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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

खैर वह मेरी नासमझी का जमाना था।¹ उस समय के युग को हम
धारणाओं का युग भी कह सकते हैं। हिन्दुओं में एक बात बैठ गयी थी
कि मुसलमान इस देश से प्रेम नही करते। शायद ऐसी ही धारणा
मुसलमानों के दिमाग में भी थी कि हिन्दू उन्हें इस देश का स्थाई
निवासी नही समझते हैं। निश्चित यह धारणा एक नागरिक के लिए
सोचने पर मजबूर करती है कि इतने दिनों तक साथ रहने के बाद भी
हमारी धारणाएं इतनी संकीर्ण क्यों बनी हैं? अशफाक ने स्पष्ट रूप से
स्वीकार किया है कि विचारों की परिपक्वता के पूर्व वह भी हिन्दुओं के
विरुद्ध थे। कारण हिन्दू मानसिकता ही थी, वह भी एक हिन्दू अध्यापक
की संकीर्ण मनोवृत्ति। अशफाक जब स्कूल के छात्र थे तो एक हिन्दू
अध्यापक की संकीर्ण एवं भेदभाव परक मनोवृत्ति के कारण दुखी थे।
अशफाक ने बाकायदा इसका जिक्र किया है - "चूँकि हमारे करम फरमा
एक मास्टर साहब थे। जिनका अगर मैं नाम लिखूँगा तो उन्हें मुफ्त में
शर्मिन्दगी हासिल होगी, और वह मेरे मास्टर थे। जब मैं गवर्नमेन्ट स्कूल
में पढ़ता था, वह हमेशा हिन्दू-मुस्लिम में बहुत इम्तियाज करते थे। जो मैं
अब कहूँगा कि उस्ताद का कमीनापन है और यही लोग मुल्क के असल
दुश्मन हैं। मगर आज मेरा दिल ऐसा ही कुशादा एक हिन्दू के लिए भी है
जैसा एक मुसलमान के लिए । खैर उस वक्त के लीडर अब भी इत्तिहादे
इस्लामी पर आमिल हैं। गो कि एक हद तक मैं भी उनसे इत्तिफाक करता
हूँ कि भाई समझने में कोई नुकसान नहीं है। मदद करना हमारा फर्ज है,
क्योंकि हम फैयाज मुल्क के फैयाज वाशिन्दे हैं। मगर किसी की हुकूमत
अपने ऊपर कुबूल करना हमारी पस्त हिम्मती और बद-किस्मती है। यह
किसी तरह हमारे शयानेशान नहीं।


  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-26
    73

दुनिया में इन्कलाब का तगट्युरात कितनी तेजी से हुआ करते हैं।
कल मैं क्या था और आज मैं क्या हूँ। कल मैं तुर्की की हुकूमत अपने
ऊपर बायसेसद नाजो इफितखार और जरिए बख्शिश समझता था और
आज बदतरीन जिल्लत। आज मैं हर विदेशी हुकूमत को बुरा समझता
हूँ।'' अशफाक को अपने हिन्दू अध्यापक से शिकायत थी और संकीर्ण
विचारों से उन्हें दुख था। यही भावना उन्हें देश प्रेम की ओर ले जाती
है। भेदभाव की प्रदूषित मानसिकता को वे शत्रु समझते हैं। यही कारण
भी था हम गुलाम हुए। भेद-भाव हमारी विकास यात्रा का अवरोधक है,
यह अशफाक उल्ला जानते थे। शायद यही कारण था कि एक कट्टर
मुस्लिम परिवार के होते हुए भी अशफाक की मानसिक संरचना सामाजिक
हो सकी। सामाजिक विचारों के अंकुर फूटने लगे थे। साम्प्रदायिक एकता
के तो वे उदाहरण मात्र थे। आगे चलकर अशफाक की समझ में बढ़ोत्तरी
हुई तो पता चला कि अध्यापक ही राष्ट्र का निर्माता है। वह एक ऐसे
दिमाग में उपकरण सजाता है जहाँ रिक्त है सब कुछ और जब वही
संकीर्ण मानसिकता की बीमारी से राष्ट्र या पीढ़ी का निर्माता ग्रसित रहेगा
तो समाज का भविष्य कैसा होगा। जबकि अध्यापक को बिना किसी
भेदभाव के राष्ट्र की एकता के लिए मस्तिष्क तैयार करना चाहिए ताकि
एक सुसभ्य, सुसंस्कृत समाज बनाया जा सके। अशफाक की दृष्टि में
अध्यापक ही ऐसा प्राणी है जो सामाजिक बुराइयों को दूर कर सकता है।
यह ज्ञातव्य है कि अशफाक को युद्ध विषयक पुस्तकें पढ़ने का
बचपन से ही शौक था। आगे चलकर वे बंगाल के क्रांतिकारियों के विषय
में भी बाकायदा सुन रखे थे। वे समाचारों से अवगत होते रहते। यह भी
ज्ञातव्य है कि बंगाली क्रांतिकारी ही उ०प्र० की क्रांतिकारी गतिविधियों में
महत्वपूर्ण योगदान निभा रहे थे। अशफाक कन्हाई दत्त और खुदीराम
बोस के कार्यों से बहुत ज्यादा प्रभावित थे।

