आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
२१० आत्मतत्त्वविवेके
पत्तेः । न हि जात्यन्धो नीलं ज्ञातुं निर्वक्तुं वा न शक्त इत्य-
ज्ञेयानिर्वच्य एव तल्लोक इति ।
माध्यमिकपक्षखण्डनम्
अस्तु तर्हि शून्यतैव परमं निर्वाणमिति चेत्, न, सा हि
यद्यसिद्धा, कथं तद्विशेषमपि¹ विश्वमभिधीयते ? वाङ्मात्रस्य
सर्वत्र सुलभत्वात् । परतश्चेत् सिद्धा, परोऽप्यभ्युपगन्तव्यो
ग्राह्यलक्षणं चावर्जनीयमिति ।
भी हो सकता है । क्योंकि जन्मसे अन्धा व्यक्ति नीलरूपका ज्ञान
और निर्वचन करनेमें यदि अशक्त है तो संसारमे सबके लिये नीलरूप
अज्ञेय और अनिर्वचनीय ही नही है ।
शून्यवाद ( माध्यमिकमत ) निराकरण ।
यहा शून्यवादी माध्यमिक शङ्का करता है कि—शून्यतामें ही परम-
शान्ति क्यों न मानी जाय ? अर्थात् हेयोपादेयरूप बाह्य जगत् और
ज्ञानका भी अभाव होनेसे द्वेष, भय और रागादिसे छुटकारा मिल
जायगा और परम शान्तिकी प्राप्ति हो जायगी—किन्तु ऐसी शङ्का नहीं
हो सकती है । क्योंकि सर्वशून्यतापक्षमें शून्यताग्राहक प्रमाणके भी
शून्य हो जानेसे शून्यताकी सिद्धि नहीं हो सकती है । यदि प्रमाणद्वारा
शून्यताकी सिद्धि न मानो, अर्थात् प्रमाणके बिना भी वाङ्मात्रसे शून्यता
की सिद्धि मानो तो समानन्यायसे शून्यताके बदले विश्व ( पूर्णता )
का ही स्वीकार क्यों न किया जाय ? क्योंकि वाङ्मात्र तो सर्वत्र
सुलभ है ।
शून्यताको यदि परत अर्थात् प्रमाणान्तरसे सिद्ध कहो तो वह पर भी
तुम्हें स्वीकार करना पडा। ऐसी परिस्थितिमे सर्वशून्यता कहो सिद्ध
हुई ? साथ ही ग्राह्यस्वरूप भी अनिवार्यरूपसे स्वीकृत करना पड़ा ।
कारण, शून्यता और प्रमाणमे तुमने विषयविषयिभावको अङ्गीकार कर
लिया। प्रमाणभूत पर भी यदि तात्त्विक न होकर संवृति अर्थात्
१ तदवशेष इति कलिकातामुद्रितपाठ ।
बाह्यार्थभङ्गवादः २११
स च परो यदि संवृतिरेव, विश्वशून्यतयोर्न कश्चिद् विशेषः,
कथं तदप्यवशिष्येत ? असंवृतिरूपश्चेत् परः, परत एव तस्य
सिद्धावनवस्था । स्वयमसिद्धश्चेत्, कथं शून्यत्वमपि साधयेत् ?
स्वतः सिद्धश्चेत्, आयातोऽसि मार्गेण१ ।
तथाहि—स्वतः सिद्धतया तदनुभवरूपम् । शून्यत्वादेव
च न तस्य कालावच्छेद इति नित्यम् । अत एव च न
देशावच्छेद इति व्यापकम् । अत एव तन्निर्धर्मकमिति
विचारास्पृष्टम्, तस्य२ धर्मधर्मिभावमुपादाय प्रवृत्तेः । अत
कल्पनामात्र हो तो विश्व और शून्यतामें कोई विशेषता नहीं रही ।
ऐसी स्थितिमें शून्यता भी कैसे बच पायेगी ?
यदि प्रमाणभूत वह पर असंवृतिरूप अर्थात् तात्त्विक हो तो उस
प्रमाणकी सिद्धि किसी अन्य प्रमाणसे माननेपर उसकी भी किसी अन्यसे
और उसकी भी किसी अन्यसे सिद्धि होगी, इस प्रकार अनवस्थादोष
हो जायगा । यदि वह शून्यताका साधक प्रमाण स्वयं ही असिद्ध हो तो
वह शून्यताको भी कैसे सिद्ध कर सकेगा ? यदि उस प्रमाणकी
सिद्धिको अनवस्थाभयसे परतः न मानकर स्वतः मानो तो अब तुम
रास्ते पर आगये । अर्थात् इस पद्धतिसे वेदान्तका स्वयप्रकाश ब्रह्मा-
द्वैत पक्ष ही निर्दोष है ।
कारण, स्वतःसिद्ध (स्वप्रकाश) होनेसे वह (ब्रह्म) ज्ञानस्वरूप
है । सम्पूर्ण प्रपञ्चके शून्यरूप होनेके कारण काल और कालोपाधियोंके
भी असत् होनेसे वह कालविशेषसे अवच्छिन्न (सीमित) नहीं है, इसी-
लिये वह नित्य है। और प्रपञ्चशून्यताके कारण ही देशकृत परिच्छेद
भी नहीं हो सकता है, इसीलिये वह व्यापक है । शून्यताके कारण ही
वह निर्धर्मक (धर्मशून्य) होनेसे विचारका भी विषय नहीं है ।
क्योंकि जहाँ धर्मधर्मिभाव होता है, वहीं विचारकी प्रवृत्ति होती है ।
निर्धमक होनेके कारण ही वैधर्म्यरूप विशेषका अभाव होनेसे कहीं
१ वेदान्तनयेन इत्यर्थः ।
२ तस्य = विचारस्य ।
२१२ आत्मतत्त्वविवेके
एव विशेषाभाव इत्यद्वैतम्, प्रपञ्चस्यापारमार्थिकत्वाच्च ।
निष्प्रतियोगिकमिति विधिरूपम् । अविचारितप्रपञ्चापेक्षया
तु शून्यमिति व्यवहारः ।
तथापि प्रपञ्चशून्यस्यानुभवमात्रस्य प्रपञ्चेन सह कः
सम्बन्धः ? न च नायं प्रकाशत इति चेत्, वस्तुगत्या न
कश्चित् । संवृत्या तु गगनगन्धर्वनगरयोराधाराधेयभाव इव
विषयविषयिभावः । स च यथा नैयायिकैः समर्थयिष्यते तथैव ।
वेद्यनिष्ठस्त्वसावस्मिन् दर्शन इति विशेषः । अविद्यैव हि
उसका अन्योन्याभाव नहीं है तथा वह अद्वैत ब्रह्मरूप है । जगत्प्रपञ्च
के अवास्तविक होनेके कारण ही उसका कोई प्रतियोगी नहीं है । इसी
लिये उसमे किसीका भेदरूप निषेध नहीं प्राप्त होनेसे वह अद्वैततत्त्व
निषेधात्मक न होकर विधिरूप है । "शून्यम्" यह व्यवहार तो सत्
या असतरूपसे अनिर्वचनीय घटपटादि प्रपञ्चकी दृष्टिसे है न कि
अद्वैतब्रह्मकी दृष्टिसे । अर्थात् अनुभवात्मक अद्वैततत्त्वके अतिरिक्त
कुछ नहीं है, यही शून्यताका अर्थ है ।
( प्रश्न ) फिर भी जब प्रपञ्च कोई वस्तु ही नहीं है, तो प्रपञ्चसे
शून्य केवल अनुभवमात्रका प्रपञ्चसे क्या सम्बन्ध है ? यह बताना
होगा । क्योंकि यह प्रपञ्च नहीं भासित होता है, ऐसी बात नहीं है ।
( समाधान ) ऐसे प्रश्नका यही उत्तर होगा कि प्रपञ्चके मिथ्यारूप
होनेके कारण उसके साथ अनुभवका वस्तुत कोई सम्बन्ध नहीं है ।
काल्पनिक दृष्टिसे तो जैसे गगन और गन्धर्वनगरका परस्पर आधाराधेय-
भाव सम्बन्ध होता है, वैसे ही प्रपञ्च और अनुभवका विषयिविषयभाव
सम्बन्ध है । विषयविषयिभाव क्या है ? यह तो जैसा नैयायिकोंने
माना है, वैसाही है । किन्तु वह सम्बन्ध न्यायमतमे विषय और ज्ञान
उभयनिष्ठ होता है, किन्तु इस ( वेदान्त ) दर्शनमें तो वह सम्बन्ध केवल
वेद्य ( विषय ) निष्ठा है और वेद्य प्रपञ्चके साथ ही निवृत्त हो जाता
है । यही विशेषता है । अविद्या ही जैसे जैसे परिणत होती रहती
है, जैसे जैसे घटपटादि विषयोंका अनुभाव्यरूपमें व्यवहार होता रहता
बाह्यार्थभङ्गवादः २१३
तथा तथा विवर्तते यथा यथाऽनुभाव्यतया¹ व्यवह्रियते ।
तत्तन्मायोपनीतोपाधिभेदाच्चानुभूतिरपि भिन्नेव व्यवहारपथ-
वतरति गगनमिव स्वप्नदृष्टघटकटाहकोटरकुटीकोटिभिः ।
तदास्तां तावत्, किमार्द्रकवणिजो वहित्रचिन्तया ?
