अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
उनके कथन में व्यंग्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। वे सदैव दुख
व्यक्त करते रहे कि पठान खानदान शिक्षा के क्षेत्र में विरक्ति का भाव
क्यों बनाये रखा। शिक्षा प्राप्त करने की बात कौन कहे, वे अपने बच्चों
को उत्साहित करने के बजाय हतोत्साहित किया करते थे। सारी सुविधाएं
होते हुए भी शिक्षा का अभाव अशफाक को खलता रहा।
अशफाक उल्ला खाँ के पिता मुहम्मद शफीक उल्ला खाँ थे। शफीक
उल्ला का मकान शाहजहाँपुर के जलाल नगर मुहल्ले में था। वे पुलिस
विभाग में एक जिम्मेदार पद (सब इंस्पेक्टर) पर कार्यरत थे। यह कोई
मामूली बात नहीं थी। जबकि जनता लाल पगड़ी देखकर भागती थी, उस
काल में अशफाक के पिता पुलिस के अच्छे पद सब-इन्स्पेक्टर पद पर हों,
परिवार का वैसे ही मान सम्मान जनता में बढ़ गया था। लेकिन
अशफाक उल्ला खाँ के जन्म के पूर्व ही वे अपने पद से मुक्त हो गये
थे। यही नहीं अभी अशफाक बचपन के प्यार से सराबोर ही थे कि
शफीक उल्ला खाँ का देहावसान हो गया। एक ऐसे पिता का चला जाना
जो अंग्रेजी सरकार को अपनी गहरी दृष्टि से देखे थे, एक-एक बारीकियां,
अंग्रेजी संवेदना और व्यवहार जानते थे, अशफाक के हित में कतई अच्छा
नहीं हुआ। बावजूद इसके अशफाक अपने बाल्यकाल में अपने पिता से
पुलिस की नौकरी और अंग्रेजी हुकूमत के विषय में पूछते रहते थे, सो
उन्हें खासा अनुभव प्राप्त हो गया था। अशफाक की अवधारणा अच्छी
नहीं बन पड़ी थी। बाद में चलकर अशफाक ने इस संबंध में लिखा है -
'मेरे वालिद साहब शफीक उल्ला खाँ सब-इन्स्पेक्टर पुलिस थे, मगर खुदा
के फजलोकरम से मेरे पैदा होने से पेश्तर ही वह मुस्तेदी पदमुक्त हो चुके
थे और जोकि वह मेरी कम उम्र में ही दुनिया से गुजर गये। खुदा उनको
जिबाहेरहमत दे और उनके कारनामों को, जो अय्यामे मुलाजमत में किये
थे,
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फरामोश करे। जिसकी वह हमेशा माफी माँगते रहे। वह मुझे पुलिस
के कारनामे बतौर किस्सों के सुनाया करते थे, जो मुझे अभी तक याद हैं
और फिर उनका सामना भी किया और वह सबब भी जो कभी
थ्योरिटिकल था, अब प्रेक्टिकल सूरत में मिल गया' ।¹ अशफाक उल्ला को
पिता का साथ यदि और मिल गया होता तो निश्चित ही शिक्षा के
साथ-साथ उनके व्यक्तित्व में भी चार चाँद लग जाते। माता निर्माता
होती है तो पिता मस्तिष्क, यह अशफाक उल्ला को जाने अनजाने ज्ञात
था।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, (पृष्ठ - 13)
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मातृपक्ष का अध्ययन
अशफाक की माता का पक्ष समृद्ध था। उनकी माँ खलील जाति की थी
और उनका वंश ‘हाफिज खेल’ नाम से जाना जाता था। अशफाक के
पूर्वजों से हाफिज खेल घराने से वैवाहिक सम्बन्ध होते थे। अशफाक का
पितृ पक्ष भले ही आर्थिक स्थिति में कमजोर था लेकिन वह देश प्रेम की
सुगंध में जीता था वहीं मातृपक्ष के पूर्वजों में ऐसी बात नहीं थी। हाँ
उनकी माली हालत बहुत अच्छी थी। इस खानदान के लोग 1857 से ही
सरकारी पदों पर कार्य करते आ रहे थे। 1857 के विद्रोह के समय
अशफाक की माँ के दादा तथा उनके भाई जज और डिप्टी कलेक्टर थे।¹
यही नहीं उस समय इन लोगों ने विद्रोहियों का साथ न देकर सरकार के
लिए जासूसी भी की थी। यह ज्ञात होने के बाद अशफाक के दिल-दिमाग
पर गहरा असर पड़ा था। कहीं न कही यह दाग धोने की ग्रंथि भी बन
रही थी। अशफाक उल्ला खाँ लिखते है '.......मुझे यह लिखते हुए शर्म
नही आती, हाँ केस के कब्ल अगर मुझे जरूरत महसूस होती तो हर्गिज
नही लिखता, क्योंकि जहां तक मेरा ताल्लुक है, मैं इसे बायसेसदनंग
समझता हूँ कि मुल्क के लोगों को अहसासे आजादी पैदा हो और वह
अपना खून मिस्ल पानी के बहाएं, अपने बच्चों की कुर्बानी कुर्बानगाहे
वतन पर चढ़ाएं, अपनी दौलत, आबरन मकान, गरज कि हर
शय-हँसी-खुशी के साथ आजादी और मजहब के लिए निसार दें, फिर
उनके साथ फरेब करना, उनके खिलाफ साजिश करना, उनकी स्कीमों को
तहस-नहस करने की कोशिश करना और वतनी दुश्मनों को इमदाद
