अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
इनमें शचीन्द्रनाथ सन्याल भी थे। बाद में इन लोगों ने नई समिति
बनाई। एक मुखबिर के बयान के अनुसार शचीन्द्रनाथ कलकत्ता
जाते-आते रहते थे। वहाँ से वे बम और धन प्राप्त करते थे। 1913 की
शरद ऋतु में शचीन्द्र नाथ के साथियों ने बनारस के स्कूल कालेजों में
राजद्रोहात्मक पर्चे बाँटे और डाक द्वारा दूसरी जगह भी भेजे। लोग गाँवों
में जाते थे, भाषण देते थे। भाषण के दो विषय होते थे। एक तो यह कि
अंग्रेजों को बाहर करो दूसरा यह कि अपनी हालत सुधारो। यह बात
खुल्लम-खुल्ला कही जाती थी।
वर्ष 1914 में रास बिहारी जो दिल्ली और पंजाब के षड्यंत्रों में
मशहूर हो गये थे बनारस आये और सारा नेतृत्व अपने अधिकार में ले
लिया। शचीन्द्र दल के सदस्य समय-समय पर उनसे मिलते थे। 1914 के
नवम्बर की रात जब वे एक बम की टोपी की जाँच कर रहे थे तो वह
फट गई, इससे शचीन्द्र नाथ और रास बिहारी को चोट आ गयी।¹ इसके
बाद विष्णु गणेश पिंगले से मुलाकात हुई। पिंगले ने बताया कि 4000
आदमी विद्रोह की गरज से अमेरिका से आ चुके हैं और 2000 और आने
वाले हैं। 1915 में पिंगले और शचीन्द्रनाथ सन्याल मिले और रास बिहारी
के साथ महत्वपूर्ण सभा की। इसमें उन्होंने बतलाया कि शीघ्र ही एक
विराट विद्रोह होने वाला है और वे देश के लिए मरने को तैयार रहें। बाद
में शचीन्द्र नाथ पकड़े गये। अधिकारियों को पता चल चुका था कि
बनारस को केन्द्र मानकर संयुक्त प्रान्त, मध्य प्रदेश, पंजाब में क्रांतिकारी
गतिविधियाँ चलाई जा रही हैं, तीनों प्रान्तों की पुलिस सजग कर दी
गई।² भारत रक्षा कानून के मुताबिक बनायी गयी एक अदालत में
मुकदमा चला।
- भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्यथनाथ गुप्त पृष्ठ 85
- भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, राम गोपाल, पृष्ठ-208
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दस व्यक्तियों को लम्बी कैद की सजा हुई। शचीन्द्रनाथ सन्याल को साढ़े
बाइस साल की सजा हुई।¹ गवाहों के बयान से साबित हो गया था कि
कई बार फौजों को भड़काने की चेष्ठा की गयी, राजद्रोही परचे बाँटे गये।
पुलिस को तलाशी में निम्न वस्तुएं प्राप्त हुई -
- एक 450 छै फायर वाला रिवाल्वर
- एक टिन कारतूस
- एक ब्रीच लोडिंग राइफल
- एक दोनाली 500 एक्सप्रेस राइफल
- एक दोनाली बन्दूक
- सत्रह करौलियाँ
- बहुत से कारतूस
- एक पैकेट बारूद
- 'स्वाधीन भारत' और 'लिबर्टी' पर्चे
विनायक राव कापले जो बनारस षड्यन्त्र से सम्बन्ध रखते थे 9 फरवरी
1918 को मार डाले गये। बाद में उन्हीं से सम्बन्ध रखने वाले सुशील
लाहिड़ी पकड़े गये।
सुशील लाहिड़ी ने भी संयुक्त प्रान्त में क्रांतिकारी गतिविधियाँ
चलाने का प्रयास किया। संयुक्त प्रान्त में दूसरा बड़ा आन्दोलन जो
क्रांतिकारियों द्वारा हुआ वह था मैनपुरी काण्ड जिसकी चर्चा की जा चुकी
है। उत्तर प्रदेश में क्रांतिकारी आन्दोलन का नेतृत्व बनारस के बंगाली
क्रांतिकारियों ने किया। यह ज्ञातव्य है कि इसकी प्रेरणा से उत्तर प्रदेश के
बहुत से देश भक्त क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर आकर्षित हुए। - भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त पृष्ठ-86
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यही प्रेरणा कही न कहीं मैनपुरी षड्यंत्र की मानसिकता से भी जुड़ती है।
यह भी लगता है कि बालक अशफाक भी क्रांतिकारियों की गतिविधियों से
परिचित होते रहे होंगे। अशफाक पहले से ही अपनी माता को अखबार
पढ़ते देखा करते होंगे तो सूचना से वंचित कैसे होंगे।
मैनपुरी षड्यंत्र के प्रमुख नेता गेंदा लाल ने उ०प्र० के युवाओं में
पुनः आग सुलगा दी और सिद्ध कर दिया कि अभी युवा वर्ग सोया नही
है। षड्यंत्र की महत्वपूर्ण घटना है कि ब्रह्मचारी और गेंदालाल ने एक
धनी व्यक्ति के यहाँ डाका डालने का निश्चय किया। वह स्थान इतनी
दूर था कि एक दिन में नहीं पहुंच सकते थे। इसलिए पड़ाव डालना पड़ा।
गिरोह में 80 आदमी थे। इस गिरोह के एक भेदिया ने किसी तरह