74

इन दोनों क्रांतिकारियों का पूरा असर अशफाक पर था। वे इन
क्रांतिकारियों की कहानियाँ सुनते। यही नहीं वे बंगाली बमों का भी हाल
सुनते रहते। अशफाक के हृदय में जिज्ञासा जागती कि कितना अच्छा
होता कि मैं भी ऐसा होता। उन्हें क्या पता कि वे भी उनकी तरह फाँसी
घर में कैद रहेंगे। एक दिन का समाचार है कि अशफाक स्कूल जा रहे थे
कि अचानक उन्होंने सुना कि दिल्ली में वायसराय बहादुर पर किसी ने
बम मार दिया और स्कूल बन्द हो गया। अब क्या था अशफाक की खुशी
का ठिकाना न रहा। वे बाजारों में होने वाली चर्चाएं सुनते रहते और
प्रभावित होते, प्रेरणा पाते, स्वप्न देखते कि मैं भी ऐसा काम करूँगा कि
लोग मेरे नाम की चर्चा आम बाजारों में करें। अशफाक के दिल में दबा
हुआ देशभक्ति का बीज अंकुरित होने लगा। वे देश में होने वाली
घटनाओं से परिचित होने लगे थे।
1918 में मैनपुरी षड्यंत्र की घटना जब प्रकाश में आई तो अशफाक
भला बिना सूचित हुए कैसे रह सकते थे। यही घटना अशफाक के
क्रांतिकारी अंकुरण को पल्लवित करने में सहायक बनी। मैनपुरी घटना ने
उर्वरक का काम किया। इस षड्यंत्र का भेद खुल जाने के बाद अशफाक
के स्कूल की तलाशी ली गयी, पहचान हुई और एक छात्र राजाराम
गिरफ्तार हुए। संदेह के आधार पर कुछ और छात्र पकड़े गये। बंगाल के
विद्यार्थी क्रांतिकारी संगठनों के सदस्य थे और खूब भाग लिया करते थे
लेकिन उत्तर प्रदेश के लिए यह घटना नई थी। जिस दिन स्कूल में
पुलिस पहुँची उस दिन अशफाक स्कूल देर से पहुँचे। वहाँ दहशत का
माहौल था। हर तरफ पगड़ियाँ ही नजर आ रही थी। कोई लड़का अन्दर
से बाहर नहीं निकल सकता था। हर कक्षा में पहचान हो रही थी। कोई
ऐसा छात्र नहीं था जो अपनी जान की खैर न मनाता हो। पहचान करने
वाले सरकारी गवाह पुलिस साथ लेकर आई थी।
75

अशफाक अपने स्वभाव के कारण हालात पर नजर रखे हुए थे और
मामले को गहराई से जानने समझने के लिए बेचैन थे। अशफाक
खिलाड़ी थे (हाकी) और लगभग खिलाड़ियों को सभी पहचानते भी है
और खेलने वाले छात्र भी अपने अध्यापकों से बोल-बतिया लेते हैं।
अशफाक ने अपने एक अध्यापक से पूछा लेकिन वे डर के कारण कुछ
बता न सके। फिर एक स्कूली छात्र-मित्र ने अशफाक को सारा विवरण
सुनाया। वह छात्र भी देश भक्त था और भारत की बलिवेदी पर
मरने-मिटने को तैयार था। अशफाक को एक बार फिर स्वतंत्रता हेतु संघर्ष
करने की औषधि मिल गयी।
निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि मैनपुरी षड्यंत्र की
घटना ने अशफाक उल्ला खाँ को मातृभूमि का पुजारी बना दिया।
मैनपुरी षड्यंत्र से संबंधित घटना के बाद की कार्यवाहियों में से एक-दो के
वे प्रत्यक्ष दर्शक भी थे। सो ऊर्जा मिलती ही थी। अब अशफाक
क्रांतिकारी देशभक्तों को अपना आदर्श मानने लगे। अभी वे आठवीं कक्षा
के ही विद्यार्थी थे। आठवीं कक्षा की अंग्रेजी पुस्तक में सर वाल्टर स्काट
की लिखी एक कविता 'लव ऑफ कंट्री' और एक अन्य पाठ 'वीर
होरेशस' के विषय में था। अशफाक ने इन दोनों पाठों को कई बार पढ़ा।
उनकी भावनाएँ दृढ़ होती गयीं। सर वाल्टर स्काट की कविता से तो वे
इतने प्रभावित हुए कि मानो उनके तन-बदन में आग लग गई हो।
अशफाक ने लिखा है-"मेरे मास्टर साहब ने कुछ ऐसी तर्ज में इस सबक
को पढ़ाया कि तन-बदन में आग लग गई। कविता इस प्रकार थी -
" To every man upon the earth
Death cometh soon or late
Then how can a man die or better death,
Then faceing fearful odds
76

For the ashes of his father
And the temples of his Gods."¹
अशफाक की भावुकता की हद इस प्रकार थी कि इस कविता को
पढ़कर वे रो पड़े। अशफाक की भावना को अध्यापक ने भी देखा। उनके
मनोभावों को अच्छी तरह समझते हुए अशफाक को श्छंतपवने र्वा जीमूतसकश
नामक पुस्तक पढ़ने को दी। इस पुस्तक का अशफाक पर गहरा असर
हुआ। बेचैन अशफाक क्रांतिकारियों से मिलने के लिये प्रयत्नशील हो
गये। उसी समय उनका सम्पर्क बनारसी लाल से हो गया। अशफाक को
क्या पता था कि बनारसी लाल पुलिस का मुखबिर है। उसके मुखबिर
होने की बात तो बाद में उन्हें मालुम हुई। राजाराम बनारसी लाल के घर
में ही रहता था। अशफाक की क्रांतिकारी आन्दोलन में गहरी रुचि देखकर
उसने राम प्रसाद बिस्मिल की चर्चा की। भ्रम में पड़े अशफाक बनारसी
को सच्चा देशभक्त और मैनपुरी षड़यंत्र का क्रांतिकारी समझने लगे थे।
बनारसी लाल अभी और मानसिक अधिकार अशफाक पर करना चाहता
था, विश्वास पात्र होने की गरज से उसने 'आनन्दमठ' नामक पुस्तक
अशफाक को पढ़कर सुनाई।²
अशफाक अभी तक हिन्दी नहीं जानते थे। अब अशफाक को यह
लगने लगा था कि अब उनकी सारी समस्याएँ हल हो जायेंगी और वे
क्रांतिकारियों की जमात में सम्मिलित हो जायेंगे, उन्हें बनारसी लाल पर
पूरा विश्वास था। देखने में बनारसी हमेशा कुछ परेशान सा रहता था।
अशफाक ने समझा कि शायद साथियों के बिछुड़ जाने के कारण मन
बैचेन हो बनारसी का।
1920 में प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति पर सभी राजनीतिक बंदियों को
क्षमा कर दिया गया, लगभग सभी कैदी रिहा कर दिये गये।

