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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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पृष्ठ 265

२१६ आत्मतत्त्वविवेके
रण्यं केन वार्यम् १ । तेन तदेव क्रियते, अनेनाप्येतदेव विषयी-
क्रियत इति विवेचनीयम् ।
विषयीक्रियत इति कोऽर्थः ? क्रियत इत्यपि कोऽर्थः ?
इति विचारणीयम् । कार्योत्पादनमेव करणम्, तदीयतोत्प-
त्तिरेव विषयीकरणमिति विवेचनीयम् । उपकारस्तु यथाऽत्र
विज्ञानस्वरूपातिरिक्तो नास्ति, तथाऽत्रापि कार्यस्वरूपाति-
रिक्तो नास्तीति प्रतिसन्धेयमिति ।
अतएव कार्यकारणभावोऽप्युपेक्षितव्य इति तु महत् साह-
अन्य नियामक मानना पड़ेगा । इस प्रकारकी परम्परामे अनवस्थादोष
आ जायगा । एवं यदि स्वभाविक शक्ति भी न मानो तो और कोई
नियामक भी न मानो तो अन्य कारणोंसे अन्यकार्योंकी उत्पत्ति कैसे
रोकी जा सकती है ?
यदि कहो कि—उस कारणद्वारा वही कार्य किया जाता है, अत
साधारण्यदोष नहीं आ सकता—तो इस ज्ञानद्वारा भी यही अपना विषय
बनाया जाता है, यह भी समझना चाहिये । अर्थात् ज्ञानविशेषके द्वारा
विषयविशेषका ही विषयीकरण होता है, अत एकविषयके ज्ञानमें
विषयान्तरसम्बन्धिताका प्रसङ्ग नहीं आ सकता । यदि पूछो कि—
विषयीकरणका क्या अर्थ है ? तो करणका भी क्या अर्थ है ? यह
विचारणीय है । यदि कहो कि—कार्यका उत्पादन ही करण है—तो
ज्ञानमे तदीयताकी उत्पत्ति ही विषयीकरण, यह समझना चाहिये ।
साथ ही विषयकृत ज्ञानगतविषयितारूप उपकार भी जैसे यहाँपर ज्ञान-
स्वरूपसे अतिरिक्त वस्तु नहीं है, वैसे वहाँ भी कारणकृत कार्यगत करण
रूप (उत्पादनरूप) उपकार भी कार्यस्वरूपसे अतिरिक्त वस्तु नहीं है,
यह ध्यान देने की चीज है ।
इसीलिये विषयविषयिभावके समान कार्यकारणभाव भी उपेक्षणीय
है—यह कथन भी बहुत बड़ा साहस है । अर्थात् "नियतकार्यके उत्पादन
१ वार्येत इति ३ पु० पा० ।