पकड़वाने का निश्चय किया। भेदिया तो मार दिया गया लेकिन अन्य
साथी पकड़े गये। मैनपुरी षड्यंत्र उ०प्र० के क्रांतिकारी इतिहास का दूसरा
पड़ाव है जिसकी चर्चा की जा चुकी है लेकिन यह बताना भी आवश्यक है
कि चूँकि मैनपुरी षड्यंत्र में शाहजहाँपुर की भूमिका काफी रही है और
यही एक काण्ड है जिसके कारण अशफाक ने क्रांतिकारी जीवन अपनाया।
क्रांतिकारियों का एक प्रमुख कार्य यह भी था कि देश के युवाओं में
अंग्रेजों के प्रति घृणा पैदा करना और जनता को क्रांति के लिए तैयार
करना। इस हेतु क्रांतिकारी साहित्य का खूब वितरण होता था। क्रांतिकारी
सशस्त्र विद्रोह में विश्वास रखते थे और अंग्रेजों का वध करके आतंक पैदा
करना चाहते थे। लेकिन इसकी भूमिका क्रांतिकारी साहित्य से ही बनती
थी। क्रांतिकारी पर्चों को गुप्त रूप से उ०प्र० के विभिन्न नगरों में चिपका
दिया करते थे। ये पर्चे लखनऊ और दूसरे नगरों में प्रकाशित किये जाते
थे। क्रांतिकारी पर्चे का एक नमूना इस प्रकार है -
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''ओ३म्
वन्दे मातरम् वन्दे मातरम् - स्वदेशाभिमानियों को संदेश -
''वीर पुरुषों, आगे आवो और फोर्ट विलियम पर अधिकार करो। वह
कितने अंग्रेज हैं? उनको जल्दी बिन लो। प्रिय साथियों, देशवासियों, हम
सब जानते है कि जिस प्रकार भारत की सोने की चिड़िया पिछले 600
वर्षों में विदेशियों के अत्याचार से पीड़ित रही है। चार सौ वर्षों तक यवनों
ने हमारी मातृभूमि को आक्रान्त किया लेकिन उन्होंने केवल हमारे भौतिक
शरीरों को ही पीड़ित किया था, मगर अपनी सभ्यता की डींग हाँकने वाले
अंग्रेजों ने तो एक सौ साल के अन्दर हमारी सारी सम्पत्ति लूट ली और
इसे लूट कर इग्लैण्ड ले गये। उन्होंने हमारी महानता को नष्ट कर दिया
है और हमारे पुरुषों को स्त्रियों में परिवर्तित कर दिया है। हम सब उनकी
कूटनीति के शिकार बना दिये गये हैं। उन्होंने हमें झूठे प्रलोभन से ठगा
है और इस प्रकार का जाल हमारे चारों तरफ फैलाया है कि हर कदम पर
हमें इसके काँटे चुभते हैं। किसी ने सत्य ही कहा है -
अपने प्रति
''तुमने भारत के लोगों को प्रेम से आकर्षित किया
और फिर उन्हें ही मार डाला,
तुम हमारी प्रतिमा बने, तुमने हमें अपना
उपासक बनाया और फिर हमें ही मार डाला।
यह हमारी हत्या कितनी भयंकर है
तुमने हमें अपना बनाया और फिर हमें ही मार डाला।
वे जो मृत्यु के सन्निकट थे,
उन्हें बार-बार जीवित किया और फिर उन्हें मार डाला।''¹
- मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणि शुक्ल-पृष्ठ 80
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‘‘अब तक वैसे ही स्वराज्य के प्रलोभन में हमें फँसाया जा रहा है लेकिन
कोई भी देश कभी तलवार पकड़े बिना स्वतंत्र नहीं हुआ है। अब हे देश
प्रेमियों! वीर शिवाजी और प्रताप के समान अपनी तलवार उठाओ और
प्यारी भारत माता के उत्पीड़कों को पाठ पढ़ाओ। भारत के प्रत्येक स्त्री
पुरुष प्रतिज्ञा लो कि जब तक दुष्ट बेईमान, धोखेबाज और छद्मी एवं धूर्त
अंग्रेजों को, जो भारत के उत्पीड़क हैं, हम नहीं निकाल देंगे तब तक हम
प्रिय से प्रिय कार्यों को जिसमें हम संलग्न हैं, भूल जायेंगे और अपनी
सम्पूर्ण शक्तियों को हम इस कर्तव्य में लगा देंगे। उन्हें स्पष्ट समझा दो
कि अब भविष्य में हम तुम्हारी धूर्ततापूर्ण चालाकियों से प्रवंचित नहीं
होंगे। हमारा प्रमुख लक्ष्य और उद्देश्य है और हमेशा यह रहेगा कि हम
उनका सम्पूर्ण विनाश करेंगे।’’
‘‘अब सब भारतीयों को एक स्वर से घोषित करना है कि भविष्य में
हिन्दुस्तान वास्तविक हिन्दुस्तान होगा’’¹। उक्त पर्चा 1 मार्च 1918 की
रात को लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर, आगरा, मथुरा, बरेली, फैजाबाद,
शाहजहाँपुर, तिलहर, पोवान, इटावा, गोंडा, मिर्जापुर, सुल्तानपुर, हरदोई
में चिपकाये गये। शिवकृष्ण, गोपीनाथ, दलपत, राम नारायण, सिद्ध
गोपाल, प्रभाकर और चन्द्रधर ने उक्त पर्चे चिपकाये। बस्ती में 2 मार्च
1918 की रात में पर्चे चिपकाये गये। ‘अंग्रेजों को मारो और स्वतंत्र बनो’