है । अर्थात् अनादि अविद्यावश घटपटादिकोंमें तथा घटज्ञान पटज्ञान
आदिमें भेदकी प्रतीति होती है । एवं मायाद्वारा उपस्थापित उस उस
उपाधिके भेदसे ही एक भी अनुभव भिन्न-भिन्नरूपमें व्यवहृत होता है ।
जैसे एक ही आकाश स्वप्नमें देखे गये घट कटाह कोटर कुटी आदि
अनेक रूपोंमें भासित होता है ।
अब वेदान्तकी चर्चा स्थगित रहे । क्योंकि आदीके बनियाको
जहाजकी चिन्तासे क्या लाभ ? अर्थात् शून्यवादके खण्डनके लिये
न्यायदर्शन ही पर्याप्त होगा । अतः यहाँ वेदान्तके उपयोगकी आवश्यकता
नहीं है ।²
१ अनुभवनीयतया इति ३ पु० पा० ।
२ जिन युक्तियोंसे वेदान्त शून्यवादका खण्डन करेगा, उन्हीं युक्तियोंसे न्याय
भी खण्डन कर सकता है । क्योंकि सर्वथा असिद्ध भी शून्यता यदि
मान्य हो तो व्यवहारद्वारा सिद्ध पूर्णताने क्या अपराध किया है कि
वह न मानी जाय । यदि शून्यताको अनुभवबलसे मानो तो अनुभव
उसके विपरीत ही बताता है । क्योंकि स्वप्नमे भी शून्यताका अनुभव
किसीको नहीं होता है । एवं शून्यता क्या वस्तु है ? यह बताओ । यदि
कहो कि अभाव ही शून्यता है, तो सामान्यतः भावके साथ उसका कोई
विरोध नहीं है ।
यदि सार्वकालिक अभावको शून्यता कहो तो भी विरोध नहीं है ।
क्योंकि हमेशा किसी न किसीका कहीं न कहीं अभाव न्याय भी मानता
है । यदि कहो कि सर्वत्र अभाव शून्यता है, तो भी कोई विरोध
नहीं है, क्योंकि एक सम्बन्धसे सत्ता होनेपर भी अन्य सम्बन्धसे उसकी
असत्ता मानी ही जाती है । यदि कहो कि सभी सम्बन्धोंसे सर्वदा
सर्वत्र अभाव शून्यता है, तो किसका अभाव है, यह बताओ । यदि
सबका सर्वदा सर्वत्र अभाव शून्यता मानो तो सब काल, देश, सम्बन्ध
२१४ आत्मतत्त्वविवेके
तस्मादनुभवव्यवस्थितौ अनात्माऽपि स्फुरतीत्यवर्जनीय-
मेतत् । तत्सिद्धौ तल्लक्षणमपि किञ्चिदस्त्येव । तच्च बाह्या-
विरोधे ज्ञानानित्यतायां तन्निष्ठमुभयनिष्ठं वा, बाह्यविरोधे ज्ञान-
निष्ठमेव । तन्नित्यतायां तु ग्राह्यनिष्ठमेवेति ।
तथाहि, लक्ष्यस्तावदत्र विषयविषयिभावः । स च प्रका-
इसलिये अनुभवबलसे यह अनिवार्य है कि ज्ञानभिन्न भी भासित
होता है । अर्थात् कोई अनुभव "इदं नीलम्" ऐसा होता है और कोई
अनुभव तो "इमे नीलपीते परस्परं भिन्ने" ऐसा होता है । इस प्रकारकी
विभिन्न अनुभवकी व्यवस्था केवल विज्ञानवादसे नहीं हो सकती है ।
अतः ज्ञानसे भिन्न विषयका भी भान मानना आवश्यक है ।
एव बाह्यार्थकी ग्राह्यता सिद्ध होनेपर उसका नियामक भी कुछ
(विषयविषयिभाव सम्बन्ध ) होगा ही । और वह नियामक बाह्यवस्तु
की पारमार्थिकताकी दशामे तथा ज्ञानकी अनित्यतापक्षमे ज्ञाननिष्ठ
अथवा ज्ञान-अर्थ उभयनिष्ठ होगा । बाह्यार्थके निषेधकी दशामे योगा-
चारमतानुसार ज्ञाननिष्ठ ही होगा तथा वेदान्तमतानुसार ज्ञाननित्यत्व-
पक्षमे तो बाह्यवस्तुनिष्ठ ही होगा । क्योंकि उस नियामकके आविद्यक
होनेसे वह परमार्थभूत ज्ञानात्मक ब्रह्ममें स्थित नहीं हो सकता । साथ
ही ज्ञानके नित्य होनेके कारण सदैव “अहं घटं जानामि” ऐसा
अनुव्यवसाय होने लगेगा ।
इस न्यायमे विषयविषयिभाव ही वह नियामक है । और वह एक
प्रकारका स्वभावविशेष है, जो सद्भूत प्रकाश (ज्ञान) में विषय-
सम्बन्धित्वमात्ररूप है । अभिप्राय यह हुआ कि ज्ञानके निराकार
होनेसे विषयके द्वारा ही ज्ञानका निरूपण सम्भव है । अतः विषयनिरूप-
णीयता ही ज्ञानगत तदीयता अर्थात् विषयसम्बन्धिता है, और वही
न्यायानुसार विषयविषयिभाव है, जो ज्ञाननिष्ठ माना गया है ।
तथा प्रतियोगियोंको मानते हुए भी शून्यता बताना यह बहुत बडा
आश्चर्य है । ज्ञानगत विषयसम्बन्धित्ताके स्वाभाविक होनेके कारण ही
उसके लिये भी स्वभाव ही नियामक है, किसी अन्यकारणकी अपेक्षा
नहीं है ।
शस्य सतस्तदीयतामात्ररूपः स्वभावविशेषः । स्वभावत्वादेव
च नोपकारान्तरमपेक्षते, तन्मात्रीयत्वादेव च नान्यदीयः ।
किमस्य फलमिति प्रश्नप्रसङ्गेऽपि बहिस्तद्गोचरव्यवहार-
प्रवृत्तिरान्तरमपि तेन ज्ञाननिरूपणम् । कुतोऽयमीदृगित्त्यनु-
योगेऽपि सामग्रीशक्तिरेवोत्तरं कार्यकारणवत् । अन्यथा
तत्राप्युपकारान्तरापेक्षायामनवस्था, तदनपेक्षायां (वा) साधा-
एवं तज्ज्ञानमे तन्मात्रका सम्बन्ध होनेसे ही उस ज्ञानमे विषया-
न्तरके सम्बन्धका आपादन भी नहीं किया जा सकता है । अर्थात्
“प्रकाशस्य सत तदीयतामात्ररूप स्वभावविशेषो विषयविषयिभाव”
इस निर्वचनमे प्रकाश ( ज्ञान ) को सत् कहनेसे उसकी शून्यताका
