आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवादः २१३
तथा तथा विवर्तते यथा यथाऽनुभाव्यतया¹ व्यवह्रियते ।
तत्तन्मायोपनीतोपाधिभेदाच्चानुभूतिरपि भिन्नेव व्यवहारपथ-
वतरति गगनमिव स्वप्नदृष्टघटकटाहकोटरकुटीकोटिभिः ।
तदास्तां तावत्, किमार्द्रकवणिजो वहित्रचिन्तया ?
है । अर्थात् अनादि अविद्यावश घटपटादिकोंमें तथा घटज्ञान पटज्ञान
आदिमें भेदकी प्रतीति होती है । एवं मायाद्वारा उपस्थापित उस उस
उपाधिके भेदसे ही एक भी अनुभव भिन्न-भिन्नरूपमें व्यवहृत होता है ।
जैसे एक ही आकाश स्वप्नमें देखे गये घट कटाह कोटर कुटी आदि
अनेक रूपोंमें भासित होता है ।
अब वेदान्तकी चर्चा स्थगित रहे । क्योंकि आदीके बनियाको
जहाजकी चिन्तासे क्या लाभ ? अर्थात् शून्यवादके खण्डनके लिये
न्यायदर्शन ही पर्याप्त होगा । अतः यहाँ वेदान्तके उपयोगकी आवश्यकता
नहीं है ।²
१ अनुभवनीयतया इति ३ पु० पा० ।
२ जिन युक्तियोंसे वेदान्त शून्यवादका खण्डन करेगा, उन्हीं युक्तियोंसे न्याय
भी खण्डन कर सकता है । क्योंकि सर्वथा असिद्ध भी शून्यता यदि
मान्य हो तो व्यवहारद्वारा सिद्ध पूर्णताने क्या अपराध किया है कि
वह न मानी जाय । यदि शून्यताको अनुभवबलसे मानो तो अनुभव
उसके विपरीत ही बताता है । क्योंकि स्वप्नमे भी शून्यताका अनुभव
किसीको नहीं होता है । एवं शून्यता क्या वस्तु है ? यह बताओ । यदि
कहो कि अभाव ही शून्यता है, तो सामान्यतः भावके साथ उसका कोई
विरोध नहीं है ।
यदि सार्वकालिक अभावको शून्यता कहो तो भी विरोध नहीं है ।
क्योंकि हमेशा किसी न किसीका कहीं न कहीं अभाव न्याय भी मानता
है । यदि कहो कि सर्वत्र अभाव शून्यता है, तो भी कोई विरोध
नहीं है, क्योंकि एक सम्बन्धसे सत्ता होनेपर भी अन्य सम्बन्धसे उसकी
असत्ता मानी ही जाती है । यदि कहो कि सभी सम्बन्धोंसे सर्वदा
सर्वत्र अभाव शून्यता है, तो किसका अभाव है, यह बताओ । यदि
सबका सर्वदा सर्वत्र अभाव शून्यता मानो तो सब काल, देश, सम्बन्ध