शब्दों से युक्त पर्चे मैनपुरी, मेरठ, एटा और फतेहगढ़ डाक द्वारा भेजे
गये। यह कार्य छात्र प्रभाकर ने किया।² मार्च 1918 के लगभग ‘अमेरिका
को स्वाधीनता कैसे मिली’ नामक पुस्तक का प्रकाशन लखनऊ से हुआ।
इस पुस्तक का संकलन ‘अमेरिका की स्वाधीनता का इतिहास’ नामक
पुस्तक के आधार पर देव नारायण ने किया था।
- मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल, पृष्ठ-81
- मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल, पृष्ठ-81
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गंगा सिंह ने अंग्रेजी उद्धरणों का इसमें समावेश किया था। इस पुस्तक
के शीर्षक पृष्ठ पर ये शब्द अंकित थे - ''हे वीर भारतीयों उठो, अस्त्र
उठाओ, अपनी तलवार खोलो और साहस के साथ आगे बढ़ो। विजय
प्राप्त करो या युद्ध क्षेत्र पर अपने जीवन का बलिदान करो। विदेशी
शासन ही अकाल और भारत की सब आपत्तियों का उत्तरदायी है।
स्वतंत्रता के लिये तलवार उठाना पाप नहीं।'' इस पर्चे में बनारस षड्यंत्र
के मुखबिरों की भी राजद्रोही कहकर भर्त्सना की गयी थी। इस पुस्तक में
उल्लेख किया गया था कि इंग्लैण्ड का तुच्छतम निवासी भी अपने को
सर्वप्रभु समझता है और हमें अपना गुलाम समझता है। इस पुस्तक का
समापन कविता से होता है, जिसका आशय है - 'हम बाग को नष्ट
करने वालों को पाठ पढ़ायेंगे... हे हत्यारे! दैनिक उत्पीड़न अच्छा नहीं है।
हमें बताओ कि तुम्हारे और हमारे बीच अन्तिम फैसला कब होगा?¹
24 दिसम्बर 1918 को उ०प्र० सरकार के आदेशानुसार यह पुस्तक जब्त
कर ली गयी। क्रांतिकारी संस्था के सदस्यों में अंग्रेजी सत्ता को समाप्त
कर देने की इतनी आग थी और तड़पन थी कि वे स्वतंत्रता की वेदी पर
मर-मिटने को तैयार रहा करते थे। उस समय की कविताओं का अर्थ यही
संकेत देता है। उदाहरण - 'हृदय में उस समय तक विश्राम नहीं लूँगा जब
तक भारत में अपना ही शासन फिर से स्थापित नही करूँगा, गौरव से
अलंकृत नही करूँगा और शत्रु से कोहनूर वापिस नहीं लूँगा। अगर मैं
इसमें असफल रहा तो अपना सिर काट लूँगा या अपने को डुबा दूँगा या
अपने को अग्नि की भेंट कर दूँगा।' कविताओं के आशय स्पष्ट रूप से
विद्रोहात्मक थे और आग उगलते शब्द जोश पैदा करते थे।
- मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल, पृष्ठ-82
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कविताएँ अण्डमान भेजने वालों और फाँसी पर लटकाने वालों की देह पर
पिघला कर शीशा डालने को कहती हैं। कहीं कुलीगीरी प्रथा का विरोध है
तो कहीं निरंकुशता से उत्पन्न हुए संत्रास, बेचैनी। क्रांतिकारियों पर विदेशी
सत्ता के गुप्तचर विभाग की कड़ी नजर रहती थी। तलाशियों,
गिरफ्तारियों का सामना करते ये क्रांतिकारी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए
सदैव भूखे रहते थे। शायद यही भूख जो कभी मिटी नहीं, अशफाक
उल्ला खाँ में भी थी।
काकोरी काण्ड के पूर्व भी कई डकैतियाँ डाली गयी थीं, जिसका
प्रभाव अशफाक पर निश्चित ही पड़ा था। खास तौर पर शाहजहाँपुर के
क्रांतिकारियों द्वारा किये गये कार्यों का असर तो अशफाक पर पड़ना ही
था।
- खंडा खेला (तिलहर थाना निगोही): - जून 1918 के तीसरे सप्ताह का
वह दिन डकैती के लिए क्रांतिकारियों ने नियुक्त कर रखा था। इस दिन
क्रांतिकारी खंडा खेड़ा ग्राम के प्रमुख के घर डाका डालने हेतु गये। इस
गाँव में एक बारात आयी थी। घर में प्रवेश की युक्ति नहीं सूझी। देर
होने पर ग्रामवासी सतर्क हो गये और क्रांतिकारियों को बिना कार्य
सम्पन्न किये वापस आना पड़ा।¹ - परेली (शाहाबाद, हरदोई) :- क्रांतिकारियों ने 23 जून 1918 को हरदोई
के शाहाबाद नामक थाने के अन्तर्गत परेली में एक विधवा ब्राह्मणी के घर
डाका डाला। यह विधवा ब्राह्मणी क्रांतिकारी राजाराम बाजपेई की मौसी
थी। राजाराम ने ही उस विधवा के कंधे पर छूरा रखा और चाभियाँ प्राप्त
की। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार डकैती में क्रांतिकारियों ने दस हजार
रूपये लूटे। - स्वतंत्रता आदोलन में जनपद शाहजहाँपुर का योगदान, एन०सी०
मेहरोत्रा पृष्ठ -115
