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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

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ऐसी अवस्थाओं में यदि क्रांतिकारी संगठन-कर्ताओं के पास पर्याप्त
धन होता तो वे असहयोगियों को अपने हाथ में लेकर उनसे काम ले
सकते थे। कितना भी सच्चा काम करने वाला हो, किन्तु पेट तो सबका
है।'' स्पष्ट है कि संगठन को धन की आवश्यकता थी और कोई सार्थक
जरिया दिखाई भी नहीं दे रहा था। प्रसिद्ध क्रांतिकारी और संगठन के
प्रमुख राम प्रसाद इस हेतु मुख्य प्रबन्धक शाहजहांपुर हुए। वे संगठन के
महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। धन के अभाव में क्रांतिकारी किसी कार्य को
परिणाम तक पहुंचाने में असफल हो रहे थे। हथियार बढ़ाने, सदस्यों की
संख्या अधिक करने, पर्चे आदि हेतु धन की आवश्यकता थी। सदस्यों
द्वारा अर्जित किये गये चंदे का धन पर्याप्त न था।
संगठन के कुछ सदस्यों ने अपने घरों से पैसा लगाया तो किसी ने
चोरी की। बावजूद इसके धन की कमी रहती ही थी। देश को स्वतंत्र
कराने हेतु पर्याप्त धन आये कहां से यह चिन्ता की बात थी।
क्रांतिकारियों से सहानुभूति रखने वालों से सहायता तो मिलती ही थी,
जिसमें प्रमुख थे - पं० मोती लाल नेहरू, उपन्यासकार शरत् चन्द, राजर्षि
पुरूषोत्तम दास टण्डन, अटार्नी जनरल सर एस०एन० सरकार।¹
राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने गांव भी लूटे,
अशफाक भी पूर्णतः सम्मिलित हुए थे। अशफाक ने अपने भाई की
राइफल का उपयोग भी किया। लेकिन जो धन प्राप्त हुआ था, वह मात्र
सौ से दो सौ रूपये तक ही सीमित रहा। राम प्रसाद इन (डकैती) कार्यों
से प्रसन्न नहीं थे। वैसे भी यह धन राष्ट्र की आजादी के लिए ही खर्च
होता था। लेकिन राम प्रसाद बिस्मिल का मत था कि भारतवासी ग्रामीण
जनता को नुकसान पहुंचाने का कोई अधिकार किसी के पास नहीं है
और यह अनुचित है।

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -47
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