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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 266, कुल 530 में से

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पृष्ठ 266

बाह्यार्थभङ्गवादः २१७
सम् । तथा सति हि स्यादेव न स्यादेवेत्याद्यापद्येत । तथा
च प्रकाशतमसोरन्यतरस्य कौटस्थ्यप्रसङ्गः । संवृतोऽस्त्विति¹
चेत्, विषयविषयिभावोऽप्येवमस्तु । यदि विषयकार्ययोर्बलवती
बाधेति संवृतः, नो चेदेव²मिति द्वयी गतिः ।
तदत्र तत्त्वम्—न तावदुभयनिष्ठं लक्षणम्, सतोऽसतो वा
स्थिरस्यापि स्फुरणात् । न च ज्ञाननित्यतायां पारमार्थिक-
के लिये कारणप्रगत उपकारान्तर ( प्रयोजकान्तर ) की अपेक्षा होनेपर
अनवस्था और उसकी अनपेक्षा माननेपर साधारण्यदोषके कारण ही
कार्यकारणभाव भी नहीं मानना चाहिए" इस प्रकारका कथन तो
दुःसाहस है । क्योंकि कार्यकारणभावका बहिष्कार देनेपर तो कार्य या
तो नित्य ही होता रहे अथवा बिल्कुल न होवे । अर्थात् संसारके सभी
पदार्थ नित्य होंगे या मिथ्या होने चाहिये । ऐसे ही विषयविषयिभावका
बहिष्कार करनेपर प्रकाश और अन्धकारमें कोई एक कूटस्थ नित्य होने
लगेगा । अर्थात् ज्ञानको यदि विषयनिरपेक्ष होनेसे अनादि मानो तो
ज्ञानमे कूटस्थत्व ( सदातनत्व ) आजायगा तथा यदि मिथ्या मानो तो
ज्ञानका अभाव ही कूटस्थ हो जायगा । इस प्रकार क्षणिकविज्ञानवाद
उभयथा ध्वस्त हो जाता है ।
यदि कहो कि—कार्यकारणभावका सर्वथा अपलाप नहीं किया जा
रहा है किन्तु वह संवृत ( व्यावहारिक ) मात्र है—तो विषयविषयिभाव
भी वैसे ही व्यावहारिक होवे । इसलिये विषयविषयिभावमें और
कार्यकारणभावमे यदि बलवान् बाधक होगा तो दोनो ही सांवृतिक होंगे,
अन्यथा दोनों ही वास्तविक होंगे ।
यहाँ यह निष्कर्ष है कि विषयविषयिभावरूप नियामक बौद्धमता-
नुसार विषय और ज्ञान उभयनिष्ठ नहीं हो सकता है । क्योंकि भाव या
अभावभूत स्थिर पदार्थका भी भान होनेसे उभयनिष्ठताकी दशामें विषय
के स्थिर होनेसे तत्सद्भूत ज्ञान भी स्थिर होने लगेगा । "ज्ञानके नित्य
होनेके कारण विषयविषयिभावको ज्ञाननिष्ठ माननेपर सदा व्यवहारका
१ सांवृतोऽस्तु कार्यकारणभाव इत्यर्थः ।
२ वास्तवमित्यर्थः ।