आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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पत्तेः । न हि जात्यन्धो नीलं ज्ञातुं निर्वक्तुं वा न शक्त इत्य-
ज्ञेयानिर्वच्य एव तल्लोक इति ।
माध्यमिकपक्षखण्डनम्
अस्तु तर्हि शून्यतैव परमं निर्वाणमिति चेत्, न, सा हि
यद्यसिद्धा, कथं तद्विशेषमपि¹ विश्वमभिधीयते ? वाङ्मात्रस्य
सर्वत्र सुलभत्वात् । परतश्चेत् सिद्धा, परोऽप्यभ्युपगन्तव्यो
ग्राह्यलक्षणं चावर्जनीयमिति ।
भी हो सकता है । क्योंकि जन्मसे अन्धा व्यक्ति नीलरूपका ज्ञान
और निर्वचन करनेमें यदि अशक्त है तो संसारमे सबके लिये नीलरूप
अज्ञेय और अनिर्वचनीय ही नही है ।
शून्यवाद ( माध्यमिकमत ) निराकरण ।
यहा शून्यवादी माध्यमिक शङ्का करता है कि—शून्यतामें ही परम-
शान्ति क्यों न मानी जाय ? अर्थात् हेयोपादेयरूप बाह्य जगत् और
ज्ञानका भी अभाव होनेसे द्वेष, भय और रागादिसे छुटकारा मिल
जायगा और परम शान्तिकी प्राप्ति हो जायगी—किन्तु ऐसी शङ्का नहीं
हो सकती है । क्योंकि सर्वशून्यतापक्षमें शून्यताग्राहक प्रमाणके भी
शून्य हो जानेसे शून्यताकी सिद्धि नहीं हो सकती है । यदि प्रमाणद्वारा
शून्यताकी सिद्धि न मानो, अर्थात् प्रमाणके बिना भी वाङ्मात्रसे शून्यता
की सिद्धि मानो तो समानन्यायसे शून्यताके बदले विश्व ( पूर्णता )
का ही स्वीकार क्यों न किया जाय ? क्योंकि वाङ्मात्र तो सर्वत्र
सुलभ है ।
शून्यताको यदि परत अर्थात् प्रमाणान्तरसे सिद्ध कहो तो वह पर भी
तुम्हें स्वीकार करना पडा। ऐसी परिस्थितिमे सर्वशून्यता कहो सिद्ध
हुई ? साथ ही ग्राह्यस्वरूप भी अनिवार्यरूपसे स्वीकृत करना पड़ा ।
कारण, शून्यता और प्रमाणमे तुमने विषयविषयिभावको अङ्गीकार कर
लिया। प्रमाणभूत पर भी यदि तात्त्विक न होकर संवृति अर्थात्
१ तदवशेष इति कलिकातामुद्रितपाठ ।