करना, अगर शर्म और हजार शर्म की बात नहीं तो क्या है? मुझे
जमानाए तालिबेइल्मी अपने चन्द दोस्तों से हमेशा जिल्लत उठानी पड़ी,
- अशफाक उल्ला ख़ाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-11
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जब वह कहते थे कि तुम खानयीने वतन की औलाद हो, मैं उन
अहबाब का नाम नहीं लिखना चाहता हूँ। चूँकि उनको शर्म आयेगी कि
वह इस वक्त अपने गले में गुलामी का पट्टा डाले हुए हैं या सरकारी
कचहरियों में कुंजड़ो, कुंजड़ियों की तरह बाररूम में दुकाने लगाये हुए बैठे
हैं। उस वक्त उनको फख्र था कि उनके आबाब-अजदाद उस गिरोह के
एक बड़े रुक्न थे, जिसने आजादी का अलम बुलन्द किया था। खैर मैंने
अपनी कुर्बानी से इस धब्बे को जो 1857 ई० में मेरे ननिहाल के बुजुर्गों ने
अस्मते वतन पर लगाये थे, अपने खून से और नौजवान मासूम खून से
धो डाले, क्या इस खानदान का इसको कफारा समझा जा सकता है।
ख्वाह यह हो या न हो मेरी आने वाली नस्ल पर यह एतराज न होगा
कि वह उस खानदान से ताल्लुक रखते हैं, जो खाएन था, बल्कि मेरी
कुर्बानी से लोग रहम करेंगे और उनको अशफाक के खानदान का एक
मेम्बर ख्याल करके बुजुर्गों की गलतियाँ फिर अजसरे नौ याद न करेंगे।
मुझे ननिहाल के खानदान के बारे में बस इतना ही लिखना है। अब
मुझको यह अन्देशा है कि यह खानदान अब तरक्की करने के काबिल न
हो सके, क्योंकि अब नौजवान तरक्की करने के बजाय अपने बुजुर्गों पर
ही नाज करने को अपना शआर बनाये हुए हैं।
अगर यही सिम्मेकातिल है कि बुजुर्गों की तारीफ में लगे रहें या उन
पर फख्र करते रहे, इन्सान को खुद इम्ताजी हैसियत हासिल करना
चाहिए। बुजुर्गों पर फख्रों मुवाहात की जरूरत नहीं। यूं मैं दादा की तरह
कौम परस्त और ननिहाल की तरफ से अंग्रेज परस्त पैदा हुआ था। मगर
माँ का खून कमजोर था, यूँ वतनी आजादी का जज्बा ताकतवर रहा और
वतन प्यारे वतन के लिए आज मौत के तख्ते पर खड़ा हूँ'।¹ अशफाक के
ये शब्द उनकी मानसिकता को बखूबी दर्शाते हैं।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-12
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वे लज्जा और कलंक से दबे हुए हैं और इसे धो डालना चाहते हैं लेकिन
खास बात तो यह है कि उन्हें पीढ़ी की चिन्ता है यही चिन्ता देश के हर
नौजवान तक जाती है। हमें सिर्फ फख्र करके नहीं जीना है अपनी
गुणवत्ता साबित करना है। वास्तव में अशफाक अपने समाज के प्रति,
विकास के प्रति, मानसिकता के प्रति बेहद चिंतित दिखाई देते हैं। बचपन
की बेचैनी ने उनके मानसिक उपकरणों की संरचना की है, जिससे वे एक
स्वस्थ क्रांतिकारी की हैसियत से इतिहास में दर्ज है।
अशफाक उल्ला खाँ की माँ मजहर उलनिशाँ बेगम मुहम्मद अब्दुल
हसन खान की पुत्री थी। अब्दुल हसन खलील गरबी के निवासी थे। वे
कचहरी में पुलिस सब-इन्सपेक्टर थे। यही नहीं उनके पिता सब-जज रह
चुके थे। विद्रोहियों के विरुद्ध कार्य करने के कारण विद्रोहियों के हाथों
पिता-पुत्र दोनों मारे गये। अशफाक की माँ उलनिशाँ बेगम विनम्र स्वभाव
की अति-दूरदर्शी और बुद्धिमान महिला थी। वैसे भी उनकी शिक्षा दीक्षा
ठीक ढंग से हुई थी, इसी वजह वह एक गुणवान महिला की श्रेणी में
आती हैं। अशफाक और उनके सभी भाई-बहन माँ से डरते थे और उनकी
आज्ञा का पालन करते थे। निश्चित ही अशफाक की माँ ने ऐसे संस्कार
दिये होंगे। ठीक ही कहा गया है माता निर्माता भवति। माँ निर्माण करती
है, मनुष्य बनाती है और अशफाक की माँ ने एक माँ का फर्ज बखूबी
निभाया भी है। अशफाक की माँ एक अनुशासन प्रिय महिला थीं।
परिवार में उनका इतना मान-सम्मान था कि अशफाक के पिता भी उनकी
बात कभी टालते न थे। संतानों में सबसे छोटे होने के कारण अशफाक
सबके प्यारे थे। खास तौर से माँ का स्नेह विशेष रहता था। उलनिशाँ
बेगम को पढ़ने-लिखने में रुचि थी। अध्ययन के प्रति लगाव का आलम
यह था कि उनके बिस्तर पर किताबों का ढेर लगा रहता था।
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बेगम साहिबा समाचार पत्र पत्रिकाएं पढ़ने का शौक रखती थी।
