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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 260, कुल 530 में से

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पृष्ठ 260

बाह्यार्थभङ्गवादः २११
स च परो यदि संवृतिरेव, विश्वशून्यतयोर्न कश्चिद् विशेषः,
कथं तदप्यवशिष्येत ? असंवृतिरूपश्चेत् परः, परत एव तस्य
सिद्धावनवस्था । स्वयमसिद्धश्चेत्, कथं शून्यत्वमपि साधयेत् ?
स्वतः सिद्धश्चेत्, आयातोऽसि मार्गेण१ ।
तथाहि—स्वतः सिद्धतया तदनुभवरूपम् । शून्यत्वादेव
च न तस्य कालावच्छेद इति नित्यम् । अत एव च न
देशावच्छेद इति व्यापकम् । अत एव तन्निर्धर्मकमिति
विचारास्पृष्टम्, तस्य२ धर्मधर्मिभावमुपादाय प्रवृत्तेः । अत
कल्पनामात्र हो तो विश्व और शून्यतामें कोई विशेषता नहीं रही ।
ऐसी स्थितिमें शून्यता भी कैसे बच पायेगी ?
यदि प्रमाणभूत वह पर असंवृतिरूप अर्थात् तात्त्विक हो तो उस
प्रमाणकी सिद्धि किसी अन्य प्रमाणसे माननेपर उसकी भी किसी अन्यसे
और उसकी भी किसी अन्यसे सिद्धि होगी, इस प्रकार अनवस्थादोष
हो जायगा । यदि वह शून्यताका साधक प्रमाण स्वयं ही असिद्ध हो तो
वह शून्यताको भी कैसे सिद्ध कर सकेगा ? यदि उस प्रमाणकी
सिद्धिको अनवस्थाभयसे परतः न मानकर स्वतः मानो तो अब तुम
रास्ते पर आगये । अर्थात् इस पद्धतिसे वेदान्तका स्वयप्रकाश ब्रह्मा-
द्वैत पक्ष ही निर्दोष है ।
कारण, स्वतःसिद्ध (स्वप्रकाश) होनेसे वह (ब्रह्म) ज्ञानस्वरूप
है । सम्पूर्ण प्रपञ्चके शून्यरूप होनेके कारण काल और कालोपाधियोंके
भी असत् होनेसे वह कालविशेषसे अवच्छिन्न (सीमित) नहीं है, इसी-
लिये वह नित्य है। और प्रपञ्चशून्यताके कारण ही देशकृत परिच्छेद
भी नहीं हो सकता है, इसीलिये वह व्यापक है । शून्यताके कारण ही
वह निर्धर्मक (धर्मशून्य) होनेसे विचारका भी विषय नहीं है ।
क्योंकि जहाँ धर्मधर्मिभाव होता है, वहीं विचारकी प्रवृत्ति होती है ।
निर्धमक होनेके कारण ही वैधर्म्यरूप विशेषका अभाव होनेसे कहीं
१ वेदान्तनयेन इत्यर्थः ।
२ तस्य = विचारस्य ।