निराकरण होकर भावरूपता सिद्ध होती है । तदीयतापदसे छप्रत्यय-
द्वारा घटज्ञान पटज्ञान यहाँपर ज्ञानमे घटपटादिका विषयितारूप सम्बन्ध
सूचित होता है । तदीयतामात्र यहाँ मात्रपदसे घटज्ञानमे पटविषयिता
तथा पटज्ञानमें घटविषयिताके प्रसङ्गका निवारण होता है । एवं “स्वभा-
वविशेषः” यहाँ स्वभावपदसे सूचित होता है कि ज्ञानगत विषयकी
विषयिता किसी कारणके अधीन नहीं है किन्तु स्वाभाविक है । इसी
प्रकार विशेषपदसे “ज्ञानाभाव तथा ज्ञानसमवाय” यहाँ पर अभावके
साथ तथा समवायके साथ ज्ञानका स्वरूपसम्बन्ध होनेपर भी विषय-
विषयिभावका वारण किया जाता है ।
इस विषयविषयिभाव सम्बन्धका फल क्या है ? ऐसे प्रश्नके प्रसङ्गमें
भी यही उत्तर होगा कि बाहरमें उस विषयसे सम्बद्ध ग्रहण-परित्यागादि
व्यवहारोंमे प्रवृत्त कराना और देहके अन्दर उसके द्वारा ज्ञानका निरूपण
कराना । अर्थात् ज्ञानके निराकार होनेके कारण विषयके सम्बन्धसे ही
उसके स्वरूपका निरूपण संभव है ।
ज्ञानका नियतविषयसम्बन्धितारूप यह स्वभाव भी कैसे होता
है ? ऐसा प्रश्न होनेपर भी सामग्रीकी स्वाभाविक शक्ति ही उत्तर होगा ।
जैसे कि कार्यकारणभावस्थलमें होता है । अन्यथा नियत कार्य पैदा
करनेमें कारणगत स्वाभाविक शक्ति न मानकर किसी अन्य नियामककी
अपेक्षा करनेपर उसका भी कोई अन्य नियामक तथा उसका भी कोई
२१६ आत्मतत्त्वविवेके
रण्यं केन वार्यम् १ । तेन तदेव क्रियते, अनेनाप्येतदेव विषयी-
क्रियत इति विवेचनीयम् ।
विषयीक्रियत इति कोऽर्थः ? क्रियत इत्यपि कोऽर्थः ?
इति विचारणीयम् । कार्योत्पादनमेव करणम्, तदीयतोत्प-
त्तिरेव विषयीकरणमिति विवेचनीयम् । उपकारस्तु यथाऽत्र
विज्ञानस्वरूपातिरिक्तो नास्ति, तथाऽत्रापि कार्यस्वरूपाति-
रिक्तो नास्तीति प्रतिसन्धेयमिति ।
अतएव कार्यकारणभावोऽप्युपेक्षितव्य इति तु महत् साह-
अन्य नियामक मानना पड़ेगा । इस प्रकारकी परम्परामे अनवस्थादोष
आ जायगा । एवं यदि स्वभाविक शक्ति भी न मानो तो और कोई
नियामक भी न मानो तो अन्य कारणोंसे अन्यकार्योंकी उत्पत्ति कैसे
रोकी जा सकती है ?
यदि कहो कि—उस कारणद्वारा वही कार्य किया जाता है, अत
साधारण्यदोष नहीं आ सकता—तो इस ज्ञानद्वारा भी यही अपना विषय
बनाया जाता है, यह भी समझना चाहिये । अर्थात् ज्ञानविशेषके द्वारा
विषयविशेषका ही विषयीकरण होता है, अत एकविषयके ज्ञानमें
विषयान्तरसम्बन्धिताका प्रसङ्ग नहीं आ सकता । यदि पूछो कि—
विषयीकरणका क्या अर्थ है ? तो करणका भी क्या अर्थ है ? यह
विचारणीय है । यदि कहो कि—कार्यका उत्पादन ही करण है—तो
ज्ञानमे तदीयताकी उत्पत्ति ही विषयीकरण, यह समझना चाहिये ।
साथ ही विषयकृत ज्ञानगतविषयितारूप उपकार भी जैसे यहाँपर ज्ञान-
स्वरूपसे अतिरिक्त वस्तु नहीं है, वैसे वहाँ भी कारणकृत कार्यगत करण
रूप (उत्पादनरूप) उपकार भी कार्यस्वरूपसे अतिरिक्त वस्तु नहीं है,
यह ध्यान देने की चीज है ।
इसीलिये विषयविषयिभावके समान कार्यकारणभाव भी उपेक्षणीय
है—यह कथन भी बहुत बड़ा साहस है । अर्थात् "नियतकार्यके उत्पादन
१ वार्येत इति ३ पु० पा० ।
तृतीय परिच्छेद: गुण-गुणी-भेद विचार एवं प्रत्यक्ष-स्मृति उपपत्ति
बाह्यार्थभङ्गवादः २१७
सम् । तथा सति हि स्यादेव न स्यादेवेत्याद्यापद्येत । तथा
च प्रकाशतमसोरन्यतरस्य कौटस्थ्यप्रसङ्गः । संवृतोऽस्त्विति¹
चेत्, विषयविषयिभावोऽप्येवमस्तु । यदि विषयकार्ययोर्बलवती
बाधेति संवृतः, नो चेदेव²मिति द्वयी गतिः ।
तदत्र तत्त्वम्—न तावदुभयनिष्ठं लक्षणम्, सतोऽसतो वा
स्थिरस्यापि स्फुरणात् । न च ज्ञाननित्यतायां पारमार्थिक-
के लिये कारणप्रगत उपकारान्तर ( प्रयोजकान्तर ) की अपेक्षा होनेपर
अनवस्था और उसकी अनपेक्षा माननेपर साधारण्यदोषके कारण ही
कार्यकारणभाव भी नहीं मानना चाहिए" इस प्रकारका कथन तो
दुःसाहस है । क्योंकि कार्यकारणभावका बहिष्कार देनेपर तो कार्य या
तो नित्य ही होता रहे अथवा बिल्कुल न होवे । अर्थात् संसारके सभी
पदार्थ नित्य होंगे या मिथ्या होने चाहिये । ऐसे ही विषयविषयिभावका
बहिष्कार करनेपर प्रकाश और अन्धकारमें कोई एक कूटस्थ नित्य होने
लगेगा । अर्थात् ज्ञानको यदि विषयनिरपेक्ष होनेसे अनादि मानो तो
ज्ञानमे कूटस्थत्व ( सदातनत्व ) आजायगा तथा यदि मिथ्या मानो तो
ज्ञानका अभाव ही कूटस्थ हो जायगा । इस प्रकार क्षणिकविज्ञानवाद