परम्परानुसार पान खाने का भी विशेष शौक था।¹
अशफाक का घर आम आदमी से ऊपर एक रईस का घर माना
जाता था। माता-पिता के समय में उनके घर कई नौकरानियाँ रहती थीं।
घर अभाव से दूर था। पेंशन (पिता की पेंशन) और कृषि से आय खूब
होती थी। घर की पूर्णतः मालकिन अशफाक की माँ ही थीं। कमी तो
कोई थी नही, ऊपर से उलनिसाँ बेगम का हृदय दयालु भी था। वे
साधनहीन विधवाओं की सहायता करती रहती, उन्हें भोजन कराती रहती
थी। इसी कारण उनका सम्मान समाज में भी था। वह किसी को दुखी
देखना नही चाहती थी। गरीब लड़कियों के विवाह में वह यथासम्भव
सहायता करती रहती थी। परिवार नही समाज के लोग भी उनसे परामर्श
किया करते थे। अशफाक ने उल्लेख भी किया है - 'मोहल्ले के
मर्द-औरतें हर मामले में हमेशा उनकी सलाह के बगैर कोई शादी ब्याह
नहीं करते थे। गरज कि उनकी सलाह के बगैर खानदान में कोई काम
न होता था और सब लोग उनका बड़ा ख्याल करते थे। वह कद्दावर और
भरे जिस्म की बीबी थी। वह बहुत हँसमुख थी।²
जन्म और अशफाक का बचपन :-
स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का क्रांतिकारी पृष्ठ अशफाक उल्ला खाँ
के नाम से रोशन है। ऐसे वीर सपूत अशफाक उल्ला खाँ का जन्म 22
अक्टूबर 1900 को शाहजहाँपुर के एक मध्यम श्रेणी के मुस्लिम परिवार में
हुआ।³ अशफाक अपनी माता मजहर उलनिसाँ बेगम की पाँचवी संतान
थे। वे अपने भाई बहनों में सबसे छोटे थे।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ 14
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-15
- अशफाक उल्ला खाँ, सुधीर विधार्थी, पृष्ठ-8
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अशफाक उल्ला खाँ का घरेलू नाम अच्छू खान था। कौन जानता था कि
उनका अच्छू जो घर का सबसे दुलारा है, सबसे छोटा है, वह आगे
चलकर मातृभूमि के लिए प्राणों का बलिदान करेगा और इतिहास में अमर
हो जायेगा। अशफाक के बलिदानी कृतित्व से परिवार शहर और प्रदेश ही
नहीं, देश का भी गौरव बढ़ा है। निश्चित ही अशफाक के बिना उ०प्र० के
क्रांतिकारी इतिहास का पृष्ठ पूरा नहीं होता।
बालक अशफाक को माँ से विशेष लगाव था। माँ उलनिसाँ भी
अशफाक का खूब ख्याल करती थी। बचपन के दिनों में अशफाक अपने
साथी बच्चों से झगड़ा करते या उन्हें पीट देते थे तो उलनिसाँ बेगम बच्चों
को पैसे देती, दुलारती और प्रसन्न कर देती। अशफाक पर माँ का स्नेह
बराबर बना रहा यहाँ तक कि क्रांतिकारी दिनों में जब अशफाक घर से
कई-कई दिन गायब रहने लगे तो बड़े भाइयों को चिन्ता होने लगी थी
लेकिन माँ गुस्सा हो जाती और डाँटकर कहती कि - 'अगर तुमने
अशफाक के विषय में कुछ भी कहा, तो मैं यह घर छोड़ दूँगी। तुम्हें उसे
नसीहत देने की आवश्यकता नहीं है'। अशफाक को इतना प्रेम परिवार से
मिला कि अपने पिता के न रहने की कमी कभी न खली।
अशफाक कुल मिलाकर चार भाई और एक बहन थे। सबसे बड़े
भाई का नाम मुहम्मद शफी उल्ला खाँ था जिन्हें लोग आदर और सम्मान
देते थे। शफी उल्ला धार्मिक प्रवृत्ति के इन्सान थे। दूसरे भाई रियासत
उल्ला खाँ ने लिखा है, 'बड़े भाई साहब अल्लाह-अल्लाह के सिवाय कोई
काम नही करते थे। वही दूसरे भाई रियासत उल्ला खाँ निष्ठा के साथ
घर की पैतृक भूमि की देखभाल करते थे। सारी खेती-बारी की जिम्मेदारी
इन्हीं पर थी। तीसरे भाई मुहम्मद शहनशाह खाँ भूपाल रियासत में
कलेक्टर आशरा के चीफ रीडर थे। निश्चित ही उन्हें रियासत और अंग्रेजों
के व्यवहार का ज्ञान रहा होगा। अशफाक की एक ही बहन थी।
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जिनका विवाह पढ़े लिखे खासे सम्मानित परिवार में हुआ था।
बहन परवरिश बानो का विवाह सहारनपुर के प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट
मुहम्मद अब्दुल कादिर के साथ हुआ था। अशफाक स्वयं को न तो
परिवार में उलझाये न ही कोई पारिवारिक मोह पाला। उन्होंने मातृ भूमि
की स्वाधीनता को ही सर्वोपरि दायित्वों में रखा।
<u>वातावरण का प्रारम्भिक प्रभाव एवं अशफाक की शिक्षा</u>
किसी भी व्यक्ति के लिए उसका परिवेश, उसका वातावरण और
