आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 268, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवाद २१९
नियतव्यावृत्तिमात्ररूपा इति वा ? प्रथमे कालदेशान्तरयोः
सत्त्वप्रसङ्गः । द्वितीये त्वविशेषता । तृतीये नीलस्यालीकस्या-
नीलव्यावृत्तिरूपतायामनीलानां पारमार्थिकत्वप्रसङ्गः । तेषा-
मलीकत्वे तद्व्यावृत्त्यात्मनो नीलस्यानलीकत्वापत्तिः । तथा-
ऽप्यलीकत्वेऽविशेषत्वम् ।
तेन रूपेणाविशेषत्वमेवेति चेत्, अथ विशेषः केन ?
नीलपीतादिनेति चेत्, तत् किं ततोऽधिकम् ? अनलीकं तर्हि
स्यात् । अनधिकं चेत्, कुतस्तेनापीति ।
वासनावशाद् विशेषाः स्फुरन्तीति चेत्, स्फुरन्तु, कः
कारणे विप्रतिपद्यते ? ते तु नीलादयो यद्यकिञ्चिद्रूपाः, कथं
है ? यदि प्रथम अर्थ लो तो प्रतियोगीभूत कालान्तर और देशान्तरकी
सत्ता सिद्ध हो जाती है । द्वितीय अर्थमें उससे ज्ञानोंमें कोई विशेषता
नहीं आ सकती है । तृतीय अर्थमें अलीकभूत नील यदि अनीलोंकी
व्यावृत्तिरूप हो तो अनीलोंमें पारमार्थिकता आजायगी । यदि वे अनील
मिथ्या हों तो उनकी व्यावृत्तिरूप नीलमें पारमार्थिकत्वका प्रसङ्ग हो
जायगा । यदि वे अनील और उनकी व्यावृत्तिरूप नील सभी अलीक
हों तो पुन वे ज्ञानमें विशेषाधायक नहीं हो सकते हैं ।
यदि कहो कि-अलीकत्वरूपसे नीलादि ज्ञानके अविशेषक ही हैं तो
फिर वे ज्ञानमे विशेषता किसरूपमें लाते हैं ? यदि कहो कि-नीलत्व-
पीतत्वादिरूपसे, तो यह क्या अलीकसे भिन्न है ? यदि भिन्न हो तो यह
नीलत्वादि अनलीक अर्थात् सत् हो जायगा । यदि वह नीलत्वपीतत्वादि
अलीकसे अभिन्न हो तो फिर उसरूपसे भी नीलपीतादि ज्ञानके विशेषक
कैसे हो सकते हैं ?
यदि कहो कि-वासनावशसे ज्ञानगत विशेषताओंका स्फुरण होता
है । अर्थात् वासनाविशेषसे असत् भी नीलादिका स्फुरण होता है
और वे ही ज्ञानके विशेषक होते हैं-तो वे भले ही स्फुरित होवें ।
क्योंकि स्फुरणके कारणके सम्बन्धमें किसे मतभेद है ? किन्तु वे नीलादि
यदि अकिञ्चिद्रूप (तुच्छ) हैं तो वे ज्ञानमें विशेषक कैसे हो सकते हैं ?