आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवादः २२७
किञ्चिद् विचारसहम्, न किञ्चित् सालम्बनम्, न किञ्चिद्
दर्शनम्, न कश्चित् सिद्धान्त इत्यादौ स्वार्थप्रतिक्षेपस्तावद् दुरु-
द्धरः१। प्रतिज्ञाऽपि हि न स्यान्न सत्या, न कारिका, न
विचारसहा, तद्विज्ञानमपि न सालम्बनम्, तत्फलमपि न
दर्शनम्, तदर्थोऽपि न सिद्धान्त इत्यापद्येत ।
इष्यत एवेदमिति चेत्, इच्छामात्रेण व्याघातनिवृत्तेः ।
यदि हि न (ज्ञातं)२ किञ्चिदस्तीत्यादिप्रतिज्ञार्थः प्रतिज्ञां
स्पृशेत्, कथमयमर्थः प्रत्येत्तव्यः ? न चेत्, कथं सानुपपन्ना ?
कोई ज्ञान सत्य नहीं है, जैसे रज्जुसर्पज्ञान, कुछ भी अर्थक्रियाकारक
नहीं है, जैसे शशशृङ्ग; कुछ भी विचारकी कसौटीपर स्थिर रहनेवाला
नहीं है; जैसे प्रतिबिम्ब; कोई भी ज्ञान सालम्बन ( सविषयक ) नहीं है,
जैसे स्वप्नज्ञान, दृश्यरूप वस्तुके अभावमें कोई दर्शनरूप क्रिया भी नहीं
है; जल और अग्निके समान परस्पर व्याघातक होनेके कारण कोई
सिद्धान्त भी नहीं है; इत्यादि प्रकारकी प्रतिज्ञाओंमें स्वार्थप्रतिक्षेपका
वारण अशक्य है। अर्थात् इस प्रकारकी प्रतिज्ञासे उक्तप्रतिज्ञाके ही
स्वरूपपर आघात पहुँच जाता है। क्योंकि जब कुछ नहीं है, तब यह
प्रतिज्ञा भी नहीं है। यदि कोई ज्ञान सत्य नहीं है तो प्रतिज्ञार्थका ज्ञान
भी सत्य नहीं होगा एवं पूर्वोक्त प्रकारसे प्रतिज्ञा भी अर्थक्रियाकारिका
नहीं होगी, विचारसह नहीं होगी, उसका ज्ञान सविषयक नहीं होगा,
उसका फल भी कोई बोध नहीं हो सकता तथा उसका अर्थ भी कोई
सिद्धान्त नहीं हो सकता; इत्यादि आपत्तियां स्वयं प्रतिज्ञाके ऊपर आ
पड़ती हैं।
यदि कहो कि—उक्त सारी बातें इष्ट ही हैं—तो तुम्हारी इच्छामात्रसे
व्याघातकी निवृत्ति नहीं हो सकती है। क्योंकि "न किञ्चिदस्ति"
इत्यादि प्रतिज्ञाओंका अर्थ यदि स्वयं इन प्रतिज्ञाओंपर भी लागू होता हो
तो इनके द्वारा बताये जानेवाले आपके अभीष्ट अर्थकी भी प्रतीति कैसे
हो सकेगी ? यदि उक्त प्रतिज्ञाओंका अर्थ इन प्रतिज्ञाओंको न छूता हो
१. दुर्वार इति १ पु० पा० २. ज्ञातमिति १ पुस्तके नास्ति ।