शुरुआती शिक्षा का विशेष प्रभाव पड़ता है। अशफाक तो अपने पूर्वजों की
शिक्षा के प्रति उदासीनता के कारण दुखी तो थे ही लेकिन माँ से खासे
प्रभावित रहे। और कोई भी कारण हो प्रभावित होने का लेकिन अध्ययन
के प्रति माँ की रुचि अशफाक को माँ की मानसिकता की ओर खींचती
अवश्य है। अशफाक के पिता पुलिस में रहे, सो पर्याप्त धन कमाया।
दोनों बड़े पुत्रों (शफीउल्ला खाँ और मुहम्मद रिसायत उल्ला खाँ) पर
उन्होंने शिक्षा हेतु खूब खर्च किया। लेकिन शिक्षा के लिए धन की उतनी
आवश्यकता नहीं होती जितना मन की होती है। रियासत उल्ला खाँ
किसी प्रकार उर्दू की मिडिल परीक्षा पासकर सके थे। उन्होंने कक्षा सात
तक अंग्रेजी पढ़ने के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी। अशफाक ने अफसोस जाहिर
किया है कि वे दोनों ऐसे ही थे जैसे कदनखेल खानदान के अन्य
मेम्बर।¹ पिता क्या करते, खानदान के अन्य लोग अंग्रेजी पुस्तक को हाथ
लगाना भी पाप समझते थे। एक घटना ऐसी ही घट भी चुकी थी कि एक
बार अंशफाक के एक मित्र अपनी अंग्रेजी की पुस्तक एक बार किसी
रिश्तेदार के घर भूल आये। जब उस घर के लोगों ने किताब पड़ी देखी,
तो किसी को भी छूने का साहस न हुआ,
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा पृष्ठ-18
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अतः घर के नौकर से कहकर वह पुस्तक चिमटे से उठाकर एक
ओर रखी गयी। यह घटना अंग्रेजों और अंग्रेजी संस्कृति के प्रति आक्रोश
ही नहीं घृणा भी दर्शाती है। अशफाक को ऐसी घटनाओं से पीड़ा होती,
वे एक बदली हुई मानसिकता के धनी थे। वे ऐसे संकीर्ण विचारों से ऊपर
उठ चुके थे। परन्तु क्या करते किस-किस को समझाते। वे अन्त तक ऐसी
भावनाओं के कारण शिक्षा से वंचित होने की पीड़ा का बखान करते रहे।
यह अशफाक के स्वस्थ व्यक्तित्व और सुलझी हुई मानसिकता का द्योतक
है।
परम्परानुसार एक मौलवी साहब ने अशफाक और उनके भाइयों की
शिक्षा का भार लिया। छोटी उम्र में ही अशफाक को उनके भाइयों के
साथ पढ़ने भेज दिया गया जबकि बिस्मिलाह की रस्म के बिना अक्षर
ज्ञान नहीं कराया जाता था। लेकिन यहां तो चिकने पात हैं सो रस्म
होने तक अशफाक ने लिखना पढ़ना सीख लिया। मौलवी साहब ने
औपचारिक रस्म पूरी की और फिर अक्षर ज्ञान कराने लगे। बहुत कम
समय में ही अशफाक ने उर्दू और फारसी सीख ली। मौलवी साहब ने
'अखलाक मोहसनी' और 'अनवार सहेली' पढ़ा दी थी। चूँकि अशफाक
के घर उर्दू की कई पुस्तकें थीं सो वे उन तमाम पुस्तकों का अध्ययन
करने लगे थे। अशफाक की पसन्द शाहनामा थी तिलस्महोशरूबा भी वे
चाव से पढ़ते थे।
अशफाक उल्ला खाँ को बचपन में मेले के अवसर पर तलवार
खरीदने का बड़ा शौक था। बाद में यही शौक पिस्तौल में बदल गया।¹
यह शौक ऐसे ही नहीं उपजा था। अशफाक को युद्ध विषयक पुस्तकें पढ़ने
में आनंद आता था। भले ही वे मौलवी साहब के पास ही क्यों न रहे हों।
अवसर मिलते ही वे अपनी रुचि के अनुसार पुस्तकों को पढ़ लेते थे।
- जांबाज (पत्रिका) सुरेश कुमार खन्ना, पृष्ठ-1
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इस हेतु वे दण्ड के भागी भी बनते थे, मौलवी साहब के देख लेने पर वे
कान पकड़कर उठक-बैठक लगाया करते थे। अशफाक बचपन में शैतान
बच्चों की श्रेणी में रखे जाते थे। घर पर भी उनकी शैतानियों से अन्य
बच्चे परेशान रहा करते थे। शरारतों से तंग आकर घर वालों ने निर्णय
लिया कि अब अशफाक को खाली रहने का अवसर ही न दिया जाय।
दोपहर तक उन्हें घर में पढ़ने के काम में लगाया जाता था। इसके बाद वे
मौलवी साहब के पास पढ़ने चले जाते थे।
अशफाक ने लिखा है - 'मुझे जंग के हालात पढ़ने में बहुत
दिलचस्पी थी और मैं इस तरह की किताबे पढ़कर मस्त रहता था और
असली बात भी पैदा करने की कोशिश करता था, जिसका नतीजा यह
निकलता था कि मौलवी साहब मुझे कान पकड़कर उठाया-बैठाया करते
थे। थी तो वह सजा, मगर मेरे लिए कसरत का काम करती थी। और मैं
भाइयों में सबसे छोटा होने पर भी धूल चटा देता था। मुहल्ले में हमेशा
जंग छिड़ी रहती थी, क्योंकि मैं एक जंगजू लड़का था। मार पीट का