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इस डकैती में राम प्रसाद बिस्मिल, राजाराम भारतीय, गंगा सिंह चन्देल आदि
सम्मिलित थे। यह संयोग ही था कि राजाराम बाजपेई की नकली मूंछें छूट
गई। जब वे पकड़े गये तो पुलिस ने उनके कमरे से वैसी ही मूंछें प्राप्त
की थी।¹
3. ढकिया हमीदनगर (पुवायाँ, शाहजहाँपुर) : - शाहजहाँपुर जनपद की
पुवायाँ तहसील के सिंधौली थानान्तर्गत ग्राम-ढकिया हमीदपुर में
क्रांतिकारियों ने डकैती डाली। डकैती डालने की तिथि थी 29 सितम्बर
1918। क्रांतिकारी एक ऊँट गाड़ी पर हथियारों का बक्सा रखकर वापस आ
रहे थे। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 30 सितम्बर 1918 को दल के दो
सदस्य जलालपुर चुंकी चौकी पर ऊँट गाड़ी छोड़कर भाग गये। उक्त
बाक्स से एक 450 बोर की दोनाली राइफल, एक नली बन्दूक, 3 छः
नम्बर के रिवाल्वर, 30 कारतूस तथा दो पैकेट गोला बारूद निकला।
राजाराम बाजपेई पर उक्त डकैती में शामिल होने का आरोप लगाया गया
था।²
4. बमरौली (पीलीभीत) : - ग्राम बमरौली जो पीलीभीत के अन्तर्गत है,
के निवासी बलदेव प्रसाद के घर क्रांतिकारियों ने डकैती डाली। बलदेव
प्रसाद सूदखोरी व शक्कर की खांडसार का काम करते थे। इस डकैती में
क्रांतिकारियों के हाथ 600 रूपये नकद एवं 4000 रूपये के आभूषण हाथ
लगे थे।³ मन्मथनाथ गुप्त के अनुसार, धन का उपयोग ‘दि रिबोल्युशनरी’
नामक पर्चे के छपवाने में खर्च किया गया। क्रांतिकारियों को चुनौती देने
वाला एक ग्रामवासी क्रांतिकारियों की गोली से मारा गया।
- स्वतंत्रता आंदोलन में जनपद शाहजहाँपुर का योगदान, एन०सी०
मेहरोत्रा पृष्ठ -115 - स्वतंत्रता आंदोलन में जनपद शाहजहाँपुर का योगदान, एन०सी०
मेहरोत्रा पृष्ठ -116 - पूर्वो, एच-डब्लू-हेल, पृष्ठ-57
65
- बिचपुरी (पीलीभीत) : - 9 मार्च 1925 को टोटी नामक कुर्मी के घर
क्रांतिकारियों ने डकैती डाली। टोटी बिचपुरी जो पीलीभीत जिले के
अन्तर्गत गाँव था, वहीं का वह निवासी था। उसके पास 36 एकड़ जमीन
थी। इस डकैती में क्रांतिकारियों ने 800-900 रूपये लूट लिये। दुर्भाग्य से
इस डकैती में भी श्यामलाल नाम का एक ग्रामवासी मारा गया। मुखबिर
बनारसी लाल के अनुसार इस डकैती में राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक
उल्ला खाँ, मन्मथनाथ गुप्त, राम कृष्ण खत्री, चन्द्रशेखर आजाद
सम्मिलित हुए थे। क्योंकि ये लोग शहबाजनगर स्टेशन पर एकत्र हुए थे।
इस डकैती में राम प्रसाद बिस्मिल ने कुछ पेशेवर डाकुओं को भी शामिल
किया था।¹ - द्वारकापुर (प्रतापगढ़) :- क्रांतिकारियों ने प्रतापगढ़ के द्वारकापुर गाँव
में शिवरतन वैश्य के मकान में 24 मई 1925 को डकैती डाली। इस डकैती
में ग्रामवासियों पर भी गोलियाँ चलाई गयी थी, जिससे रामसरन नाम
का एक बालक भी मारा गया था। जिसमें एक रिवाल्वर भी खो गया
था। राम प्रसाद बिस्मिल ग्राम वासियों पर गोली चलाये जाने से दुखी
और निराश थे।² यह डकैती आर्थिक दृष्टि से लाभ दायक नहीं थी।
क्रांतिकारियों पर मुकदमा भी हुआ। लेकिन जब यह ग्राम वासियों को
ज्ञात हुआ कि डाकू कोई और नही भारत के क्रांतिकारी थे तो ग्रामीणों ने
कहा-'पहले क्यों नही बताया कि आप लोग क्रांतिकारी हैं। यदि हमें
मालूम होता तो हम सेठ के लिए नहीं लड़ते। ' '
- टैरारिज्म इन इंडिया, 1917-36, गृह विभाग, भारत सरकार क्रम
संख्या बी 38/3 पृष्ठ - 79 - दे लिव्ड डैन्जरसली, मन्मथनाथ गुप्त- पृष्ठ 111
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ग्रामवासियों ने बाद में गवाही नहीं दी।$^1$ इस डकैती से निराशा ही
हाथ लगी। सुधीर विद्यार्थी ने लिखा है-'ऐसी डकैती के बाद बिस्मिल का
मन भारी बोझ से दब गया। वे सोचने लगे कि इस तरह देशवासियों को
सताना उचित नहीं है। इनसे खतरा उठाकर भी न तो दल को आर्थिक
रूप से सुदृढ़ता मिलती है और न ही दल की प्रतिष्ठा को ही लाभ होता
है। बिस्मिल इन कामों से अब थक गये थे और वे दूसरे साधनों व
तरीकों पर गम्भीरता से सोचने लगे थे, ताकि जनता के बीच क्रांतिकारियों
के कार्यों पर उंगली न उठ सके।$^2$ इस प्रकार काफी विचार-विमर्श के बाद
हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की प्रान्तीय समिति ने तय किया कि
गाँव में डकैती डालने के अभियान को समाप्त किया जाय और केवल
बैंक और सरकारी सम्पत्ति ही लूटी जाय।$^3$ समिति ने यह निर्णय खास
तौर पर इसलिए लिया कि इस प्रकार की लगातार डकैतियों से क्षेत्र की
जनता राम प्रसाद बिस्मिल को पहचान लेगी। इसी समय पिस्तौल हेतु
नकद रूपयों की जरूरत थी जो जर्मन की थी और रूपये देकर कलकत्ता
से प्राप्त करना था। यह योजना गुप्त थी और यह भी था कि ऐसा मौका
हाथ से जाने नहीं दिया जा सकता, परन्तु रूपयों की बहुत कमी थी। ऐसे
समय में गाँव में डकैती डालने का विचार छोड़ा जा चुका था।$^4$ निश्चित
ही यह भी कारण था जो काकोरी काण्ड के रूप में सम्पादित हुआ। यह
सत्य था कि संघर्ष हेतु भारत के क्रांतिकारी संगठित होने लगे थे और
घटनाएँ कहीं न कहीं घटती रहती थीं।
- क्रांतिकारी रामकृष्ण खत्री से विश्वमित्र उपाध्याय की भेंटवार्ता -29 अगस्त 1982
- शहीद रोशन सिंह -सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ-23
- पूर्वो टरारिज्म इन इण्डिया, रिपोर्ट - पृष्ठ 79
- अमर शहीद अशफाक उल्ला खाँ, बनारसी दास चतुर्वेदी, पृष्ठ-128
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नेतृत्व की क्षमता वाले नेता थे रामप्रसाद बिस्मिल, योगेश चटर्जी,
शचीन्द्रनाथ सन्याल, गेंदालाल दीक्षित। शचीन्द्र नाथ सन्याल की पुस्तक
'बंदीजीवन' तो क्रांतिकारी आन्दोलन के लिए पाठ्य पुस्तक ही बन गयी
थी।¹ अक्टूबर 1924 में क्रांतिकारी युवकों का कानपुर में एक सम्मेलन
हुआ। इसके तहत 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' का गठन किया
गया। इसका उद्देश्य था सशस्त्र क्रांति के माध्यम से औपनिवेशिक सत्ता
को उखाड़ फेंकना और एक संघीय गणतंत्र 'संयुक्त राज्य भारत' की
स्थापना करना था।² इसके लिए बड़े पैमाने पर प्रचार की जरूरत थी।
नवयुवकों को अपने दल में मिलाना, प्रशिक्षित करना और हथियार जुटाने
जैसे कार्य मुख्यतः थे। इस सब कार्यों के लिए पैसे की आवश्यकता थी।
हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी ने पैसा एकत्र करने के उद्देश्य से काकोरी
जैसी बड़ी घटना को सम्पादित किया। सरकारी खजाना लूटने की यह
घटना 'काकोरी काण्ड' के नाम से प्रसिद्ध है।³
9 अगस्त 1925 को उत्तर प्रदेश के क्रांतिकारियों ने सहारनपुर
लखनऊ लाइन पर काकोरी जाने वाली गाड़ी को सफलता पूर्वक लूट
लिया। इस काकोरी काण्ड के अभियोग में जनता ने बहुत सी सहानुभूति
का प्रदर्शन किया। विधान परिषद में प्रस्ताव रखे गये। उनके नेता राम
प्रसाद बिस्मिल यह कहते हुए कि - 'मैं अंग्रेजी राज्य के पतन की इच्छा
करता हूँ प्रसन्नता पूर्वक फाँसी पर लटक गये।
- भारत का स्वतंत्रता संघर्ष - बिपिन चन्द्र, पृष्ठ-190
- भारत का स्वतंत्रता संघर्ष - बिपिन चन्द्र, पृष्ठ-190
- भारत का स्वतंत्रता संघर्ष - बिपिन चन्द्र, पृष्ठ-190
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रोशन लाल वंदेमातरम् गाते हुए शहीद हो गये।¹ इस लूट में
सरकारी खजाना लूटा गया था। अशफाक उल्ला खाँ, राम प्रसाद
बिस्मिल, रोशन सिंह, राजेन्द्र लाहिड़ी को फाँसी दे दी गयी। चार
क्रांतिकारियों को आजीवन कारावास की सजा देकर अंडमान भेज दिया
गया। 17 अन्य क्रांतिकारियों को भी लम्बी सजाएं हुई। चन्द्रशेखर आजाद
फरार हो गये।²
आज भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले क्रांतिकारी उन शहीदों
के रूप में याद किये जाते हैं, जिन्होंने मातृभूमि के लिए जान दे दी।
''शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही नामों निशा होगा।''
- आधुनिक भारत का इतिहास, बी०एल० ग्रोवर पृष्ठ 314
- भारत का स्वतंत्रता संघर्ष, बिपिन चन्द्र, पृष्ठ 190
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अध्याय-पाँच
अध्याय-पांच
अशफाक के क्रांतिकारी जीवन की पृष्ठभूमि :
समाजवादी विचारधारा का प्रभाव - क्रांति पथ का वरण
आज भारत देश स्वतंत्र है। हम सब स्वतंत्रता के विशाल वृक्ष की
