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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 530 में से

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पृष्ठ 264

शस्य सतस्तदीयतामात्ररूपः स्वभावविशेषः । स्वभावत्वादेव
च नोपकारान्तरमपेक्षते, तन्मात्रीयत्वादेव च नान्यदीयः ।
किमस्य फलमिति प्रश्नप्रसङ्गेऽपि बहिस्तद्गोचरव्यवहार-
प्रवृत्तिरान्तरमपि तेन ज्ञाननिरूपणम् । कुतोऽयमीदृगित्त्यनु-
योगेऽपि सामग्रीशक्तिरेवोत्तरं कार्यकारणवत् । अन्यथा
तत्राप्युपकारान्तरापेक्षायामनवस्था, तदनपेक्षायां (वा) साधा-
एवं तज्ज्ञानमे तन्मात्रका सम्बन्ध होनेसे ही उस ज्ञानमे विषया-
न्तरके सम्बन्धका आपादन भी नहीं किया जा सकता है । अर्थात्
“प्रकाशस्य सत तदीयतामात्ररूप स्वभावविशेषो विषयविषयिभाव”
इस निर्वचनमे प्रकाश ( ज्ञान ) को सत् कहनेसे उसकी शून्यताका
निराकरण होकर भावरूपता सिद्ध होती है । तदीयतापदसे छप्रत्यय-
द्वारा घटज्ञान पटज्ञान यहाँपर ज्ञानमे घटपटादिका विषयितारूप सम्बन्ध
सूचित होता है । तदीयतामात्र यहाँ मात्रपदसे घटज्ञानमे पटविषयिता
तथा पटज्ञानमें घटविषयिताके प्रसङ्गका निवारण होता है । एवं “स्वभा-
वविशेषः” यहाँ स्वभावपदसे सूचित होता है कि ज्ञानगत विषयकी
विषयिता किसी कारणके अधीन नहीं है किन्तु स्वाभाविक है । इसी
प्रकार विशेषपदसे “ज्ञानाभाव तथा ज्ञानसमवाय” यहाँ पर अभावके
साथ तथा समवायके साथ ज्ञानका स्वरूपसम्बन्ध होनेपर भी विषय-
विषयिभावका वारण किया जाता है ।
इस विषयविषयिभाव सम्बन्धका फल क्या है ? ऐसे प्रश्नके प्रसङ्गमें
भी यही उत्तर होगा कि बाहरमें उस विषयसे सम्बद्ध ग्रहण-परित्यागादि
व्यवहारोंमे प्रवृत्त कराना और देहके अन्दर उसके द्वारा ज्ञानका निरूपण
कराना । अर्थात् ज्ञानके निराकार होनेके कारण विषयके सम्बन्धसे ही
उसके स्वरूपका निरूपण संभव है ।
ज्ञानका नियतविषयसम्बन्धितारूप यह स्वभाव भी कैसे होता
है ? ऐसा प्रश्न होनेपर भी सामग्रीकी स्वाभाविक शक्ति ही उत्तर होगा ।
जैसे कि कार्यकारणभावस्थलमें होता है । अन्यथा नियत कार्य पैदा
करनेमें कारणगत स्वाभाविक शक्ति न मानकर किसी अन्य नियामककी
अपेक्षा करनेपर उसका भी कोई अन्य नियामक तथा उसका भी कोई