बाजार गर्म रहता था। उस समय यह सजा तजवीज की गयी थी कि
फुरसत ही न दी जाए कि यह शरारत करें। चुनांचे मौलवी साहब के पास
दोपहर को जाना और फिर शाम को मगरिब के वक्त तक पास रहना
पड़ता। जब मगरिब की नमाज पढ़कर मौलवी साहब घर वापस जाएं, उस
वक्त मुझे छुट्टी मिलती थी, बस वैसा ही मजा अब आ रहा है.... कि
फाँसी की कोठरी है और हम हैं। बाहर कुछ भी तमाशा हो, कुछ भी हो,
न बाहर निकल सकते हैं, न देख सकते हैं। यही हाल जब था कि बाहर
के लड़कों के खेलने की बस आवाज सुना करते थे और दिल
मसोस-मसोस कर रह जाते थे। सबक में मौलवी साहब खुश रहते थे,
मगर शरारत के वक्त और ज्यादा खुश कि सैकड़ों बैठक करा लेते थे या
यों इसलिए कि मौलवी साहब का तरीका-ए-तामील निराला था।' जंग की
कहानी पढ़ने का शौक कोई मामूली बात नहीं थी। संघर्ष उनके स्वभाव
में था, रक्त में था।
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स्कूल के दिनों की एक घटना से उनकी मानसिकता स्पष्ट हो जाती
है। जब अशफाक ने अचानक सुना कि दिल्ली में वायसराय पर किसी ने
बम फेंक दिया और इसी सिलसिले में जब स्कूल बन्द हुआ तो अशफाक
की प्रसन्नता देखते बनती थी। वे घटना की गहराई जानने का प्रयत्न
करते और स्वप्न लोक में खो जाते थे।¹ यही नहीं अंग्रेजी साम्राज्यवाद के
विरुद्ध तलवार से लैस एक क्रांतिकारी के रूप में अपनी कल्पना करने
लगते। तलवार का सपना अशफाक के लिए नया नहीं था। जैसा कि
पहले भी कहा जा चुका है कि वे मेले में तलवार खरीदने का शौक रखते
थे। ऐसी ही एक घटना पिता के साथ घटी जब उनके पिता जिन्दा थे।
अशफाक ने अपने पिता से कहा -'मियाँ आप मुझे एक तलवार मोल ला
दें।' पिता ने जवाब दिया - 'बेटा, तुमसे कोई छीन लेगा।' अशफाक
बोले - 'आप चाँदी की तलवार न लाएँ, बल्कि लोहे की ला दें। वह कोई
नहीं छीनेगा।'... यह सुनकर पिता हंस पड़ें।² शायद यही मानसिकता
काफी थी कि वे आगे चलकर अंग्रेजी सत्ता को जबरदस्त चुनौती दे सके।
अशफाक को तालीम देने वाले मौलवी भी निराले थे। वे अपने विषय में
काफी योग्य व्यक्ति थे। लेकिन वे पढ़ाते वक्त अंग्रेजी को कोसने उसके
अवगुणों के बखान में ज्यादा वक्त लगाते थे। मौलवी साहब का विचार
था कि अंग्रेजी पढ़ने का अर्थ है नरक का मार्ग बनाना। उन्हें अंग्रेजी
व्यवहार, कपड़े, भाषा सबसे घृणा थी। इस हेतु वे सदैव तत्पर रहते थे।
मौलवी साहब सुनी सुनाई या स्वयं से गढ़कर ऐसी कहानी सुनाते थे कि
उनके शिष्यों में अंग्रेजी के प्रति नफरत पैदा हो जाय।
- शहीद अशफाक उल्ला खाँ, सुधीर विद्यार्थी पृष्ठ 7
- शहीद अशफाक उल्ला - सुधीर विद्यार्थी पृष्ठ 7
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अंग्रेजी या अंग्रेजों के प्रति घृणा का प्रथम बीज मौलवी साहब ने
ही बोया जो आगे चलकर अंकुरित हो गया। अशफाक देह से मजबूत
इंसान थे चौदह वर्ष की अवस्था में ही वे एक तगड़े नवयुवक की तरह
लग रहे थे। गणित के कमजोर अशफाक को कोई अध्यापक यदि डाँट
देता था वे ऐंठ जाते थे। शायद उन्हें अपने बुजुर्गों की परम्पराओं पर गर्व
हो न हो। हालांकि बाद में चलकर अशफाक ने ऐसी गलती के लिए दुख
व्यक्त किया है। अध्यापकों के प्रति उपेक्षा पूर्ण व्यवहार से प्रायः हर
अध्यापक उनसे खुश नहीं रहते थे। अशफाक ने लिखा है- 'चूँकि मैं
बचपन से ही गबजनार और लड़ाकू था, यूँ लड़के तो फिर लड़के थे,
मास्टरों से जरा भी न दबता था, वह भी अगर कुछ कह सकते थे इतना
उनसे हो सकता था कि इम्तिहान में ख्याल रखें और अक्सर हमारे
मास्टर पृथ्वी सिंह साहब आंजहानी कहा करते थे कि खाँ साहब! अप्रैल
के महीने का भी ख्याल है? और बेचारे अपना वायदा पूरा करते।’¹
पढ़ाई के प्रति लापरवाह अशफाक एक दबंग विद्यार्थी तो थे ही,
प्रारम्भ के दिनों में टोने-टोटके और गंडे-ताबीज में विश्वास रखते थे।
लापरवाह होने के बावजूद वे तीव्र बुद्धि वाले कुशाग्र विद्यार्थी थे।
रेखागणित में काफी कमजोर थे लेकिन छठवी कक्षा का पूरा कोर्स मात्र
छः घंटो में पूरा कर लिया और परीक्षा के दिनों में छः में से पाँच
सवाल सही कर आये।