उभयथा ध्वस्त हो जाता है ।
यदि कहो कि—कार्यकारणभावका सर्वथा अपलाप नहीं किया जा
रहा है किन्तु वह संवृत ( व्यावहारिक ) मात्र है—तो विषयविषयिभाव
भी वैसे ही व्यावहारिक होवे । इसलिये विषयविषयिभावमें और
कार्यकारणभावमे यदि बलवान् बाधक होगा तो दोनो ही सांवृतिक होंगे,
अन्यथा दोनों ही वास्तविक होंगे ।
यहाँ यह निष्कर्ष है कि विषयविषयिभावरूप नियामक बौद्धमता-
नुसार विषय और ज्ञान उभयनिष्ठ नहीं हो सकता है । क्योंकि भाव या
अभावभूत स्थिर पदार्थका भी भान होनेसे उभयनिष्ठताकी दशामें विषय
के स्थिर होनेसे तत्सद्भूत ज्ञान भी स्थिर होने लगेगा । "ज्ञानके नित्य
होनेके कारण विषयविषयिभावको ज्ञाननिष्ठ माननेपर सदा व्यवहारका
१ सांवृतोऽस्तु कार्यकारणभाव इत्यर्थः ।
२ वास्तवमित्यर्थः ।
२१८ आत्मतत्त्वविवेक
बाह्यनिष्ठम् सत्कार्यवादव्यावृत्तेः सांख्यप्रक्रियाविध्वंसात् ।
न खलु पूर्वापर ( पूर्व ) तिरोभावाविर्भावान्तरेण विचारस्या-
प्यवसरः । नाप्यलोकग्राह्यतया क्षणिकज्ञाननिष्ठमिति, तुच्छस्य
विशेषाभावात्, ज्ञानस्य च निराकारत्वात्, अन्यत्राप्य ( प्र )
सिद्धेरारोपयितुमशक्यत्वात् ।
असन्त एव विशेषावभासकास्सन्तीति चेन्न, असन्त इति
ह्यतत्काला अतद्देशा इति वा ? अकिञ्चिद्रूपा इति वा ?
प्रसङ्ग होने लगेगा । अत आविर्भाव और तिरोभाव स्वभाववाले विषय
में ही स्थित विषयविषयिभाव होगा" यह सांख्यमत भी ठीक नहीं है ।
क्योंकि सत्कार्यवादक निराकरण हो जानेसे सांख्यकी यह प्रक्रिया भी
ध्वस्त है । क्योंकि पूर्वके विनाश और उत्तरकी उत्पत्तिके बिना प्रस्तुत
विचारका भी अवसर नहीं आ सकता है । अर्थात् ज्ञानके नित्य मानने
पर उसका उत्पाद और विनाश नहीं हो सकेगा । अत विपरीत पूर्व
ज्ञानकी निवृत्ति और यथार्थ उत्तरज्ञान की उत्पत्तिके लिये किया जाने
वाला यह विचार भी निष्फल हो जायगा ।
ग्राह्यविषयोंक अलीक होनेसे क्षणिकविज्ञाननिष्ठ भी विषयविषयि-
भाव नहीं हो सकता । क्योंकि विषयके तुच्छ होनेसे विषयकृत तथा
ज्ञानके निराकार होनेसे आकारकृत विशेषता ज्ञानोंमे नहीं आ सकती ।
अत नीलज्ञान और पीतज्ञानमे परस्पर विशेषताकी प्रतीति नहीं हो
सकेगी । साथ ही जो अन्यत्र कहीं प्रसिद्ध नहीं हैं, उसका आरोप भी
नहीं हो सकता । अत आरोपित नीलपीतादिके द्वारा भी ज्ञानोंमे
विशेषता नहीं आ सकती है ।
यदि कहो कि—असत्ख्यातिवादके अनुसार नीलपीतादि असत होते
हुए भी ज्ञानोंमे विशेषाधायक होंगे । जैसे, अतीत और अनागत वस्तु
वर्तमानमें असत् होती हुई ही ज्ञानकी विशेषिका होती है—तो ऐसा
नहीं कह सकते हो । क्योंकि असत्का क्या अर्थ है ? क्या जो तत्का-
लीन और तद्देशीयसे भिन्नरूप है, उसे असत् कहते हो ? या जो
अकिञ्चिद्रूप हैं, वह असत् है ? अथवा कोई नियत व्यावृत्तिमात्रस्वरूप
बाह्यार्थभङ्गवाद २१९
नियतव्यावृत्तिमात्ररूपा इति वा ? प्रथमे कालदेशान्तरयोः
सत्त्वप्रसङ्गः । द्वितीये त्वविशेषता । तृतीये नीलस्यालीकस्या-
नीलव्यावृत्तिरूपतायामनीलानां पारमार्थिकत्वप्रसङ्गः । तेषा-
मलीकत्वे तद्व्यावृत्त्यात्मनो नीलस्यानलीकत्वापत्तिः । तथा-
ऽप्यलीकत्वेऽविशेषत्वम् ।
तेन रूपेणाविशेषत्वमेवेति चेत्, अथ विशेषः केन ?
नीलपीतादिनेति चेत्, तत् किं ततोऽधिकम् ? अनलीकं तर्हि
स्यात् । अनधिकं चेत्, कुतस्तेनापीति ।
वासनावशाद् विशेषाः स्फुरन्तीति चेत्, स्फुरन्तु, कः
कारणे विप्रतिपद्यते ? ते तु नीलादयो यद्यकिञ्चिद्रूपाः, कथं
है ? यदि प्रथम अर्थ लो तो प्रतियोगीभूत कालान्तर और देशान्तरकी
सत्ता सिद्ध हो जाती है । द्वितीय अर्थमें उससे ज्ञानोंमें कोई विशेषता
नहीं आ सकती है । तृतीय अर्थमें अलीकभूत नील यदि अनीलोंकी
व्यावृत्तिरूप हो तो अनीलोंमें पारमार्थिकता आजायगी । यदि वे अनील
मिथ्या हों तो उनकी व्यावृत्तिरूप नीलमें पारमार्थिकत्वका प्रसङ्ग हो
जायगा । यदि वे अनील और उनकी व्यावृत्तिरूप नील सभी अलीक
हों तो पुन वे ज्ञानमें विशेषाधायक नहीं हो सकते हैं ।
यदि कहो कि-अलीकत्वरूपसे नीलादि ज्ञानके अविशेषक ही हैं तो
फिर वे ज्ञानमे विशेषता किसरूपमें लाते हैं ? यदि कहो कि-नीलत्व-
पीतत्वादिरूपसे, तो यह क्या अलीकसे भिन्न है ? यदि भिन्न हो तो यह
नीलत्वादि अनलीक अर्थात् सत् हो जायगा । यदि वह नीलत्वपीतत्वादि
अलीकसे अभिन्न हो तो फिर उसरूपसे भी नीलपीतादि ज्ञानके विशेषक
कैसे हो सकते हैं ?
