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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 530 में से

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पृष्ठ 263

२१४ आत्मतत्त्वविवेके

तस्मादनुभवव्यवस्थितौ अनात्माऽपि स्फुरतीत्यवर्जनीय-
मेतत् । तत्सिद्धौ तल्लक्षणमपि किञ्चिदस्त्येव । तच्च बाह्या-
विरोधे ज्ञानानित्यतायां तन्निष्ठमुभयनिष्ठं वा, बाह्यविरोधे ज्ञान-
निष्ठमेव । तन्नित्यतायां तु ग्राह्यनिष्ठमेवेति ।
तथाहि, लक्ष्यस्तावदत्र विषयविषयिभावः । स च प्रका-
इसलिये अनुभवबलसे यह अनिवार्य है कि ज्ञानभिन्न भी भासित
होता है । अर्थात् कोई अनुभव "इदं नीलम्" ऐसा होता है और कोई
अनुभव तो "इमे नीलपीते परस्परं भिन्ने" ऐसा होता है । इस प्रकारकी
विभिन्न अनुभवकी व्यवस्था केवल विज्ञानवादसे नहीं हो सकती है ।
अतः ज्ञानसे भिन्न विषयका भी भान मानना आवश्यक है ।
एव बाह्यार्थकी ग्राह्यता सिद्ध होनेपर उसका नियामक भी कुछ
(विषयविषयिभाव सम्बन्ध ) होगा ही । और वह नियामक बाह्यवस्तु
की पारमार्थिकताकी दशामे तथा ज्ञानकी अनित्यतापक्षमे ज्ञाननिष्ठ
अथवा ज्ञान-अर्थ उभयनिष्ठ होगा । बाह्यार्थके निषेधकी दशामे योगा-
चारमतानुसार ज्ञाननिष्ठ ही होगा तथा वेदान्तमतानुसार ज्ञाननित्यत्व-
पक्षमे तो बाह्यवस्तुनिष्ठ ही होगा । क्योंकि उस नियामकके आविद्यक
होनेसे वह परमार्थभूत ज्ञानात्मक ब्रह्ममें स्थित नहीं हो सकता । साथ
ही ज्ञानके नित्य होनेके कारण सदैव “अहं घटं जानामि” ऐसा
अनुव्यवसाय होने लगेगा ।
इस न्यायमे विषयविषयिभाव ही वह नियामक है । और वह एक
प्रकारका स्वभावविशेष है, जो सद्भूत प्रकाश (ज्ञान) में विषय-
सम्बन्धित्वमात्ररूप है । अभिप्राय यह हुआ कि ज्ञानके निराकार
होनेसे विषयके द्वारा ही ज्ञानका निरूपण सम्भव है । अतः विषयनिरूप-
णीयता ही ज्ञानगत तदीयता अर्थात् विषयसम्बन्धिता है, और वही
न्यायानुसार विषयविषयिभाव है, जो ज्ञाननिष्ठ माना गया है ।


तथा प्रतियोगियोंको मानते हुए भी शून्यता बताना यह बहुत बडा
आश्चर्य है । ज्ञानगत विषयसम्बन्धित्ताके स्वाभाविक होनेके कारण ही
उसके लिये भी स्वभाव ही नियामक है, किसी अन्यकारणकी अपेक्षा
नहीं है ।