विद्यार्थी अशफाक उल्ला खाँ अंग्रेजी स्कूल (मिशन स्कूल) शाहजहाँपुर के
छात्र हो गये। यही वह काल था जब मैनपुरी काण्ड हुआ और राम प्रसाद
बिस्मिल जो उनके शहर के थे और कुछ अन्य क्रांतिकारियों पर केस
चला। उनके विद्यालय से भी एक क्रांतिकारी की गिरफ्तारी हुई।
- अशफाक उल्ला खां, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-21
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यह देखकर अशफाक का उत्साह बढ़ गया और भीतर हलचलें तेज हो गई
थी। अंग्रेजी स्कूल के कारण अशफाक का मन पढ़ाई में नहीं लगता था।
वे नौवीं कक्षा से आगे नही पढ़ सके। उनका मन तो कहीं और लग
गया था। अध्ययन से अरुचि होने के कई कारण हो सकते हैं लेकिन
इसमें उनके एक मित्र का विशेष हाथ रहा है। अशफाक ने मित्र का नाम
लिए बगैर लिखा भी है। अशफाक के स्कूल के दिनों में उनके बहुत सारे
साथी हो गये थे। वे मनोहर लाल ज्योतिषी के बेंत से डरते थे और बचते
रहते थे। इसके लिए वे फूँक-फूँक कर कदम रखते थे। फाँसी घर से लिखे
गये वक्तव्य में वे एक दोस्त का जिक्र करते है कि, 'मुझे एक दोस्त से
शिकवा है, जिसे मैं दिलोजान से चाहता हूँ।'¹ अशफाक दोस्त की दोस्ती
के इतने कायल थे कि दुनिया की खबर ही नही रही, उसे वह अपना
दीनोईमान मानते थे। अपना सब कुछ समझते थे। वे बाद में इतने दुखी
हुए कि तालीम हासिल करने में रुकावट का सबसे बड़ा कारण अशफाक
ने दोस्त को मान लिया।
अशफाक उल्ला खाँ को बचपन में कसरत का बड़ा शौक था। यही
कारण था कि वे अच्छी खासी देह के मालिक थे। उन्हें तैरने का भी बड़ा
शौक था। लेकिन जब वे बड़े हुए तो अच्छे खिलाड़ी होते हुए भी उनका
शौक धीरे-धीरे छूटता गया। सदैव देश के विषय में या मैनपुरी काण्ड के
विषय में सोचा करते थे।² मैनपुरी षडयंत्र के मुकदमें ने तो उनकी
मानसिक स्थिति ही बदल दी। अब अशफाक मन-मस्तिष्क से परिपक्व हो
चुके थे।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-22
- शहीद अशफाक उल्ला, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ-8
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आठ पास कर आये तो उन्होंने अपने पाठ्यक्रम की किताबों में सर वाल्टर
स्कॉट की लिखी हुई नज्म 'लव ऑफ कन्ट्री' पढ़ी। होरेशस का किस्सा
भी पढ़ा। जिसमें उसने कहा था कि देश पर शत्रु के आक्रमण के समय
यदि पुल तोड़ दिया जाय तो टाईबर नदी को पार कर फौज नही आ
सकती... मैं जाता हूँ और इस तंग रास्ते में मैं तीन साथियों सहित खड़े
होकर लड़ूँगा और इधर पुल तोड़कर नदी में डाल दिया जायेगा। वैसा ही
हुआ और रोम बच गया। आज भी बच्चे वीर होरेशस की कहानियाँ
पढ़कर देशभक्ति हेतु प्रेरणा पाते हैं। देश भक्ति की यह कहानी और
वाल्टर स्कॉट की नज्म अशफाक के अध्यापक ने कुछ इस तरह सुनायी
कि अशफाक अपने को रोक न सके और खूब रोये।¹
यह सत्य है कि किसी भी व्यकित के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर उसकी
शिक्षा, उसका अध्ययन और उसका परिवेश, सामाजिक वातावरण खासा
प्रभाव डालता है। निर्माण जब व्यक्तित्व का होता है तो ये उक्त चीजे
अपना असर जरूर दिखाती हैं और अपने इर्द-गिर्द तमाम आरोहों-अवरोहो
के बीच मनुष्य का निर्माण होता रहता है। अशफाक की भूमि भी इसी
परिवेश और समाज से निर्मित हुई है। उनके सामने बहुमत, अल्पमत,
जय, पराजय, अमीरी गरीबी के ऐसे चिह्न बन गये कि उनकी दशा ही
बदल गयी और वे आगे की शिक्षा ग्रहण नही कर सके। अशफाक शिक्षा
को खूब महत्व देते थे। इसके बावजूद वे तामील (अच्छी तामील) की वह
ऊँचाई नहीं छू सके जिसका स्वप्न वे कभी देखते थे। निश्चित ही एक
सुलझा और कुशाग्र बुद्धि का नागरिक देश से बहुत पहले विदा हो गया।
हो सकता था कि यदि वे
- शहीद अशफाक उल्ला, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ 9
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उच्च शिक्षा प्राप्त करते तो देश को अपने गहरे वैचारिक सरोकारों से भी
परिचित कराते जो नव भारत के निर्माण में कारगर सिद्ध होता। उच्च
शिक्षा से वंचित रहने का मलाल अशफाक को था और वे स्वयं को दोषी