शीतल छाया का आनन्द ले रहे हैं, उसके मधुर फलों का स्वाद ले रहे हैं।
लेकिन स्वतंत्रता का बीज बोने में तमाम देश भक्त क्रांतिकारियों के साथ
अपने रक्त से सींचने वाले अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल और
अशफाक उल्ला खाँ का स्थान विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इन दोनों
क्रांतिकारियों में रेखांकित करने योग्य महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों
क्रांतिकारी होने के साथ-साथ रचनाकार भी थे, कवि थे। अशफाक और
बिस्मिल स्वतंत्रता आन्दोलन के क्रांतिकारी सिपाही ही नहीं वरन् वे कलम
के भी सिपाही थे। इनकी रचनाएं आग उगलती तो थी ही, संवेदना के
स्तर पर भी स्तरीय हुआ करती थीं। यह भी कहा जा सकता है कि दोनों
शस्त्र और शास्त्र में पारंगत थे जैसे एक माला के दो सुमन हो, एक से
बढ़कर एक सुगंध बिखेरने वाले। एक नदी के दो घाट, दोनों का पानी
एक, दिल एक, दिमाग एक, कर्म एक, धर्म एक। दोनों फाँसी पर चढ़े,
शहीद हुए, अमर हुए। राष्ट्र हित चिन्तन में दोनों का जीवन समर्पित हो
गया, धन्य हो गया।¹
अशफाक उल्ला खाँ के हृदय में मौलवी साहब की शिक्षाओं का
असर कभी गया नहीं। बाल्यकाल से ही अंग्रेजों के प्रति घृणा तो थी ही,
जिसका जिक्र पहले भी किया जा चुका है। लेकिन बाद में चलकर उनका
मानसिक रूप से समाजीकरण हो गया।
- साहित्य भारती, जुलाई-सितम्बर 1997, प्रधान सम्पादक - विनोद चन्द्र
पाण्डेय पृष्ठ 76 (लेख-जनार्दनदास)
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बाल्यकाल के बाद प्रथम विश्वयुद्ध के समय तुर्की साम्राज्य को भारी
नुकसान हुआ। तुर्की पर अंग्रेजों का अत्याचार था। तुर्की सम्राट जो
मुसलमानों का धर्म गुरु (खलीफा) हुआ करता था का पद समाप्त कर
दिया गया था, जिसके विरोध में आन्दोलन भी हुए। अशफाक तुर्की के
पतन का समाचार पढ़ते और अंग्रेजों के अत्याचार की सूचना पाते तो
बेचैन हो उठते। उस समय वे यह भी सोचते कि काश भारत पर भी
खलीफा या अफगानों का शासन हो जाता।¹
उन्हें क्या पता था कि यह उनकी अज्ञानता है। बाद में वे इस
अज्ञानता और मूर्खतापूर्ण बातों को स्वीकार करते हैं। वे लिखते हैं-‘‘जब
यूरोप की फिजा पर हिलाल के इर्द-गिर्द ईसाइयत का तूफान उठ रहा था
तब खिलाफत के झंडे को सरनगूं करने के लिए यूरोप के तसल्लीपरस्त
जमा हो रहे थे, जबकि आले उस्मान के कमजोर व नफीस बदन के चारों
तरफ ईसाई जागो जगन इकट्ठे हो रहे थे...अगर वहाँ अनवर व शकरी
दस्ते कयरस्त में तलवार लेकर मैदान में कूद पड़ते हैं, तो इधर भी अहले
दिल गर्दन में झोलियाँ डालकर दर-दर की भीख माँगते फिरते हैं और
रूपये से उनका खजाना पुर कर देते हैं। यों बाहमी उखवत और
इत्तहादे-इस्लामी की बुनियाद पड़ती है और भूला हुआ वायदा याद आता
है। खोई हुई मंजिल दिखायी देती है, भाई-भाई मिलते हैं। प्रोपेगण्डा
फैलता है, जिसका असर नौजवान मुसलमानों पर पड़ता है, कि इटली का
माल जला दिया जाता और उसके खिलाफ शोरिश पैदा की जाती, तुर्की
ख्वातीन की छुब्बुलवतनी, नौजवान तुर्की की सरफरोशिया तालिबाओं का
हिसाब, कॉलिज व स्कूल की कुर्बानियाँ एक नई स्प्रिट पैदा कर देती हैं।
- अशफाक उल्ला खाँ - भवान सिंह राणा, पृष्ठ-25
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मेरी वालिदा जो बाकायदा तालीम हासिल किये हुए थीं, बराबर
अखबार की मुस्तकिल खरीदार बन गयी और मैं भी बराबर अखबार
पढ़ने लगा, तब मैंने जाना कि मुसलमान और भी कहीं हैं। क्योंकि उस
वक्त मैं जुगरफिया से नावाकिफ था और महज हिन्दुस्तान को ही
मुकम्मल दुनिया ख्याल करता था, जैसे मेंढ़क कुएं को तसव्वुर करता है।
चूँकि मैं पठान था और यह कौम आम तौर पर सेंटीमेंटल ख्याल की
जाती है। गो कि मैं अब ऐसा नहीं हूँ। इन ख्यालात में डूब गया और
रोजोशब इसी दुआ में रहता था कि तुर्क हिन्दुस्तान फतह कर लें और
यहाँ का बादशाह बन जाएँ तो हम खलीफये वक्त की रियाया बन जाएं
और अगर अफगानिस्तान से हुकूमत कायम कर ली तो फिर क्या है, फिर
हम भी हकदार ही हैं। अंग्रेज से नफरत पैदा हो गयी। मेरा यही ख्याल
था कि यही बालिये फसाद हैं और इनकी हुकूमत नेस्तनाबूद होनी