यदि कहो कि-वासनावशसे ज्ञानगत विशेषताओंका स्फुरण होता
है । अर्थात् वासनाविशेषसे असत् भी नीलादिका स्फुरण होता है
और वे ही ज्ञानके विशेषक होते हैं-तो वे भले ही स्फुरित होवें ।
क्योंकि स्फुरणके कारणके सम्बन्धमें किसे मतभेद है ? किन्तु वे नीलादि
यदि अकिञ्चिद्रूप (तुच्छ) हैं तो वे ज्ञानमें विशेषक कैसे हो सकते हैं ?
विशेषाः ? तदितररूपेणाकिञ्चिद्रूपत्वे तेन रूपेण किञ्चिद्रूपा
एवेति ब्रूमः ।
विचारासहत्वमात्रमलीकत्वमिति चेत्, तथापि भाषापरि-
वर्तनमात्रम्, विचारासहतायाः किञ्चिद्रूपत्वविरोधित्वात् ।
अविरोधे वा तद्विचारासहना अपि किञ्चिद्रूपा एव नीलादय
इति विचारस्य दुर्विचारत्वप्रसङ्गः । तेन नीलादीनां छाया-
मात्रस्याप्यनाक्रान्तेः प्रविश वा अनिर्वचनीयख्यातिकुक्षौ,
तिष्ठ वा मतिकर्दममपहाय न्याय नयानुसारेण नीलादीनां
पारमार्थिकत्वे । तस्मात्—
न ग्राह्यभेदमवधूय धियोऽस्ति वृत्तिस्-
यदि यह कहो कि—नीलत्वसे इतर जो पीतत्वादि उस रूपसे वे नीलादि
अकिञ्चिद्रूप हैं—तो नीलत्वरूपसे वे किञ्चिद्रूप (वास्तविक) ही हैं,
ऐसा हम कह सकते हैं ।
यदि कहो कि—विचारासहत्व ही अलीकत्व है । अर्थात् नीलादि-
के स्फुरित होनेमे तथा ज्ञानोंका विशेषक होनेमे कोई बाधा नहीं है ।
किन्तु वे विचारकी कसौटीपर टिक नहीं पाते, अतएव अलीक कहे जाते
हैं—तथापि इस कथनमे भाषाका ही केवल भेद है, वस्तुमे कोई अन्तर
नहीं आता । अर्थात् नीलादिविषयको विचारासह कहते हुए उसे अकि-
ञ्चिद्रूप (तुच्छ) ही कह रहे हो । क्योंकि विचारासहत्व किञ्चिद्रूपत्वका
विरोधी है । यदि विरोधी न हो तो तुम्हारे लिये विचार सहनेके
अयोग्य भी नीलादि किञ्चिद्रूप (वास्तविक) ही बने रहे । इस प्रकार
तुम्हारा विचार ही दुर्विचार बन गया । क्योंकि उस विचारसे नीलादि
विषयोंकी छायामात्र भी नहीं लांघी जा सकी, उन्हें तुच्छ सिद्ध करना
तो दूर रहा । अत असत्ख्यातिवादको छोडकर वेदान्तकी अनिर्वचनीय
ख्यातिकी शरण ग्रहण करो अथवा बुद्धिकी सङ्कीर्णता हटाकर न्यायमता-
नुसार नीलादि विषयोंकी वास्तविकता स्वीकार करो । अत —
बाह्यार्थभेदोंके बिना ज्ञानस्थ भेद न सिद्ध है,
बाह्यार्थभङ्गवादः २२१
तद्बाधने बलिनि वेदनये जयश्रीः ।
नो चेदनिन्द्यमिदमीदृशमेव विश्वं
तथ्यं तथागतमतस्य तु कोऽवकाशः ? ॥ १ ॥
तच्चालीकं विचारासहमनिर्वचनीयं वा यमाश्रित्य जग-
दुद्गीयते, स एव विचारश्चिन्त्यतां कोऽसौ कीदृशश्चेति ।
सतर्कं प्रमाणमेव वाक्यारूढमिति चेत्, तच्चेद् विचारासहम्,
किं तेन भौतविचारकल्पेन ।
तथाहि, केनचिद्भौतेन राजद्वारे द्विरदमवलोक्य विक-
ल्पितम्-किमयमन्धकारो मूलकमत्ति ? आहोस्वित् जलवाहो
वलाकान् वर्षति गर्जति च ? यद्वा बान्धवोऽयम् “राजद्वारे
श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः” इति परमाचार्यवचनात् ,
बाह्यार्थबाधे विजयछवि वेदान्तकी ही सिद्ध है ।
यदि यों नहीं, तो विश्व ऐसा ही यथार्थप्रकाश है,
फिर क्या सुगतमतका यहाँ कुछ भी बचा अवकाश है ?
एवं जिसके द्वारा जगत्को विचारासहके रूपमें अथवा अनिर्वचनीय
के रूपमें अलीक कहते हो, उस विचारका ही चिन्तन करो कि वह क्या
है और कैसा है ? यदि—प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन-
रूप पञ्चावयववाक्योपपन्न तर्कसहित प्रमाण ही वह विचार है—तो वह
प्रमाणरूप विचार भी यदि नीलादिके समान ही विचारासह है तो भूता-
विष्टोंके विचारके समान वह विचार भी निष्फल ही है । अर्थात् उसके
द्वारा सिद्ध किया हुआ जगत्का अलीकत्व भी स्वयं मिथ्या हो गया
और फलतः जगत् सत्य ही सिद्ध हो गया ।
जैसे, किसी भूताविष्टने राजाके द्वारपर हाथीको देखकर कल्पना की
कि—क्या यह अन्धकार मूली खा रहा है ? या मेघ बगुलोंकी वर्षा कर
रहा है और गरज रहा है ? या यह कोई बान्धव है ? क्योंकि श्रेष्ठ
आचार्योंका वचन है कि राजाके द्वारपर और श्मशानपर जो रहता है
वह बान्धव है । अथवा जो यह जमीनपर दिखाई देता है, उसीकी
२७२ आत्मतत्त्वविवेके
अथवा योऽयं भूमौ दृश्यते तस्यच्छायेति ?