मानते हैं। वे अपने अभिभावक को इसका दोष नही देते क्योंकि वे उच्च
तालीम के गुणों से वंचित थे, उन्हें शिक्षा की अहमियत का पता नहीं
था। अंग्रेजी से वंचित रहने और संसार को दूर तक न देखने का भी
उन्हें मलाल था। उन्होंने लिखा है-‘... यों मैं बड़ा और हट्टा-कट्टा
पहलवान हो गया था, जब अंग्रेजी पढ़ने का शौक हुआ था। खैर, खुदा
का शुक्र है कि उर्दू-फारसी ही पढ़ा दी थी। जो मैं आज उर्दू में अपनी
जिन्दगी पर नोट लिख रहा हूँ और सच पूछिये तो वही पुराना रवैया
तालीम का अब तक हमारे यहाँ चला आ रहा है, कि मौलवी साहब
20-30 लड़को को लिए हुए उर्दू की तालीम दे रहे हैं और डंडा बरसा रहे
हैं।¹
अशफाक उल्ला खाँ समाज में हो रहे परिवर्तन पर दृष्टि जमाये थे।
समय बदल रहा था और शिक्षा थी कि अपनी परम्परा से आगे नही जा
रही थी। बावजूद इसके कुछ ऐसे भी शिक्षाविद् थे जो अंग्रेजी तालीम की
जरूरत महसूस करते थे। अशफाक के सामने देश भक्ति बड़ी चीज थी।
कई बार वे स्वयं को देश भक्तों के बीच खड़ा पाते और मन ही मन
संकल्प करते कि मैं ऐसा क्रांतिकारी बनूँगा जो देश की शान पर आजादी
के लिए मर मिटने को हमेशा तैयार रहे। अशफाक को एक बार उनके
अन्य अध्यापक ने एक ऐसी पुस्तक पढ़ने को दी जिसमें संसार भर के देश
भक्तों, वीर सपूतों की कहानियाँ भरी पड़ी थी। पुस्तक देते समय
अध्यापक महोदय ने अशफाक से कहा था कि, ‘मैं यह किताब तुमको बिल्कुल
देता हूँ, क्योंकि तुम
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-23
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इसके योग्य हो।¹ देशभक्ति की उन कथा-कहानियों को अशफाक ने पढ़ा।
परिणाम यह हुआ कि अशफाक की मानसिकता और प्रौढ़ हो गयी। उनके
इरादों में मजबूती आ गयी। वे एक सच्चे वीर सपूत बनना चाहते थे।
यही नही उन्हें पुस्तके पढ़ने का शौक भी लग गया।
अशफाक उल्ला खाँ का बचपन सिर्फ जंग, युद्ध की कथाएँ, लड़ाई
लड़ने और अस्त्र शस्त्र का शौक, देश भक्ति का सपना, अंग्रेजी से
नफरत, पुस्तक पढ़ने के शौक में बीता। यही उनके व्यक्तित्व के निर्माण
में सहायक हो सके हैं। यह भी सत्य है कि उनकी माँ और मौलवी साहब
ने भी प्रारम्भिक चरित्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।
अशफाक के कृतित्व और व्यक्तित्व से आज हम गौरवान्वित होते हैं।
- शहीद अशफाक उल्ला, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ-10
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अध्याय-तीन
अध्याय-तीन
मैनपुरी षड्यंत्र और अशफाक उल्ला खाँ
बचपन के सामाजिक वातावरण ने अशफाक उल्ला का मानसिक वातावरण
तो तैयार कर ही दिया था। पुस्तक पढ़ने के शौक के क्रम में अशफाक ने
अपने एक साथी से 'आनन्द मठ' नामक उपन्यास मंगा कर पढ़वाया
और एकाग्र होकर आनंदमठ की कथा सुनने लगे थे।¹ वे हिन्दी कम
जानते थे। इस साथी ने भी अशफाक के क्रांतिकारी बनने में विशेष
योगदान दिया। एक बार तो उनके मन में आया कि वे देश से बाहर
जाकर देश का कार्य करें। परन्तु इसी मित्र ने देश में रहकर देश सेवा हेतु
क्रांतिकारी दल में सम्मिलित होने की सलाह दी। अशफाक उल्ला को यह
सलाह अच्छी लगी और वे इस प्रयास में लग गये कि कब क्रांतिकारी दल
के सदस्यों से मुलाकात हो और वे दल में शामिल होकर अपनी प्रतिभा
दर्ज करा सकें।
अंग्रेजों के अत्याचार से और उनकी घोर दमन नीति के कारण देश में
भीषण असंतोष फैल गया था। भारतीय युवा विदेशी सत्ता के विरुद्ध
आक्रोशित हो उठे थे। युवाओं में अंग्रेजी शासन के पूर्णतया सफाया करने
का उमंग और जोश उमड़ रहा था। ऐसे में उ0प्र0 भी अपवाद भला कैसे
रहता। 1915-16 के वाराणसी षड्यंत्र काण्ड के रूप में अक्रोश फूट चुका
था। मैनपुरी में अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध एक गुप्त संस्था की स्थापना हो
चुकी थी। मैनपुरी प्रमुख केन्द्र था।² वैसे तो उत्तर प्रदेश के क्रांतिकारी
आन्दोलन का नेतृत्व बनारस के निवासी बंगाली क्रांतिकारियों ने किया
लेकिन मैनपुरी काण्ड की प्रमुख विशेषता थी कि इसे उ0प्र0 के निवासियों