चाहिए।''¹
अशफाक उल्ला खाँ का यह कथन स्पष्ट करता है कि वे भावुक
खानदान के व्यक्ति हैं लेकिन खानदानी भावुकता की समझ आने पर वे
इसे त्याग देते हैं। यह त्यागना भी एक नई संवेदना को जन्म देता है,
वह है देश प्रेम की भावना और अंग्रेजों के प्रति घृणा। तुर्की के पतन से
उपजी अंग्रेजों के प्रति उनकी घृणा उनका मानसिक खाका तैयार करती
है। आगे चलकर अशफाक का वैचारिक स्तर परिपक्व होता है। अब
उनको पूर्व की भावनाओं से लाज आती है। अशफाक ने स्वीकार किया
है -'गरज यह कि मेरा उस वक्त का ख्याल आज मुझे बहुत जलील
मालूम होता है कि हम एक का हलकमे गुलामी उतारकर दूसरे की
गुलामी का जुआ अपने कंधो पर रखने में मुसर्रत सी महसूस करते हैं।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -26
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खैर वह मेरी नासमझी का जमाना था।¹ उस समय के युग को हम
धारणाओं का युग भी कह सकते हैं। हिन्दुओं में एक बात बैठ गयी थी
कि मुसलमान इस देश से प्रेम नही करते। शायद ऐसी ही धारणा
मुसलमानों के दिमाग में भी थी कि हिन्दू उन्हें इस देश का स्थाई
निवासी नही समझते हैं। निश्चित यह धारणा एक नागरिक के लिए
सोचने पर मजबूर करती है कि इतने दिनों तक साथ रहने के बाद भी
हमारी धारणाएं इतनी संकीर्ण क्यों बनी हैं? अशफाक ने स्पष्ट रूप से
स्वीकार किया है कि विचारों की परिपक्वता के पूर्व वह भी हिन्दुओं के
विरुद्ध थे। कारण हिन्दू मानसिकता ही थी, वह भी एक हिन्दू अध्यापक
की संकीर्ण मनोवृत्ति। अशफाक जब स्कूल के छात्र थे तो एक हिन्दू
अध्यापक की संकीर्ण एवं भेदभाव परक मनोवृत्ति के कारण दुखी थे।
अशफाक ने बाकायदा इसका जिक्र किया है - "चूँकि हमारे करम फरमा
एक मास्टर साहब थे। जिनका अगर मैं नाम लिखूँगा तो उन्हें मुफ्त में
शर्मिन्दगी हासिल होगी, और वह मेरे मास्टर थे। जब मैं गवर्नमेन्ट स्कूल
में पढ़ता था, वह हमेशा हिन्दू-मुस्लिम में बहुत इम्तियाज करते थे। जो मैं
अब कहूँगा कि उस्ताद का कमीनापन है और यही लोग मुल्क के असल
दुश्मन हैं। मगर आज मेरा दिल ऐसा ही कुशादा एक हिन्दू के लिए भी है
जैसा एक मुसलमान के लिए । खैर उस वक्त के लीडर अब भी इत्तिहादे
इस्लामी पर आमिल हैं। गो कि एक हद तक मैं भी उनसे इत्तिफाक करता
हूँ कि भाई समझने में कोई नुकसान नहीं है। मदद करना हमारा फर्ज है,
क्योंकि हम फैयाज मुल्क के फैयाज वाशिन्दे हैं। मगर किसी की हुकूमत
अपने ऊपर कुबूल करना हमारी पस्त हिम्मती और बद-किस्मती है। यह
किसी तरह हमारे शयानेशान नहीं।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-26
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दुनिया में इन्कलाब का तगट्युरात कितनी तेजी से हुआ करते हैं।
कल मैं क्या था और आज मैं क्या हूँ। कल मैं तुर्की की हुकूमत अपने
ऊपर बायसेसद नाजो इफितखार और जरिए बख्शिश समझता था और
आज बदतरीन जिल्लत। आज मैं हर विदेशी हुकूमत को बुरा समझता
हूँ।'' अशफाक को अपने हिन्दू अध्यापक से शिकायत थी और संकीर्ण
विचारों से उन्हें दुख था। यही भावना उन्हें देश प्रेम की ओर ले जाती
है। भेदभाव की प्रदूषित मानसिकता को वे शत्रु समझते हैं। यही कारण
भी था हम गुलाम हुए। भेद-भाव हमारी विकास यात्रा का अवरोधक है,
यह अशफाक उल्ला जानते थे। शायद यही कारण था कि एक कट्टर
मुस्लिम परिवार के होते हुए भी अशफाक की मानसिक संरचना सामाजिक
हो सकी। सामाजिक विचारों के अंकुर फूटने लगे थे। साम्प्रदायिक एकता
के तो वे उदाहरण मात्र थे। आगे चलकर अशफाक की समझ में बढ़ोत्तरी
हुई तो पता चला कि अध्यापक ही राष्ट्र का निर्माता है। वह एक ऐसे
दिमाग में उपकरण सजाता है जहाँ रिक्त है सब कुछ और जब वही
संकीर्ण मानसिकता की बीमारी से राष्ट्र या पीढ़ी का निर्माता ग्रसित रहेगा
तो समाज का भविष्य कैसा होगा। जबकि अध्यापक को बिना किसी
भेदभाव के राष्ट्र की एकता के लिए मस्तिष्क तैयार करना चाहिए ताकि
एक सुसभ्य, सुसंस्कृत समाज बनाया जा सके। अशफाक की दृष्टि में
अध्यापक ही ऐसा प्राणी है जो सामाजिक बुराइयों को दूर कर सकता है।
