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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 297 में से

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पृष्ठ 85

यही प्रेरणा कही न कहीं मैनपुरी षड्यंत्र की मानसिकता से भी जुड़ती है।
यह भी लगता है कि बालक अशफाक भी क्रांतिकारियों की गतिविधियों से
परिचित होते रहे होंगे। अशफाक पहले से ही अपनी माता को अखबार
पढ़ते देखा करते होंगे तो सूचना से वंचित कैसे होंगे।
मैनपुरी षड्यंत्र के प्रमुख नेता गेंदा लाल ने उ०प्र० के युवाओं में
पुनः आग सुलगा दी और सिद्ध कर दिया कि अभी युवा वर्ग सोया नही
है। षड्यंत्र की महत्वपूर्ण घटना है कि ब्रह्मचारी और गेंदालाल ने एक
धनी व्यक्ति के यहाँ डाका डालने का निश्चय किया। वह स्थान इतनी
दूर था कि एक दिन में नहीं पहुंच सकते थे। इसलिए पड़ाव डालना पड़ा।
गिरोह में 80 आदमी थे। इस गिरोह के एक भेदिया ने किसी तरह
पकड़वाने का निश्चय किया। भेदिया तो मार दिया गया लेकिन अन्य
साथी पकड़े गये। मैनपुरी षड्यंत्र उ०प्र० के क्रांतिकारी इतिहास का दूसरा
पड़ाव है जिसकी चर्चा की जा चुकी है लेकिन यह बताना भी आवश्यक है
कि चूँकि मैनपुरी षड्यंत्र में शाहजहाँपुर की भूमिका काफी रही है और
यही एक काण्ड है जिसके कारण अशफाक ने क्रांतिकारी जीवन अपनाया।
क्रांतिकारियों का एक प्रमुख कार्य यह भी था कि देश के युवाओं में
अंग्रेजों के प्रति घृणा पैदा करना और जनता को क्रांति के लिए तैयार
करना। इस हेतु क्रांतिकारी साहित्य का खूब वितरण होता था। क्रांतिकारी
सशस्त्र विद्रोह में विश्वास रखते थे और अंग्रेजों का वध करके आतंक पैदा
करना चाहते थे। लेकिन इसकी भूमिका क्रांतिकारी साहित्य से ही बनती
थी। क्रांतिकारी पर्चों को गुप्त रूप से उ०प्र० के विभिन्न नगरों में चिपका
दिया करते थे। ये पर्चे लखनऊ और दूसरे नगरों में प्रकाशित किये जाते
थे। क्रांतिकारी पर्चे का एक नमूना इस प्रकार है -
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