ने किया। इस काण्ड पर बंगाली क्रांतिकारियों का प्रभाव नहीं था।³
- शहीद अशफाक उल्ला, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ 10
- मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल, पृष्ठ-61
- भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्यथनाथ गुप्त पृष्ठ 94
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मैनपुरी काण्ड का प्रभाव अशफाक उल्ला पर इतना पड़ा कि वे देश
के क्रांतिकारी बनने के अतिरिक्त कुछ सोच ही नहीं सकते। निश्चित ही
वे मैनपुरी काण्ड की घटना से खासे प्रभावित थे और यह भी तय था कि
मैनपुरी काण्ड की घटना की एक-एक जानकारी हासिल करने का अशफाक
ने प्रयास किया होगा। संयुक्त प्रान्त
(उत्तर प्रदेश) में बनारस षड़यन्त्र (1915-16) के बाद दूसरे प्रमुख
षड्यंत्र की सफल रचना मैनपुरी में हुई। जिसका प्रभाव अशफाक पर पड़ा
था। शाहजहाँपुर के अनेक क्रांतिकारी इस घटना में सम्मिलित थे।
अशफाक की मानसिक संरचना उन्हें क्रांतिकारी कृतित्व की ओर खींचती
है।
मैनपुरी काण्ड के प्रमुख नेता गेंदा लाल दीक्षित थे। गेंदा लाल का
आगरा जिले के बाह तहसील में 20 नवम्बर 1888 को जन्म हुआ।
धनाभाव गेंदा लाल को भी हाई स्कूल से आगे शिक्षा पाने में रुकावट
बना। राम प्रसाद बिस्मिल की तरह ही गेंदा लाल भी आर्य समाज से
खूब प्रभावित थे। आजादी की लड़ाई में गेंदा लाल ने अथक प्रयास
किया। यह भी कहा जाता है कि आजादी हेतु क्रांति का प्रथम पाठ राम
प्रसाद बिस्मिल ने भी पढ़ा उन्हीं से था। दीक्षित जी एक बार हुए शिवाजी
उत्सव से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने शिवाजी नाम से एक संस्था ही
बना डाली। वे लोकमान्य तिलक के भक्त थे और राम प्रसाद बिस्मिल से
प्रभावित थे। यही राम प्रसाद बिस्मिल अशफाक के मित्र ही नहीं
प्रेरणास्तम्भ भी थे। 'शिवाजी समिति' के कई सदस्य बने। निः सन्देह
मैनपुरी काण्ड जिसके अगुआ गेंदालाल दीक्षित थे और जिसका प्रभाव
अशफाक पर सबसे ज्यादा पड़ा, वह काण्ड अंग्रेजी शासन के विरुद्ध
देशभक्त युवकों के आक्रोश का प्रतीक था।
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गेंदा लाल जी ने 1916 में मैनपुरी में 'मातृवेदी' नामक क्रांतिकारी संस्था
बनाई।¹ यह संस्था गुप्त रूप से बनायी गयी थी। इस संस्था का उद्देश्य
ही था कि देश को अंग्रेजी दासता से मुक्त कराना। थोड़े ही समय के
बाद इस संस्था की गतिविधियाँ लखनऊ, शाहजहाँपुर, आगरा, मथुरा,
इटावा, फरूर्खाबाद, कानपुर, फतेहपुर और मुरादाबाद में भी फैल गयीं।
मैनपुरी जनपद का नेतृत्व शिव कृष्ण ने किया और शाहजहाँपुर में राम
प्रसाद बिस्मिल, लखनऊ में गंगा सिंह ने नेतृत्व का भार सम्भाला।
गेंदालाल जी पूरे उ०प्र० का नेतृत्व कर रहे थे।² यह संयोग ही था कि
गेंदा लाल ने डाकुओं के सरदार पंचम सिंह को अपनी तरफ मिला लिया।
पंचम सिंह के सम्मिलित होने के कारण पाँच सौ घुड़सवार और दो सौ
पैदल एवं लाखों की सम्पत्ति क्रांतिकारियों के काम आयी। यह भी
उल्लेखनीय है कि - संस्था में श्री कृष्ण पालीवाल, श्री चन्द्रधर जौहरी
आदि अनेक नामी गिरामी क्रांतिकारियों ने कार्य किया। मातृवेदी संस्था
की गतिविधियों की प्रमुख चार शाखाएं थीं, जो निम्नवत् हैं -
- विदेशी सरकार के खिलाफ पुस्तकों, कविताओं और इस्तहार का
प्रयोग। - सैनिक विभाग का कार्य धन इकट्ठा करने के लिए डकैती डालने
हेतु अस्त्र शस्त्रों का संग्रह करना था। साथ ही इसका कार्य सैनिक
तैयार करना था। - ब्रिटिश और देशी राज्यों की विभिन्न सैनिक छावनियों के सदस्यों
की जानकारी एकत्र करने और सरकारी खजाने के धन और अस्त्र
शस्त्र के विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिए 'गुप्ताचार्य' या
जासूसी विभाग था। इस विभाग का कार्य डकैती डालने वाले
स्थानों की सूचना भी एकत्र करना था। - मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल, पृष्ठ-61
- मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल, पृष्ठ-62
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