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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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पृष्ठ 267

२१८ आत्मतत्त्वविवेक
बाह्यनिष्ठम् सत्कार्यवादव्यावृत्तेः सांख्यप्रक्रियाविध्वंसात् ।
न खलु पूर्वापर ( पूर्व ) तिरोभावाविर्भावान्तरेण विचारस्या-
प्यवसरः । नाप्यलोकग्राह्यतया क्षणिकज्ञाननिष्ठमिति, तुच्छस्य
विशेषाभावात्, ज्ञानस्य च निराकारत्वात्, अन्यत्राप्य ( प्र )
सिद्धेरारोपयितुमशक्यत्वात् ।
असन्त एव विशेषावभासकास्सन्तीति चेन्न, असन्त इति
ह्यतत्काला अतद्देशा इति वा ? अकिञ्चिद्रूपा इति वा ?
प्रसङ्ग होने लगेगा । अत आविर्भाव और तिरोभाव स्वभाववाले विषय
में ही स्थित विषयविषयिभाव होगा" यह सांख्यमत भी ठीक नहीं है ।
क्योंकि सत्कार्यवादक निराकरण हो जानेसे सांख्यकी यह प्रक्रिया भी
ध्वस्त है । क्योंकि पूर्वके विनाश और उत्तरकी उत्पत्तिके बिना प्रस्तुत
विचारका भी अवसर नहीं आ सकता है । अर्थात् ज्ञानके नित्य मानने
पर उसका उत्पाद और विनाश नहीं हो सकेगा । अत विपरीत पूर्व
ज्ञानकी निवृत्ति और यथार्थ उत्तरज्ञान की उत्पत्तिके लिये किया जाने
वाला यह विचार भी निष्फल हो जायगा ।
ग्राह्यविषयोंक अलीक होनेसे क्षणिकविज्ञाननिष्ठ भी विषयविषयि-
भाव नहीं हो सकता । क्योंकि विषयके तुच्छ होनेसे विषयकृत तथा
ज्ञानके निराकार होनेसे आकारकृत विशेषता ज्ञानोंमे नहीं आ सकती ।
अत नीलज्ञान और पीतज्ञानमे परस्पर विशेषताकी प्रतीति नहीं हो
सकेगी । साथ ही जो अन्यत्र कहीं प्रसिद्ध नहीं हैं, उसका आरोप भी
नहीं हो सकता । अत आरोपित नीलपीतादिके द्वारा भी ज्ञानोंमे
विशेषता नहीं आ सकती है ।
यदि कहो कि—असत्ख्यातिवादके अनुसार नीलपीतादि असत होते
हुए भी ज्ञानोंमे विशेषाधायक होंगे । जैसे, अतीत और अनागत वस्तु
वर्तमानमें असत् होती हुई ही ज्ञानकी विशेषिका होती है—तो ऐसा
नहीं कह सकते हो । क्योंकि असत्का क्या अर्थ है ? क्या जो तत्का-
लीन और तद्देशीयसे भिन्नरूप है, उसे असत् कहते हो ? या जो
अकिञ्चिद्रूप हैं, वह असत् है ? अथवा कोई नियत व्यावृत्तिमात्रस्वरूप