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवानसिंह राणा, पृष्ठ-35
  2. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-36
    77

अभियोग के दौरान राम प्रसाद बिस्मिल फरार थे। मैनपुरी षड्यंत्र
के कैदी मुकुन्दीलाल को क्षमा नही किया गया। उन्हें पूरी सजा काटनी
पड़ी, वे 1923 में जेल से रिहा हुए। क्षमा की घोषणा होने के बाद
बिस्मिल शाहजहाँपुर आ गये। यहाँ आने पर राम प्रसाद बिस्मिल ने
समाज के बदले हुए तेवर को देखा। उनके पास कोई खड़ा भी नहीं होता
था। कोई बात भी नही करता था, पुलिस की निगाह हर जगह गड़ी
रहती थी। राम प्रसाद बिस्मिल ने लिखा है -
‘‘राजकीय घोषणा के पश्चात् जब मैं शाहजहाँपुर आया तो शहर की
अद्भुत दशा देखी। कोई पास तक खड़े होने का साहस न करता था।
जिसके पास मैं जाकर खड़ा हो जाता था, वह नमस्ते कर चल देता था।
पुलिस वालों का बड़ा प्रकोप था। प्रत्येक समय छाया की भाँति पीछे-पीछे
छिपा करती थी। इस प्रकार का जीवन कब तक व्यतीत किया जावें।’’¹
राम प्रसाद बिस्मिल को निराशा तब हुई जब ‘‘मातृवेदी’’ संगठन
बिखर गया। यह संगठन स्थानीय क्रांतिकारियों का प्राण था। इसी समय
वे साथी क्रांतिकारियों से कटु अनुभव भी प्राप्त किये। अब बिस्मिल स्वतंत्र
रूप से रेशमी कपड़ा बुनने का उद्योग चलाने लगे। अशफाक को यह पता
चला कि शाहजहाँपुर के एक क्रांतिकारी राम प्रसाद वर्मा के नाम का भी
गिरफ्तारी का वारन्ट है। राम प्रसाद बिस्मिल के प्रशंसक अशफाक की
खुशी का ठिकाना न रहा। बिस्मिल के शाहजहाँपुर आने पर अशफाक
उनसे मिलने का यत्न करने लगे और वह दिन आया-एक दिन अशफाक
राम प्रसाद बिस्मिल से मिले किन्तु यह क्या! स्कूल का एक सामान्य
मुसलमान विद्यार्थी समझकर बिस्मिल ने कोई उत्साहजनक या प्रेरणादायक
बात नहीं की।

  1. राम प्रसाद बिस्मिल रचनावली, सम्पादक दिनेश शर्मा, पृष्ठ-73
    78

वह तो अशफाक को एक सामान्य विद्यार्थी ही समझ रहे थे। उनके
उत्साह का उन्हें ज्ञान नहीं। बिना संज्ञान में लिए क्रांतिकारी बात करना
उचित भी नहीं था। इससे अशफाक निराश हुए, उन्हें दुख हुआ। परन्तु
अशफाक का उत्साह मरा नहीं था। बनारसी लाल अभी भी अशफाक के
सम्पर्क में थे। अशफाक ने बनारसी लाल से अनुरोध किया कि वह राम
प्रसाद से मिला दे। अशफाक के बड़े भाई और बिस्मिल साथ-साथ पढ़े भी
थे। भाई के सहपाठी होने के कारण बनारसी लाल ने राम प्रसाद बिस्मिल
से अशफाक को अच्छी तरह से परिचित करा दिया। अशफाक उल्ला खाँ
स्वयं लिखते हैं - "फिर मैंने बनारसी लाल से कहा कि राम प्रसाद के
पास चलो और मुझको उनसे इण्ट्रोड्यूस करा दो। क्योकि राम प्रसाद मेरे
बड़े भाई के क्लासफेलो उर्दू स्कूल में रह चुके थे और आपस में दोस्त भी
थे। मेरे भी स्कूलफेलो रह चुके थे मगर मेरे ताल्लुकात कम थे। चूँकि
राम प्रसाद शुरू से ही खासी शख्सियत रखने वाले इन्सान थे और
कसरती व होशियार तलिबेइल्म समझे जाते थे, आम तौर पर मशहूर भी
थे। मैंने ख्याल किया कि राम प्रसाद से मिलो शायद वहाँ दवा मिल
जाय और कोई तस्कीन कल्ब की सूरत निकल आये। गरज यह कि एक
दिन खन्नौत के किनारे जलसा हुआ। राम प्रसाद ने उसमें एक मुख्तसर
सा लेक्चर दिया और शुरू में यह शेर पढ़ा -
बहे बहरे फना में जल्द या रब लाश बिस्मिल की,
कि भूखी मछलियाँ है जौहरे शमशीरे कातिल की।¹
जो मुझे अब भी याद है इसे मैंने कण्डेम्ड सेल में मुलाकात के वक्त
पढ़ा था। मैंने भी कुछ कहा था। गरज कि बनारसी ने हम दोनों का
इन्ट्रोडक्शन करा दिया। गो कि इससे कब्ल भी एक दिन मैं राम प्रसाद से
मिला था।