दूषितश्च—तत्र नाद्यः, शूर्पयुगलप्रस्फोटनानुपपत्तेः १। न
द्वितीयः, तस्य स्तम्भचतुष्टयाभावात् । न तृतीयः, तस्य
लगुडभ्रामणाभावात् । न चतुर्थः, तस्य नरशिरःशतोद्गिर-
णाभावात् । ततो न किञ्चिदिदमिति ।
किमेतावता द्विरदस्वरूपं निवर्त्तताम् ? यद्वा वरमेतस्माद्
योऽय सोऽयमिति वादी द्वितीयो भौतः । तद्विचारसहमिति
चेत्, एव तर्हि स्वयमेव विलीनमलीकादिवादैः, नोत्तरप्रती-
क्षणमपि ।
ऊपरकी तरफ खड़ी हुई छाया है ? ( यहाँ जमीनपर पड़ी छायामे
बिम्बभावका भ्रम तथा वास्तविक बिम्बमे छायाका भ्रम कर रहा है ।
पुन उसीने इन कल्पनाओंका खण्डन भी कर दिया कि प्रथमपक्ष
नहीं हो सकता । क्योंकि यह अन्धकार होता तो सूपोंका फड़फड़ाना
नही हो सकता । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि यह मेघ होता
तो इसके चार खम्भे नहीं होते । तीसरा पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि
यह बान्धव होता तो डण्डा नहीं घुमाता । चतुर्थ पक्ष भी नहीं हो सकता
है, क्योंकि वह भूमिस्थ वस्तुकी छाया होती तो उसमेंसे मनुष्योंके बहुत
से शिर नहीं निकलते । इसलिये यह कुछ भी नहीं है । (यहाँ कानोंमे
सूपका, चारों पैरोंमें स्तम्भका, पूँछमें डण्डेका तथा पुरीषपिण्डोंमे शिरका
भ्रम कर रहा है ) यहाँ पूर्व और उत्तर दोनों ही कथन भ्रम हैं ।
तो क्या इस भौतविचारसे हाथीकी सत्ता समाप्त हो जाती है ?
इससे वह दूसरा भौत ( भूतग्रस्त ) ही अच्छा है, जो “योऽय सोऽम्’
कहता हुआ अनिर्वचनीय बताता है ।
यदि तर्कसहित पञ्चावयववाक्योपपन्न प्रमाणरूप विचारको विचारसह
( विचारसिद्ध ) मानो तो यहीं पर तुम्हारा अलाकवाद बिना उत्तरकी
प्रतीक्षा किये अपने आप विलीन हो गया । अर्थात् तक प्रमाण और
पञ्चावयव वाक्य यदि पारमार्थिक हैं तो इनका विषय वक्ता और
१ प्रस्फोटनाभावात् इति ३ पु० पा० ।
, क्त has that horizontal/slanted shape! So it's clearly युक्तेरनाक्षेपकं!
Wait, what about line 8:
"अनङ्गमिवरत्" vs "अनङ्गमितरत्":
Look at line 8:
अ न ङ्ग म् ? No, look at the glyph:
Wait, could it be "अनङ्गमिवरत्"?
Look at the character after म: it has an i-matra and then a letter with a belly. That letter is definitely व or त. If it's a typo in the original print, let's look at whether it's 'व': yes, it looks very much like 'िव' or 'ित'. In fact, it is printed "अनङ्गमिवरत्" (misprint for अनङ्गमितरत्). Let's print "अनङ्गमिवरत्" (or "अनङ्गमितरत्"). Actually, in scholarly transcriptions, writing what is printed is standard, or "अनङ्गमिवरत् [अनङ्गमितरत्]". But let's look at the letters:
Wait, look at: 'अनङ्गमितरत्' - could the letter after ङ्ग be 'मि'?
Wait! Look at letter 4:
Could letter 4 be 'मि'?
If letter 4 is 'मि', what is letter 5?
Letter 5 is 'त'!
Wait! Is letter 5 'त'?
YES! Look at 'त': it has the exact shape
७२४ आत्मतत्त्वविवेके
अहं मूक इति, इमं न जानामीति, मम कर्णे प्रविश्य गजो
गर्जति भेषजमुच्यतामिति ।
तदर्थश्च साधनं दूषणं च । तत्र साधनं व्याप्तिपक्षधर्म-
तौपयिकरूपपञ्चकोपेतं लिङ्गम्, यथा विशिष्टधूमवत्त्वादिति ।
लिङ्गाभासमितरत्, यथा जलाशयत्वादिति ।
तत्परिकरश्च तर्कः । सोऽपि व्याप्तिबलमालम्ब्यानिष्टप्रसङ्ग-
रूपः । अनिष्टं च द्विविधं प्रामाणिकपरित्यागोऽप्रामाणिकपरि¹-
प्रमाणसे बाधित होनेके कारण "शशो विषाणी" यह वाक्य, स्ववचन-
व्याघातदोषसे "माता वन्ध्या" यह वाक्य, उच्चारणरूप क्रियासे व्या-
घात होनेके कारण "अहं मूकः" यह वाक्य, स्वज्ञानव्याघात होनेसे
"इमं न जानामि" यह वाक्य (क्योंकि ज्ञात विषयको ही "इमम्" शब्द
से व्यवहृत किया जा सकता है, अतः "इमं न जानामि" कहना स्वज्ञान-
व्याहत है), तथा स्वार्थप्रतिषेधक युक्तिका उपस्थापक होनेके कारण
"मम कर्णे प्रविश्य गजो गर्जति, भेषजमुच्यताम्" इत्यादि वाक्य अर्थके
बोधक नहीं होते हैं। यहाँ अन्तिम वाक्यमें कानमें प्रविष्ट हाथीकी
गर्जनाके निवारणार्थ औषधकी जिज्ञासा की गयी है। किन्तु कर्णमें
गजगर्जनरूप निवारणीय वस्तु ही अत्यन्त असत् है। अतः उसके
लिए औषधाभिधान सर्वथा अयोग्य है। अतः यह वाक्य अर्थबोधक
नहीं हो सकता है।
एवं उक्त पञ्चावयव वाक्यका अर्थ (प्रयोजन) है 'स्वपक्षका साधन
तथा परपक्षका दूषण'। इनमें व्याप्ति पक्षधर्मताके सम्पादक पक्षसत्त्व,
सपक्षसत्त्व, विपक्षव्यावृत्तत्व, असत्प्रतिपक्षितत्व और अबाधितत्व नामक
पञ्चरूपोंसे युक्त हेतु ही साधन है, जैसे वह्निको सिद्ध करनेमें अविच्छि-
न्नमूळवाला धूम हेतु। किन्तु उक्त पञ्चरूपोंसे जो रहित होगा, वह
हेतु न होकर हेत्वाभास होगा जैसे वह्नि सिद्ध करनेमें जलाशयत्व
