अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमैनपुरी जेल में दीक्षित जी को तपेदिक रोग हो गया। ग्वालियर और
मैनपुरी में उन पर मुकदमा चल रहा था। उन्हें यह ज्ञात हो गया था कि
उन्हें या तो फाँसी दे दी जायेगी या काला पानी की सजा। गेंदालाल जी
बुद्धि के तेज थे वे किसी भी आफत-विपत्ति से उबरने का मार्ग ढूँढ़ लेते
थे। इस हेतु भी उन्होंने एक युक्ति निकाली, उन्होंने कहा कि वह स्वयं
मुखबिर बनना चाहते हैं। उन्होंने पुलिस को यह भी विश्वास दिलाया कि
वह क्रांतिकारियों को पकड़वा देंगे। पुलिस प्रसन्न हो गयी कि क्रांतिकारी
दल का प्रमुख नेता मुखबिर बनना चाहता है। उन्हें जेल से निकालकर
दूसरे सरकारी गवाहों के निकट रखा गया। वहाँ सारा विवरण प्राप्त कर
रात्रि के समय सरकारी गवाह रामनारायण को लेकर वे भाग निकले।¹
रामनारायन के भाग जाने के बाद दीक्षित जी कोटा से आगरा पहुँचे और
फिर दिल्ली। वहाँ प्याऊ पर पानी पिलाने की नौकरी की लेकिन रोग तो
बढ़ता ही गया। अन्त में वे मृत्यु की गोद में समा गये। मरते समय
दीक्षित जी ने पत्नी से कहा-‘मेरा शरीर नष्ट हो जायेगा। मैं मोक्ष नहीं
चाहता, मैं तो चाहता हूँ कि बार-बार इसी भूमि में जन्म लूँ और बार-बार
इसी के लिए मरूँ। ऐसा तब तक करता रहूँ जब तक देश गुलामी की
जंजीर से न छूट जाय।² पं० गेंदालाल दीक्षित का देहावसान 21 दिसम्बर
1920 को हुआ।³ यह अमर शहीद सिर्फ अपनी यादें, अपनी संवेदनाएँ और
अपने ओजस्वी स्वर भारतीय क्रांतिकारियों के लिए छोड़कर सदैव के लिए
विदा हो गया।
- मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल, पृष्ठ-94
- मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल, पृष्ठ-94
- रामप्रसाद बिस्मिल रचनावली, दिनेश शर्मा, पृष्ठ-164
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