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-38
    79

मगर वह इतनी सर्दमेहरी से मिले थे कि मुझे बहुत दुख हुआ था।
जिसकी वह माफी अक्सर माँग लिया करते थे।'' चाहे जो हो अशफाक
का प्रयास रंग लाया और वे राम प्रसाद बिस्मिल के सम्पर्क में अच्छी
तरह आ गये।
ऐसी परिस्थितियों में किसी को भी निराशा हो सकती है। जब वह
उत्तेजना और ओज से भरा हो और मन मुताबिक बात न बने। हर
उत्साही अपने अनुसार उत्तर चाहता है। वह अपना मन ऊँचा उठाना
चाहता है। यदि देखा जाय तो राम प्रसाद बिस्मिल ने ठीक ही किया कि
वे निराशा जनक उत्तर दिये। विचारणीय यह है कि, भला वह कैसे एक
ऐसे विद्यार्थी से जो सर्वथा अपरिचित और मैनपुरी षड्यंत्र के विषय में पूछ
रहा है, राम प्रसाद निराश न करते तो क्या करते, जबकि पुलिस हाथ
धोकर पीछे पड़ी है। यह भी संदेह था कि कोई भी व्यक्ति पुलिस का
मुखबिर हो सकता है। लेकिन बाद की स्थिति पर विचार करें तो स्पष्ट
दिख जायेगा कि राम प्रसाद ने ठोंक-बजाकर इस बात का विश्वास कर
लिया कि यह अशफाक सच्चा देश भक्त है, तब उन्होंने अशफाक को
अपना अभिन्नमित्र बना लिया। अब तो दोस्ती एक प्राण हो गयी। एक
हिन्दू एक मुसलमान जिसकी मिसाल दी जाने लगी।
राम प्रसाद बिस्मिल कट्टर आर्य समाजी थे और अशफाक कट्टर
मुस्लिम परिवार के, लेकिन धार्मिकता का लबादा कही रुकावट नही बना
क्योंकि दोनों सच्चे देशभक्त थे। दो दोस्तों के बीच कभी भेद भाव की
दूषित भावना नही रही। दोनो का उद्देश्य भी था कि सामाजिक बुराइयों
को दूर किया जाय और इस प्रकार के भेदभाव को समाप्त किया जाय
और दोनों ने मुकाबला भी किया।
राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ''मुझे भली
भाँति याद है जब मैं बादशाही एलान के बाद शाहजहाँपुर आया था, तो
तुमसे स्कूल में भेट हुई थी। तुम्हारी मुझसे मिलने की बड़ी हार्दिक इच्छा
थी।
80

तुमने मुझसे मैनपुरी काण्ड के सम्बन्ध में कुछ बातचीत करनी चाही
थी। मैंने वह समझकर कि एक स्कूल का मुसलमान विद्यार्थी मुझसे इस
तरह की बातचीत क्यों करता है, तुम्हारी बातों का उत्तर उपेक्षा की दृष्टि
से दिया था। तुम्हें उस समय बड़ा खेद हुआ था। तुम्हारे मुख से हार्दिक
भावों का प्रकाश हो रहा था। तुमने अपने इरादे को यों ही नहीं छोड़
दिया, अपने निश्चय पर डटे रहे। जिस प्रकार हो सका काँग्रेस में
बातचीत की। अपने इष्ट मित्रों द्वारा इस बात का विश्वास दिलाने की
कोशिश की कि तुम बनावटी आदमी नहीं, तुम्हारे दिल में मुल्क की
खिदमतकरने की ख्वाहिश थी। अन्त में तुम्हारी विजय हुई। तुम्हारी
कोशिशों ने मेरे दिल में जगह पैदा कर ली। तुम्हारे बड़े भाई मेरे उर्दू
मिडिल के सहपाठी तथा मित्र थे। यह जानकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई।
थोड़े दिनों में ही तुम मेरे छोटे भाई के समान हो गये थे, किन्तु छोटे
भाई बनकर तुम्हें संतोष न हुआ। तुम समानता के अधिकार चाहते थे,
मित्र की श्रेणी में अपनी गणना चाहते थे, वही हुआ। तुम सच्चे मित्र बन
गये। सबको आश्चर्य था कि एक कट्टर आर्य समाजी और मुसलमान का
मेल कैसा? मैं मुसलमानों की शुद्धि करता था। आर्य समाज मंदिर में
मेरा निवास था, किन्तु तुम इन बातों की किंचित मात्र चिन्ता न करते
थे। मेरे कुछ साथी तुम्हारे मुसलमान होने के कारण कुछ घृणा की दृष्टि
से देखते थे, किन्तु तुम अपने निश्चय में दृढ़ थे। मेरे साथ आर्य समाज
मंदिर में आते जाते थे। हिन्दू-मुस्लिम झगड़ा होने पर तुम्हारे मुहल्ले के
सब कोई तुम्हे खुल्लम खुल्ला गालियाँ देते थे, काफिर के नाम से पुकारते
थे, पर तुम कभी भी उनके विचारों से सहमत न हुए। सदैव हिन्दू-मुस्लिम
ऐक्य के पक्षपाती रहे। तुम एक सच्चे मुसलमान तथा सच्चे स्वदेश भक्त
थे। तुम्हें यदि जीवन में कोई विचार था, तो यही कि मुसलमानों को
खुदा अक्ल देता, कि वे हिन्दुओं के साथ मिल करके हिन्दुस्तान की
भलाई करते। जब मैं हिन्दी में कोई लेख या पुस्तक लिखता तो तुम
सदैव यही अनुरोध करते कि उर्दू में क्यों नहीं लिखते, जो मुसलमान भी
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पढ़ सके? तुमने स्वदेश-भक्ति के भावों को भलीभांति समझने के लिए
हिन्दी का अच्छा अध्ययन किया। अपने घर पर जब माता जी तथा भ्राता
जी से बातचीत करते थे, तो तुम्हारे मुँह से हिन्दी शब्द निकल जाते थे,
जिससे सबको बड़ा आश्चर्य होता था।"
राम प्रसाद बिस्मिल अशफाक के बारे में आगे लिखते हैं -
"तुम्हारी इस प्रकार की प्रवृत्ति देखकर बहुतो को संदेह होता था, कि
कही इस्लाम धर्म त्यागकर शुद्धि न करा लो। पर तुम्हारा हृदय तो किसी
प्रकार अशुद्ध न था, फिर तुम शुद्धि किस वस्तु का कराते? तुम्हारी इस
प्रकार की प्रगति ने मेरे हृदय पर पूर्ण विजय पा ली। बहुधा मित्र मण्डली
में बात छिड़ती कि कहीं मुसलमान पर विश्वास करके धोखा न खाना।
तुम्हारी जीत हुई, मुझमें तुममें कोई भेद न था। बहुधा मैंने तुमने एक
थाली में भोजन किए। मेरे हृदय से यह विचार ही जाता रहा कि
हिन्दू-मुसलमान में कोई भेद है। तुम मुझ पर अटल विश्वास तथ अगाध
प्रीति रखते थे। हाँ तुम मेरा नाम लेकर नही पुकार सकते थे। तुम मुझे
सदैव 'राम' कहा करते थे। एक समय जब तुम्हें हृदय कम्प का दौरा हुआ
था, तुम अचेत थे, तुम्हारे मुँह से बराबर 'राम' 'हाय राम' शब्द निकल
रहे थे। पास खड़े हुए भाई बांधवों को आश्चर्य हुआ कि 'राम' 'राम'
कहता है। कहते कि 'अल्लाह' 'अल्लाह' कहो, पर तुम्हारी 'राम-राम' की
रट थी। उसी समय किसी मित्र का आगमन हुआ, जो राम के भेद को
जानते थे। तुरन्त मैं बुलाया गया। मुझसे मिलने पर तुम्हें शान्ति हुई।
तब सब लोग 'राम! राम!' के भेद को समझे।
अन्त में इस प्रेम, प्रीति तथ्य मित्रता का परिणाम क्या हुआ? मेरे
विचारों के रंग में तुम भी रंग गये। तुम भी एक कट्टर क्रांतिकारी बन
गये। अब तो तुम्हारा दिन रात प्रयत्न यही था कि, कि किस प्रकार हो
मुसलमान नवयुवकों में भी क्रांतिकारी भावों का प्रवेश हो। वे भी
क्रांतिकारी आन्दोलन में सहयोग दें। जितने तुम्हारे बन्धु तथा मित्र थे सब
पर तुमने अपने विचारों का प्रभाव डालने का प्रयत्न किया। बहुधा
क्रांतिकारी सदस्यों को भी बड़ा आश्चर्य होता कि मैंने कैसे एक मुसलमान
82 459860
459860