हेत्वाभास होगा न कि हेतु। तथा उसका सहकारी कारण तर्क होता
है। वह तर्क भी व्याप्तिबलके आधारपर अनिष्टापादनस्वरूप है।
१ नाभ्युपगमश्च इति ३ पु० पा० ।
बाह्यार्थभङ्गवादः २२५
ग्रहश्च¹, यथा यद्यदकं पिपासादुःखं न शमयेन्, न पीयेत ।
यदि च तदेव परमन्तर्दहेत्, तदाऽविशिष्टं मामपि दहेत् ।
इतरस्तु तर्काभासः । यथा यदि जलं पिपासादुःखं नाश-
मयिष्यत् रूपवदपि नाभविष्यत्, यथाऽऽकाशम् । यदि च
तदेव परमधक्ष्यत् मामपि सुरभिमकरिष्यदिति ।
दूषणमपि स्वप्रतिक्षेपयुक्तेरनाक्षेपकं दूष्यासाधकत्वा-
विनाभूतं सिद्धं च । यथाऽग्निमत्त्वे साध्ये प्रमेयत्वमनैकान्ति-
और यह अनिष्ट दो प्रकारका होता है, प्रामाणिकका परित्यागरूप तथा
अप्रामाणिकका ग्रहणरूप । जैसे-यदि पानी प्यासके कष्टको नहीं मिटाता
तो उसका पान नहीं किया जाता । यहाँ पानीका पीया जाना प्रामाणिक
है, अतः प्रामाणिकका परित्यागरूप अनिष्टापादन किया गया है । एवं
वही यदि भीतर दाह पैदा करता तो समानन्यायसे मुझमें भी दाह
पैदा करता । यहाँ पानीका दाह पैदा करना अप्रामाणिक है । अतः
अप्रामाणिकका ग्रहणरूप अनिष्टका आपादन किया गया है । यहाँ प्रामा-
णिकका परित्याग तथा अप्रामाणिकका ग्रहणरूप दोनों ही तरहका
अनिष्टापादन व्याप्तिके आधारपर है, अत यह तर्क है ।
किन्तु व्याप्तिबलके बिना ही किया जाने वाला अनिष्टापादन तर्का-
भास है । जैसे-यदि जल प्यासके कष्टको नहीं शान्त करता तो वह
रूपवान् भी नहीं होता, जैसे आकाश । और यदि वही भीतर दाह
पैदा करता तो मुझे भी सुगन्धित कर देता । यहाँ पिपासा शान्त करनेका
रूपवान् होनेके साथ तथा दाह पैदा करनेका सुगन्धित करनेके साथ कोई
व्याप्ति सम्बन्ध नहीं है । अत यह तर्काभास है ।
एव परपक्षका दूषण करनेवाला भी वही होता है, जो स्वार्थप्रति-
क्षेपक युक्तिका उपस्थापक न हो, दूषणीय विषयका निश्चित रूपसे असा-
धक हो तथा स्वय सिद्ध हो अर्थात् असिद्धग्रस्त न हो । जैसे, अग्नि-
साध्यके प्रति व्यभिचारी होनेसे प्रमेयत्व हेतु नहीं होता । अर्थात् यहाँ
दिया गया व्यभिचाररूप दूषण स्वार्थपर आघात करनेवाली युक्तिको
उपस्थित नहीं करता और न दूषणीय वह्निरूप साध्यका साधक ही है
तथा वह्निसाध्यके प्रति प्रमेयत्वहेतुमे व्यभिचारदोष सिद्ध भी है ।
१५
२२६ आत्मतत्त्वविवेके
कत्वादहेतुरिति । अन्यथा तु तदाभासम्, यथाऽयं धूमो
नाग्निसाधकः सर्वथानुपलभ्यमानोपाधिशङ्काग्रस्तत्वात् प्रमेय-
त्वात् विरुद्धत्वाच्चेति ।
इतरदपि प्रमाणमनुमानच्छाययैव विचाराङ्गम्, तर्क-
मन्यथासिद्धिं च पुरस्कृत्य प्रवृत्तेः । ततस्तत्राप्येषैव रीतिरनु-
गन्तव्येति ।
एवं व्यवस्थिते लोकव्यवहारे साधनोपक्रमेण यदि
विचारयसि, प्रतिज्ञैव तावन्नाङ्गं धारयति । तथाहि—न
किञ्चिदस्ति, न किञ्चित् सत्यम्, न किञ्चित् कारकम्, न
इसके विपरीत जो दूषण उक्त तीनों लक्षणोंसे रहित होता है वह
तो दूषण न होकर दूषणाभास होता है । जैसे कोई कहे कि "यह धूम
अग्निका साधक नहीं है, क्योंकि सर्वथा अनुपलभ्यमान उपाधियोंकी
शङ्कासे ग्रस्त है, प्रमेय है तथा अग्निसाध्यके प्रति विरुद्ध है । अर्थात्
यहाँका दूषण अपना ही व्याघातक है । क्योंकि यदि धूम हेतुको सर्वथा
अनुपलभ्यमान उपाधियोंकी आशङ्कासे ग्रस्त माना जाय तो दूषणभूत
तुम्हारा यह सर्वथानुपलभ्यमानोपाधिशङ्काग्रस्तत्वरूप हेतु भी स्वयं
सर्वथानुपलभ्यमानोपाधिशङ्कासे ग्रस्त हो जायगा । एवं जो प्रमेय
होता है वह अग्निका असाधक नहीं होता, क्योंकि धूम प्रमेय होता
हुआ भी तुम्हारे लिये दूषणीयभूत अग्निका साधक ही होता है । तथा
वह्निरूप साध्यके प्रति धूमहेतुको विरुद्ध कहना असिद्ध है ।
प्रत्यक्ष आदि प्रमाण भी अनुमानके समान ही विचारका अङ्ग होते
हैं । क्योंकि तर्क और अनन्यथासिद्धि (व्याप्ति) को लेकर ही उनकी
भी प्रवृत्ति होती है । इसलिये उनमें भी अनुमानकी ही रीतिको अनु-
सरण करना होगा ।
इस प्रकार तर्करूप परिकरकी शुद्धिसहित साधन और दूषणद्वारा
ही लोकव्यवहार होता है, ऐसी व्यवस्था हो जानेपर यदि स्वपक्ष-
साधनके रूपमें विचार करते हो तो तुम्हारी प्रतिज्ञा ही अपने स्वरूपको
कायम नहीं रख सकती है । क्योंकि कोई वस्तु नहीं है, जैसे रज्जुसर्प,
बाह्यार्थभङ्गवादः २२७
किञ्चिद् विचारसहम्, न किञ्चित् सालम्बनम्, न किञ्चिद्
दर्शनम्, न कश्चित् सिद्धान्त इत्यादौ स्वार्थप्रतिक्षेपस्तावद् दुरु-
द्धरः१। प्रतिज्ञाऽपि हि न स्यान्न सत्या, न कारिका, न
विचारसहा, तद्विज्ञानमपि न सालम्बनम्, तत्फलमपि न
दर्शनम्, तदर्थोऽपि न सिद्धान्त इत्यापद्येत ।
इष्यत एवेदमिति चेत्, इच्छामात्रेण व्याघातनिवृत्तेः ।
यदि हि न (ज्ञातं)२ किञ्चिदस्तीत्यादिप्रतिज्ञार्थः प्रतिज्ञां
स्पृशेत्, कथमयमर्थः प्रत्येत्तव्यः ? न चेत्, कथं सानुपपन्ना ?
