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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 297 में से

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उच्च शिक्षा प्राप्त करते तो देश को अपने गहरे वैचारिक सरोकारों से भी
परिचित कराते जो नव भारत के निर्माण में कारगर सिद्ध होता। उच्च
शिक्षा से वंचित रहने का मलाल अशफाक को था और वे स्वयं को दोषी
मानते हैं। वे अपने अभिभावक को इसका दोष नही देते क्योंकि वे उच्च
तालीम के गुणों से वंचित थे, उन्हें शिक्षा की अहमियत का पता नहीं
था। अंग्रेजी से वंचित रहने और संसार को दूर तक न देखने का भी
उन्हें मलाल था। उन्होंने लिखा है-‘... यों मैं बड़ा और हट्टा-कट्टा
पहलवान हो गया था, जब अंग्रेजी पढ़ने का शौक हुआ था। खैर, खुदा
का शुक्र है कि उर्दू-फारसी ही पढ़ा दी थी। जो मैं आज उर्दू में अपनी
जिन्दगी पर नोट लिख रहा हूँ और सच पूछिये तो वही पुराना रवैया
तालीम का अब तक हमारे यहाँ चला आ रहा है, कि मौलवी साहब
20-30 लड़को को लिए हुए उर्दू की तालीम दे रहे हैं और डंडा बरसा रहे
हैं।¹
अशफाक उल्ला खाँ समाज में हो रहे परिवर्तन पर दृष्टि जमाये थे।
समय बदल रहा था और शिक्षा थी कि अपनी परम्परा से आगे नही जा
रही थी। बावजूद इसके कुछ ऐसे भी शिक्षाविद् थे जो अंग्रेजी तालीम की
जरूरत महसूस करते थे। अशफाक के सामने देश भक्ति बड़ी चीज थी।
कई बार वे स्वयं को देश भक्तों के बीच खड़ा पाते और मन ही मन
संकल्प करते कि मैं ऐसा क्रांतिकारी बनूँगा जो देश की शान पर आजादी
के लिए मर मिटने को हमेशा तैयार रहे। अशफाक को एक बार उनके
अन्य अध्यापक ने एक ऐसी पुस्तक पढ़ने को दी जिसमें संसार भर के देश
भक्तों, वीर सपूतों की कहानियाँ भरी पड़ी थी। पुस्तक देते समय
अध्यापक महोदय ने अशफाक से कहा था कि, ‘मैं यह किताब तुमको बिल्कुल
देता हूँ, क्योंकि तुम

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-23
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