को क्रांतिकारी दल का प्रतिष्ठित सदस्य बना लिया। मेरे साथ तुमने जो
कार्य किये वे सराहनीय हैं। तुमने कभी भी मेरी आज्ञा की अवहेलना
नहीं की। एक आज्ञाकारी भक्त के समान मेरी आज्ञा पालन में तत्पर
रहते थे। तुम्हारा हृदय बड़ा विशाल था। तुम्हारे भाव ऊँचे थे। मुझे शान्ति
है तो यही कि तुमने संसार में मेरा मुख उज्जवल कर दिया। भारत के
इतिहास में यह घटना भी उल्लेखनीय हो गयी कि अशफाक उल्ला ने
क्रांतिकारी आन्दोलन में योगदान दिया। अपने भाई बन्धु तथा संबंधियों
के समझाने पर कुछ भी ध्यान न दिया। गिरफ्तार हो जाने पर भी अपने
विचारों में दृढ़ रहे। जैसे तुम शारीरिक बलशाली थे वैसे ही मानसिक वीर
तथा आत्मा से उच्च सिद्ध हुए। इन सबके परिणाम स्वरूप अदालत में
तुमको मेरा सहकारी (लेफ्टीनेन्ट) ठहराया गया और जज ने मुकदमें का
फैसला लिखते समय तुम्हारे गले में जयमाल (फाँसी की रस्सी) पहना
दी। प्यारे भाई, तुम्हें यह समझ कर संतोष होगा कि जिसने अपने
माता-पिता की धन-सम्पत्ति को देश सेवा में अर्पण करके उन्हें भिखारी
बना दिया, जिसने अपने सहोदर के भावी भाग्य को भी देश सेवा की भेंट
कर दिया, जिसने अपना तन-मन धन सर्वस्व मातृ सेवा में अर्पण करके
अपना अन्तिम बलिदान भी दे दिया, उसने अपने प्रिय सखा अशफाक को
भी उसी मातृभूमि की भेंट चढ़ा दिया।
'असगर' हरीम इश्क में हस्ती ही जुर्म है।
रखना कभी न पाँव यहाँ सर किये हुए।।''¹
राम प्रसाद बिस्मिल के उपरोक्त कथन से अशफाक के व्यक्तित्व को पूरी
तरह स्पष्टतः देखा जा सकता है। मुसलमानों में सबसे बड़ा दोष माना
जाता है जब कोई मुसलमान काफिर कहलाता है। काफिर धर्म से डिगने
वाला व्यक्ति होता है। अशफाक 'काफिर' शब्द सुनते हैं लेकिन यह शब्द