कोई ज्ञान सत्य नहीं है, जैसे रज्जुसर्पज्ञान, कुछ भी अर्थक्रियाकारक
नहीं है, जैसे शशशृङ्ग; कुछ भी विचारकी कसौटीपर स्थिर रहनेवाला
नहीं है; जैसे प्रतिबिम्ब; कोई भी ज्ञान सालम्बन ( सविषयक ) नहीं है,
जैसे स्वप्नज्ञान, दृश्यरूप वस्तुके अभावमें कोई दर्शनरूप क्रिया भी नहीं
है; जल और अग्निके समान परस्पर व्याघातक होनेके कारण कोई
सिद्धान्त भी नहीं है; इत्यादि प्रकारकी प्रतिज्ञाओंमें स्वार्थप्रतिक्षेपका
वारण अशक्य है। अर्थात् इस प्रकारकी प्रतिज्ञासे उक्तप्रतिज्ञाके ही
स्वरूपपर आघात पहुँच जाता है। क्योंकि जब कुछ नहीं है, तब यह
प्रतिज्ञा भी नहीं है। यदि कोई ज्ञान सत्य नहीं है तो प्रतिज्ञार्थका ज्ञान
भी सत्य नहीं होगा एवं पूर्वोक्त प्रकारसे प्रतिज्ञा भी अर्थक्रियाकारिका
नहीं होगी, विचारसह नहीं होगी, उसका ज्ञान सविषयक नहीं होगा,
उसका फल भी कोई बोध नहीं हो सकता तथा उसका अर्थ भी कोई
सिद्धान्त नहीं हो सकता; इत्यादि आपत्तियां स्वयं प्रतिज्ञाके ऊपर आ
पड़ती हैं।
यदि कहो कि—उक्त सारी बातें इष्ट ही हैं—तो तुम्हारी इच्छामात्रसे
व्याघातकी निवृत्ति नहीं हो सकती है। क्योंकि "न किञ्चिदस्ति"
इत्यादि प्रतिज्ञाओंका अर्थ यदि स्वयं इन प्रतिज्ञाओंपर भी लागू होता हो
तो इनके द्वारा बताये जानेवाले आपके अभीष्ट अर्थकी भी प्रतीति कैसे
हो सकेगी ? यदि उक्त प्रतिज्ञाओंका अर्थ इन प्रतिज्ञाओंको न छूता हो
१. दुर्वार इति १ पु० पा० २. ज्ञातमिति १ पुस्तके नास्ति ।
२२८ आत्मतत्त्वविवेके
तदनुपपन्नत्वे च कथं पुनः प्रतिज्ञार्थ उपपद्येत ? तदिदमा-
यातम्, स्वविषमूर्च्छिता भुजङ्गी आत्मानमेव१ दशतीति ।
तत्त्वत इति विशेषणादयमदोष इति चेत्, तद्विचारो वा
स्यात् लोकमर्यादातिक्रमो वा । प्रथमः पूर्वमेव निरस्तः;
तस्य प्रतिज्ञारूपतया कुलीरस्येव स्वप्रसूतयुक्त्यपत्येनैव प्रतिहत-
त्वात् । द्वितीये तु स्वच्छायातिक्रमवत् स एव व्याघातः । यदि
हि लोकमर्यादातिक्रमः, न विचारस्वरूपस्थितिः । तत्स्वरूप-
स्थितिश्चेत्, न तदतिक्रम२ इत्यर्थः ।
तो स्वयं इनका ही अस्तित्व सिद्ध हो गया, फिर सबका असत्त्व कहाँ
सिद्ध हुआ ? यदि तो सबके साथ इन प्रतिज्ञाओंका भी अस्तित्व न हो
तो इनके द्वारा बताये जानेवाले सर्वासत्त्व आदि आपका अभीष्ट
प्रतिज्ञार्थ भी कैसे सिद्ध हो सकेगा ? अर्थात् आपकी प्रतिज्ञायें अपने ही
स्वार्थकी घातिका बन जाती हैं । इससे यही आया कि अपने ही विषसे
मूर्च्छित हुई प्रतिज्ञासर्पिणी अपने आपको डँस रही है ।
यदि कहो कि—उक्त प्रतिज्ञावाक्योंमें "तत्त्वत" ऐसा विशेषण
देनेसे यह दोष नहीं आ सकता । अर्थात् तत्त्वरूपसे कुछ नहीं है,
यही उन प्रतिज्ञाओंका अर्थ है । इसलिए वस्तुओंकी और इन
प्रतिज्ञावाक्योंकी भी व्यावहारिक सत्ता मानते हैं—तो बताओ, तत्त्वका
अर्थ विचार है या अतात्त्विक लोकमर्यादाका अतिक्रमण ही तत्त्व
है ? प्रथम पक्ष तो पहले ही खण्डित हो चुका है । क्योंकि विचार
तो पूर्वोक्त प्रतिज्ञारूप ही है, जो केंकड़ेके समान स्वयं पैदा की गयी
युक्तिरूपी सन्ततिक ही द्वारा विनष्ट हो चुका है । दूसरे पक्षमें तो
अपनी छायाको लाँघनेके समान फिर वही व्याघात दोष आ जाता है ।
क्योंकि यदि लोकमर्यादाका अतिक्रमण होगा तो विचारका स्वरूप
ही नष्ट हो जायगा और वह दुर्विचार हो जायगा । यदि विचार
स्वरूपको कायम मानो तो लोकमर्यादाका अतिक्रमण नहीं हुआ ।
१ स्वा मानमपि इति २ पु० पा०
२ इति प्रतिषेध्यसिद्ध्यासिद्धिभ्यां व्याघातात् इति १ पु० पा०
बाह्यार्थभङ्गवादः ७२९
प्रतिषेध्यसिद्ध्यसिद्धिब्याघातश्च । यदि हि प्रतिषेध्यं
सिद्धं नात्यन्ताय प्रतिषेधः । न चेन्नतराम् । लोकव्यवहारसि-
द्धमिति चेत्, सिद्धमेव हि तर्हि, नह्यन्यतोऽपि किञ्चित् सिध्यति ।
नायमबाध्यो व्यवहार इति चेत्, न, यदि नैकत्र, अन्यत्रापि¹
तथाभावप्रसङ्गात् ।
सर्वत्र बाध्यत इति चेत्, तदपेक्षसिद्धिना व्यवहारेण ?
यदि कहो कि तत्त्वका अर्थ परमार्थ है, इसलिए उक्त प्रतिज्ञाओंका
अर्थ है कि परमार्थतः कुछ भी सत् नहीं है इत्यादि—तो भी प्रतिषेध्यकी
सिद्धि या असिद्धि उभय दशाओंमें व्याघात दोष आ जाता है । क्योंकि
जिस पदार्थका प्रतिषेध कर रहे हो वह प्रतिषेध्य यदि सिद्ध है, तो उसका
आत्यन्तिक प्रतिषेध नहीं हो सकता है । और यदि वह प्रतिषेध्य वस्तु
असिद्ध है, तब तो सुतराम् प्रतिषेध नहीं हो सकता है । क्योकि निषेधके
प्रति निषेध्यरूप प्रतियोगीका ज्ञान कारण होता है यदि कहो कि—
प्रतिषेध्य वस्तु लोकव्यवहारसे सिद्ध है, अतः उसका प्रतिषेध होनेमे
कोई बाधा नहीं है—तब तो वह वस्तु सिद्ध ही हो गयी । क्योंकि
किसी भी वस्तुकी सिद्धि लोकव्यवहारसे ही होती है, अन्य प्रकार-
से नहीं ।
यदि कहो कि—प्रतियोगीभूत प्रतिषेध्य वस्तु लोकव्यवहारसे सिद्ध
तो है, किन्तु वह लोकव्यवहार अबाध्य नहीं है । अर्थात् प्रतिषेधके लिए
प्रतियोगीके प्रमात्मक ज्ञानकी आवश्यकता नहीं है, किन्तु भ्रमात्मक
प्रतियोगीज्ञानसे प्रतिषेध हो सकता है—तो ऐसा नहीं कह सकते ।
क्योंकि वह लोकव्यवहार यदि एक जगह अबाध्य नहीं है, अर्थात् किसी
एक ही जगह बाध्य है, तो अन्य जगहोंपर उसका अबाध्य होना मानो ।
तात्पर्य यह है कि शुक्तिमें रजतत्व यदि अबाध्य नहीं है, तो बाजारमें
वर्तमान रजत अवश्य अबाध्य है । यदि कहो कि—वह लोकव्यवहार
सिर्फ एक जगह नहीं किन्तु सर्वत्र बाधित है—तो क्या बाध्यभूत वस्तु
की अपेक्षाकर जिसकी सिद्धि है, ऐसे व्यवहारप्रमाणसे वह बाधित
¹ मूले 'अपि' शब्द स्वीकृतिसूचक ।