यह ज्ञातव्य है कि अशफाक को युद्ध विषयक पुस्तकें पढ़ने का
बचपन से ही शौक था। आगे चलकर वे बंगाल के क्रांतिकारियों के विषय
में भी बाकायदा सुन रखे थे। वे समाचारों से अवगत होते रहते। यह भी
ज्ञातव्य है कि बंगाली क्रांतिकारी ही उ०प्र० की क्रांतिकारी गतिविधियों में
महत्वपूर्ण योगदान निभा रहे थे। अशफाक कन्हाई दत्त और खुदीराम
बोस के कार्यों से बहुत ज्यादा प्रभावित थे।
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इन दोनों क्रांतिकारियों का पूरा असर अशफाक पर था। वे इन
क्रांतिकारियों की कहानियाँ सुनते। यही नहीं वे बंगाली बमों का भी हाल
सुनते रहते। अशफाक के हृदय में जिज्ञासा जागती कि कितना अच्छा
होता कि मैं भी ऐसा होता। उन्हें क्या पता कि वे भी उनकी तरह फाँसी
घर में कैद रहेंगे। एक दिन का समाचार है कि अशफाक स्कूल जा रहे थे
कि अचानक उन्होंने सुना कि दिल्ली में वायसराय बहादुर पर किसी ने
बम मार दिया और स्कूल बन्द हो गया। अब क्या था अशफाक की खुशी
का ठिकाना न रहा। वे बाजारों में होने वाली चर्चाएं सुनते रहते और
प्रभावित होते, प्रेरणा पाते, स्वप्न देखते कि मैं भी ऐसा काम करूँगा कि
लोग मेरे नाम की चर्चा आम बाजारों में करें। अशफाक के दिल में दबा
हुआ देशभक्ति का बीज अंकुरित होने लगा। वे देश में होने वाली
घटनाओं से परिचित होने लगे थे।
1918 में मैनपुरी षड्यंत्र की घटना जब प्रकाश में आई तो अशफाक
भला बिना सूचित हुए कैसे रह सकते थे। यही घटना अशफाक के
क्रांतिकारी अंकुरण को पल्लवित करने में सहायक बनी। मैनपुरी घटना ने
उर्वरक का काम किया। इस षड्यंत्र का भेद खुल जाने के बाद अशफाक
के स्कूल की तलाशी ली गयी, पहचान हुई और एक छात्र राजाराम
गिरफ्तार हुए। संदेह के आधार पर कुछ और छात्र पकड़े गये। बंगाल के
विद्यार्थी क्रांतिकारी संगठनों के सदस्य थे और खूब भाग लिया करते थे
लेकिन उत्तर प्रदेश के लिए यह घटना नई थी। जिस दिन स्कूल में
पुलिस पहुँची उस दिन अशफाक स्कूल देर से पहुँचे। वहाँ दहशत का
माहौल था। हर तरफ पगड़ियाँ ही नजर आ रही थी। कोई लड़का अन्दर
से बाहर नहीं निकल सकता था। हर कक्षा में पहचान हो रही थी। कोई
ऐसा छात्र नहीं था जो अपनी जान की खैर न मनाता हो। पहचान करने
वाले सरकारी गवाह पुलिस साथ लेकर आई थी।
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अशफाक अपने स्वभाव के कारण हालात पर नजर रखे हुए थे और
मामले को गहराई से जानने समझने के लिए बेचैन थे। अशफाक
खिलाड़ी थे (हाकी) और लगभग खिलाड़ियों को सभी पहचानते भी है
और खेलने वाले छात्र भी अपने अध्यापकों से बोल-बतिया लेते हैं।
अशफाक ने अपने एक अध्यापक से पूछा लेकिन वे डर के कारण कुछ
बता न सके। फिर एक स्कूली छात्र-मित्र ने अशफाक को सारा विवरण
सुनाया। वह छात्र भी देश भक्त था और भारत की बलिवेदी पर
मरने-मिटने को तैयार था। अशफाक को एक बार फिर स्वतंत्रता हेतु संघर्ष
करने की औषधि मिल गयी।
निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि मैनपुरी षड्यंत्र की
घटना ने अशफाक उल्ला खाँ को मातृभूमि का पुजारी बना दिया।
मैनपुरी षड्यंत्र से संबंधित घटना के बाद की कार्यवाहियों में से एक-दो के
वे प्रत्यक्ष दर्शक भी थे। सो ऊर्जा मिलती ही थी। अब अशफाक
क्रांतिकारी देशभक्तों को अपना आदर्श मानने लगे। अभी वे आठवीं कक्षा
के ही विद्यार्थी थे। आठवीं कक्षा की अंग्रेजी पुस्तक में सर वाल्टर स्काट
की लिखी एक कविता 'लव ऑफ कंट्री' और एक अन्य पाठ 'वीर
होरेशस' के विषय में था। अशफाक ने इन दोनों पाठों को कई बार पढ़ा।
उनकी भावनाएँ दृढ़ होती गयीं। सर वाल्टर स्काट की कविता से तो वे
इतने प्रभावित हुए कि मानो उनके तन-बदन में आग लग गई हो।
अशफाक ने लिखा है-"मेरे मास्टर साहब ने कुछ ऐसी तर्ज में इस सबक
को पढ़ाया कि तन-बदन में आग लग गई। कविता इस प्रकार थी -
" To every man upon the earth
Death cometh soon or late
Then how can a man die or better death,
Then faceing fearful odds
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