  1. राम प्रसाद बिस्मिल रचनावली, दिनेश शर्मा, पृष्ठ 101 से 103 तक
    83

उन्हें अपने कर्म से डिगा नही पाता। अशफाक प्रयास करते हैं कि
वे क्रांतिकारी बनें। राम प्रसाद बिस्मिल ने उनके प्रयास को स्वीकार ही
नहीं किया है, सराहा भी है। अशफाक को कितना सच्चा और शुद्ध
मनुष्य समझते थे राम प्रसाद बिस्मिल यह भी स्पष्ट हो जाता है। यह
भेदभाव से परे साम्प्रदायिक एकता ही नहीं वरन् एक मानवीय समाज की
संरचना की ओर संकेत भी हैं। अशफाक घृणा से घबराते नहीं है, शान्ति
के साथ मुस्कराते हुए उसका सामना करते हैं। भावनाओं की जीत होती
है। निश्चित ही अशफाक के भीतर एक सामाजिक विचारधारा प्रवाहित हो
रही थी, जो देश भक्ति की नदी में बह रही थी।
अशफाक कट्टर मुसलमान ही नहीं वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के भी
कट्टर समर्थक थे। भाषा का भेद भी नहीं था, अशफाक हिन्दी जानने
की कोशिश करते और बिस्मिल से उर्दू में लिखने को कहते। यह चीज
अशफाक को महान बनाती है। अशफाक राम प्रसाद बिस्मिल के सम्पर्क
में सच्चे देश भक्त तो बन ही गये, एक सुसंस्कृत, सुसभ्य, अच्छे इन्सान
भी बन गये। वे सिर्फ मनुष्य के लिए निर्मित हो गये।
1920 में जब क्षमादान दिया गया तो राम प्रसाद बिस्मिल का अन्य
क्रांतिकारियों से लगभग सम्बन्ध समाप्त हो गया और क्रांतिकारी
गतिविधियाँ भी प्रायः समाप्त हो गयी।
84

चौरी-चौरा की घटना पर महात्मा गाँधी ने अपना असहयोग
आन्दोलन वापस ले लिया, जिसके कारण युवा वर्ग बेचैन हो गया।¹ इसी
समय प्रसिद्ध क्रांतिकारी शचीन्द्र नाथ सन्याल ने एक क्रांतिकारी संगठन
बनाया। शचीन्द्रनाथ का मुख्य केन्द्र बनारस था। कुछ दिनों बाद
‘अनुशीलन समिति’ को भी मिला लिया गया। अब ‘हिन्दुस्तान
रिपब्लिकन एसोसिएशन’ या ‘हिन्दुस्तान गण- तांत्रिक संघ’ नामक
संगठन बना।² जिसका उद्देश्य था, क्रांति द्वारा राज्यों का एक गणतंत्रिक
संघ स्थापित करना। उद्देश्यों की पंक्ति में यह भी था कि संघ शोषण
रहित समाज की स्थापना करेगा। यह स्पष्ट होता है कि हिन्दुस्तान
गणतंत्रिक संगठन पर सोवियत संघ की क्रांति का प्रभाव था लेकिन
मन्मथनाथ गुप्त का मत था कि -‘‘यह सब बातें होते हुए भी यह नहीं
कहा जा सकता है कि इस विधान के बनाने वालों का आदर्श सोवियत
रूस या किसान मजदूर वर्ग का अधिनायकत्व था। इस षड्यंत्र के
सिलसिले में बहुत दिनों बाद जाकर अर्थात् जनवरी सन् 1925 में एक
क्रांतिकारी पर्चा बाँटा गया, जिसका नाम ‘The Revolutionary' था। उसमें यह
लिखा गया था कि हमारे सामने आधुनिक रूस का आदर्श है, किन्तु
लेखक ने इस वक्तव्य को बिना पूरी तरह समझे ऐसा लिखा था। जहाँ
उसमें यह बात थी कि रूस का आदर्श भी हमारे सम्मुख है, - वहाँ यह
बात भी थी कि प्राचीन ऋषियों मुनियों का आदर्श भी हमारे सम्मुख है।
इससे भी यही ज्ञात होता है कि प्राचीन ऋषियों का आदर्श उनके सम्मुख
था।

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ 41
  2. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ 42
    85

साथ ही यह भी ज्ञात होता है कि लेखक ने रूस के आदर्श को
अच्छी तरह नहीं समझा था। इस युग का कोई भी व्यक्ति इस आदर्श को
पूरी तरह नहीं समझ पाया था।''¹ चाहे जो हो यह तो स्पष्ट ही है कि
समाजवादी विचारधारा क्रांतिकारियों में प्रवाहित हो रही थी और अशफाक
इससे खूब प्रभावित थे, मन ही मन भेद भाव रहित समाज चाहते थे।
राम प्रसाद बिस्मिल तो जन्मजात क्रांतिकारी थे। कुछ दिनों के ठहराव के
बाद वे एक नये क्रांतिकारी संगठन में शामिल कर लिए गये। संगठन में
शामिल होने के लिए बिस्मिल 1923 में कानपुर पहुँचे थे और उनका
अनुभव काम आया।
राम प्रसाद बिस्मिल को हिन्दुस्तान गण तांत्रिक संगठन में पाकर
योगेश चन्द्र चटर्जी खुश हुए थे। शीघ ही बिस्मिल महत्वपूर्ण सदस्यों की
श्रेणी में आ गये। बिस्मिल को दल के लिए हथियार इकठ्ठा करने का
काम सौंपा गया। अब क्या था, जब राम प्रसाद स्वयं क्रांतिकारी दल के
मुख्य सदस्यों में आ गये तो अशफाक कैसे वंचित रह सकते हैं। अशफाक
भी संगठन के सदस्य बन गये। अशफाक के हृदय में देश भक्ति का जोश
तो था ही, मातृभूमि की भावना से भरे अशफाक कुछ कर दिखाना चाहते
थे। राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में अशफाक के विषय में
वृहद चर्चा की है, जिसका उल्लेख किया जा चुका है।
शचीन्द्र नाथ ने भी लिखा है -‘‘अशफाक उल्ला खाँ स्वयं अपने
प्रयत्नों से ही क्रांतिकारी दल के सदस्य बने थे।''² उनके इस कथन का
समर्थन बिस्मिल की आत्मकथा से नहीं होता। मन्मथनाथ गुप्त कहते हैं

