तत्र प्रथमः

दूसरा मत भी ठीक नहीं है। कारण, प्रतीतिको लेकर आत्माश्रय
दोषका प्रसङ्ग हो जाता है। क्योंकि परस्पर भिन्नरूपमे प्रतियोगियोंका
ज्ञान होनेपर ही भेदस्वरूप इतरेतराभावका ज्ञान होगा और भेदात्मक
अभावका ज्ञान होनेपर ही भिन्नरूपमे प्रतियोगियोंका ज्ञान हो सकेगा।
इसप्रकार द्वितीयमतमे अन्योन्याश्रयदोष आ जाता है।
तीसरा मत भी ठीक नहीं है। क्योंकि घटपटगत पारस्परिक
भेद यदि कोई धर्मान्तररूप हो तो उभयगत वह धर्मान्तर अभिन्न
है या भिन्न भिन्न है ? यदि अभिन्न है तो उसके योगसे उसका
आश्रयीभूत घटपट परस्पर भिन्न कैसे हो सकते हैं ? यदि वह धर्मा-
न्तर (वैधर्म्य) उभयमे भिन्न भिन्न हो तो उस धर्मान्तररूप भेदमें
एक दूसरा भेद मानना पडेगा। इस प्रकार उसमे भी तीसरा और
तीसरेमे भी चौथा आदि भेद मानना पड़ जानेसे अनवस्थादोष आ
जायगा। अत जब भेद ही असिद्ध है तो पूर्वोक्त षष्ठ अनुमानमे
भेदको व्यवस्थित कहते हुए इष्टापत्ति कैसे दी जा सकती है ?—तो मैं
पूछता हूँ कि क्या भेदज्ञान ही नहीं है ? अथवा होता हुआ भी वह
नित्य है ? या अनित्य होता हुआ भी वह अहेतुक है ? या सहेतुक
होता हुआ भी निर्विषयक है ? अथवा सविषयक होता हुआ भी वह
भेदज्ञान बाध्यमानविषयक है ?
यहाँ सर्वतः विरोध हो जानेसे प्रथमपक्ष ठीक नहीं है। अर्थात्
जो भेदज्ञान सर्वजनानुभवसिद्ध है, उसका निषेध नहीं किया जासकता
है। एव भेदज्ञानका निषेध भी तभी किया जा सकता है, जबकि


१. अनित्यमेव इति २ पु० पा०