  • ‘‘राम प्रसाद बिस्मिल ने जिन युवकों को शाहजहाँपुर में क्रांतिकारी दल
    की ओर प्रवृत्त किया था,
  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -42
  2. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -44
    86

अशफाक उल्ला उनमें प्रमुख थे, पर यह समझना गलत होगा जैसा
कि श्री शचीन्द्र नाथ जिन्हें उनके साथ हवालात में लम्बी अवधि तक रहने
का मौका मिला था, का कहना है कि अशफाक उल्ला स्वयं ही कोशिश
करके क्रांतिकारी दल में आये थे। उनका जन्म एक प्रसिद्ध पठान परिवार
में हुआ था उनके भाई भोपाल राज्य में किसी ऊंचे सरकारी पद पर थे।
असहयोग आन्दोलन के समय जो देश व्यापी लहर आयी थी, उसमें
अशफाक की पढ़ाई खत्म हो गयी और उनकी आत्मा कुछ करने के लिए
व्याकुल रहने लगी। उन्हीं दिनों राम प्रसाद फरारी से लौटकर आये थे
और अशफाक उल्ला ने किसी न किसी तरह उनसे परिचय प्राप्त किया
था।¹ चाहे जो हो अशफाक पूर्ण रूप से समर्पित क्रांतिकारी सदस्य बन
गये थे। अशफाक का क्रांतिकारी दल में सम्मिलित होना एक मुस्लिम
परिवार का होने के कारण एक नया अध्याय जोड़ता है।
अशफाक उल्ला खाँ ने निश्चित ही यह बता दिया कि वे एक ऐसा
समाज चाहते हैं जहाँ धनी-गरीब एक साथ रह सकें। शोषण रहित समाज
की उन्होंने कल्पना की थी। समाजवादी विचारधारा से पोषित अशफाक के
चिन्तन में स्वतंत्र भारत की एक तस्वीर थी। अवश्य ही अशफाक को
समझना भारत की संस्कृति और इतिहास की झलक पाना है। यही नहीं
हिन्दू-मुस्लिम या इसी प्रकार की अन्य प्रदूषित भावनाओं से दूर मानवी
हित की बात अशफाक ने की है। वे एकता के समर्थक थे। अपने विचारों
में उन्होंने एक स्थान पर लिखा भी है - ‘‘मैं हिन्दुस्तान की ऐसी
आजादी का ख्वाहिशमन्द हूँ, जिसमें गरीब खुश और आराम से रहते और
सब बराबर के होते।

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -44
    87

क्रांतिधर्मी अशफाक ने शहीद भगत सिंह से पहले कहा था कि अगर
हिन्दुस्तान आजाद हुआ और बजाए हमारे गोरे आकाओं के हमारे वतनी
भाई सल्तनत व हुकूमत की बागडोर अपने हाथ में लेते और तफरी को
तमीज, अमीर व गरीब, जमींदार व काश्तकार में रहें तो ऐ खुदा, मुझे
ऐसी आजादी उस वक्त तक न देना जब तक मेरी मखलूक में मसावात
(बराबरी) कायम न हो जाय।’’$^1$
अशफाक क्रांतिकारी जीवन में अपने मित्रों को भी आत्म बलिदान
की प्रेरणा देते थे। समर्पित जीवन के धनी अशफाक के लिए एक मात्र
लक्ष्य था मातृभूमि की स्वतंत्रता, और इसी लक्ष्य की प्राप्ति हेतु एक
महत्वपूर्ण घटना 'काकोरी काण्ड' नाम से घटी जो क्रांतिकारी इतिहास में
महत्वपूर्ण षड्यंत्रों में गिनी जाती है।

  1. जांबाज पत्रिका (लेख), राजेश कुमार मित्तल, पृष्ठ -59
    88

अध्याय-छः

अध्याय-छ:
काकोरी काण्ड
शचीन्द्रनाथ सन्याल का यह कथन सत्य है कि क्रांतिकारियों ने
राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए उत्प्रेरक तथा पूरक भूमिका
निभायी।¹ वे कांग्रेस द्वारा चलाये गये आन्दोलनों में बाधक भी नहीं
बने। विचारधारा भिन्न जरूर थी। क्रान्तिकारियों ने अपने शौर्यपूर्ण कार्यों
व बलिदानों से जनता में राष्ट्रीय चेतना और जुझारू संघर्ष की भावना
जागृत की।
अशफाक क्रांतिकारियों के गुप्त संगठन 'हिन्दुस्तान गणतांत्रिक संघ'
के सक्रिय सदस्य थे। यही एक ऐसा काण्ड था, जिससे अशफाक को दल
की पूर्ण समस्याओं और कार्यप्रणाली से परिचित होने का अवसर मिला।
स्पष्ट था कि क्रांतिकारी संगठनों के पास धन की समस्या थी। कमजोर
अर्थ पक्ष गतिविधियों को प्रभावित कर रहा था। हिन्दुस्तान गणतांत्रिक
संगठन को भी धनाभाव की विषम परिस्थितियों से गुजरना होता था।
आय का कोई अन्य रास्ता न था। यह भी कहा जा सकता है कि आय
के ठोस स्रोत न होने के कारण आर्थिक समस्याएं क्रांतिकारी संगठन की
असफलता का कारण थीं। राम प्रसाद बिस्मिल ने लिखा है कि - “.......
.........जब कार्य प्रारम्भ हो गया और असहयोग को टटोला गया तो वे
आन्दोलन से कहीं अधिक शिथिल हो चुके थे। उनकी आशाओं पर पूरी
तरह पानी फिर चुका था। अपने पास की पूंजी समाप्त हो चुकी थी। घर
में फाकें हो रहे थे। आगे की भी कोई विशेष आशा नहीं थी। कांग्रेस में
भी स्वराज्य दल पर जोर हो गया था। जिनके पास कुछ धन तथा इष्ट
मित्रों का संगठन था, वे कौंसिल तथा असेम्बली के सदस्य बन गये थे।

  1. स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहाँपुर का योगदान, पृष्ठ-106 - डॉ०एन०सी०
    मेहोत्रा
    89

ऐसी अवस्थाओं में यदि क्रांतिकारी संगठन-कर्ताओं के पास पर्याप्त
धन होता तो वे असहयोगियों को अपने हाथ में लेकर उनसे काम ले
सकते थे। कितना भी सच्चा काम करने वाला हो, किन्तु पेट तो सबका
है।'' स्पष्ट है कि संगठन को धन की आवश्यकता थी और कोई सार्थक
जरिया दिखाई भी नहीं दे रहा था। प्रसिद्ध क्रांतिकारी और संगठन के
प्रमुख राम प्रसाद इस हेतु मुख्य प्रबन्धक शाहजहांपुर हुए। वे संगठन के
महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। धन के अभाव में क्रांतिकारी किसी कार्य को
परिणाम तक पहुंचाने में असफल हो रहे थे। हथियार बढ़ाने, सदस्यों की
संख्या अधिक करने, पर्चे आदि हेतु धन की आवश्यकता थी। सदस्यों
द्वारा अर्जित किये गये चंदे का धन पर्याप्त न था।
संगठन के कुछ सदस्यों ने अपने घरों से पैसा लगाया तो किसी ने
चोरी की। बावजूद इसके धन की कमी रहती ही थी। देश को स्वतंत्र
कराने हेतु पर्याप्त धन आये कहां से यह चिन्ता की बात थी।
क्रांतिकारियों से सहानुभूति रखने वालों से सहायता तो मिलती ही थी,
जिसमें प्रमुख थे - पं० मोती लाल नेहरू, उपन्यासकार शरत् चन्द, राजर्षि
पुरूषोत्तम दास टण्डन, अटार्नी जनरल सर एस०एन० सरकार।¹
राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने गांव भी लूटे,
अशफाक भी पूर्णतः सम्मिलित हुए थे। अशफाक ने अपने भाई की
राइफल का उपयोग भी किया। लेकिन जो धन प्राप्त हुआ था, वह मात्र
सौ से दो सौ रूपये तक ही सीमित रहा। राम प्रसाद इन (डकैती) कार्यों
से प्रसन्न नहीं थे। वैसे भी यह धन राष्ट्र की आजादी के लिए ही खर्च
होता था। लेकिन राम प्रसाद बिस्मिल का मत था कि भारतवासी ग्रामीण
जनता को नुकसान पहुंचाने का कोई अधिकार किसी के पास नहीं है
और यह अनुचित है।

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -47
    90

राम प्रसाद बिस्मिल पर क्रांतिकारी गतिविधियों का उत्तरदायित्व अधिक
था, लेकिन वे कर भी क्या सकते थे। संगठन को नियमित रूप से
सहायता देने वालों ने भी हाथ खींच लिया था। कई कार्यकर्ताओं के ऊपर
ऋण का बोझ हो चुका था, अनेकों ने खराब आर्थिक स्थिति के कारण
दल से सम्बन्ध विच्छेद कर लिया था।¹ राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी
जिम्मेदारी पर ऋण लेकर जिला कार्यकर्ताओं को मासिक व्यय हेतु धन
दिया किन्तु ऐसा करना हमेशा सम्भव नहीं था। उसी समय बंगाल में
आर्डीनेंस लागू हो गया, जिसके तहत कई कार्यकर्ता तुरन्त बन्दी बना
लिये गये। कार्यकर्ताओं में उदासीनता व्याप्त होने लगी। संगठन पर
भीषण आर्थिक संकट आ गया, जिसका वर्णन बिस्मिल ने इन शब्दों में
किया है- "इस समय समिति के सदस्यों को बड़ी ही दुर्दशा का सामना
करना पड़ रहा था। चने मिलना भी कठिन था। सब पर कुछ-न-कुछ
कर्ज हो गया था। किसी के पास साबुत कपड़े तक न थे। कुछ विद्यार्थी
बनकर धर्म क्षेत्रों तक में भोजन करते थे। चार-पांच सदस्यों ने
अपने-अपने केन्द्र त्याग दिये थे। पांच सौ से अधिक रूपये मैं कर्ज लेकर
व्यय कर चुका था। यह दुर्दशा देखकर मुझे बड़ा कष्ट होने लगा। मुझसे
भरपेट भोजन नहीं किया जाता था। सहायता के लिए सहानुभूति रखने
वालों का द्वार खटखटाया, किन्तु कोरा उत्तर मिला। किंकर्तव्यविमूढ़ था।
कुछ समझ में नहीं आता था। कोमल “दय नवयुवक मेरे चारों ओर
बैठकर कहा करते थे - 'पंडित जी अब क्या करें।' मैं उनके सूखे मुख
को देखकर बहुधा रो पड़ता था कि स्वदेश सेवा का वत लेने के कारण
उनकी फकीरों से भी बुरी दशा हो रही है। एक-एक कुर्ता तथा धोती भी
ऐसी नहीं थी, जो साबुत होती।

  1. अशफाक उल्ला खां, भवान सिंह राणा, पृष्ठ - 47
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